कुर्सी की हनक में फंसा सच, डीपीएम के आरोप निकले फर्जी! जांच रिपोर्ट ने खोली पोल, बेहोशी में गाली सुनने का दावा पड़ा भारी! बिना सबूत निलंबन पर सवाल, अफसरशाही के ‘मसल पावर’ का खुला खेल! छोटे कर्मचारी पर बड़ा वार, सत्ता के दम पर बनाई गई कहानी! ऑडियो से रिपोर्ट तक हंगामा, अब डीपीएम पर उठी कार्रवाई की मांग!
बक्सर- जिले के स्वास्थ्य विभाग में कुर्सी की ताकत और अफसरशाही के मसल पावर का एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरे सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिला कार्यक्रम प्रबंधक (डीपीएम) द्वारा लगाए गए आरोप अब जांच में गलत साबित हो चुके हैं, लेकिन इसके बावजूद एक छोटे कर्मचारी पर हुई कार्रवाई ने व्यवस्था की कार्यप्रणाली को कटघरे में ला खड़ा किया है।सदर अस्पताल परिसर से शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गया। मामला उस वक्त तूल पकड़ गया जब डीपीएम मनीष कुमार का एक ऑडियो वायरल हुआ, जिसमें वे अपने अधीनस्थ कर्मचारियों के साथ अभद्र भाषा भद्दी-भद्दी गलियों का प्रयोग करते सुनाई दिए। इसके बाद उन्होंने कार्यालय सहायक मो. आसिफ अली पर गंभीर आरोप लगाते हुए एक सरकारी पत्र जारी कराया, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।
डीपीएम का दावा कार्यालय सहायक की एक ही थप्पड़ की वार से हो गए थे बेहोश !
डीपीएम ने अपने आरोप में कहा था कि कार्यालय सहायक ने उन्हें ऐसा थप्पड़ मारा की कुर्सी पर से वे जमीन पर गिरकर बेहोश हो गए। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी दावा किया कि बेहोशी की हालत में भी उन्हें गालियां सुनाई दे रही थीं। इस बयान ने न केवल लोगों को हैरान किया बल्कि मेडिकल साइंस पर भी सवाल खड़े कर दिए। वरीय चिकित्सकों ने भी इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से असंभव बताया।जांच कमिटी ने बताया आरोप फर्जी !
मीडिया में मामला उछलने के बाद तीन सदस्यीय जांच कमिटी का गठन किया गया। जांच के दौरान 19 फरवरी 2026 को दोनों पक्षों को बुलाकर बयान लिया गया। साथ ही अस्पताल के कई कर्मचारियों से पूछताछ की गई। जांच रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया कि न तो मारपीट की पुष्टि हुई और न ही गाली-गलौज के कोई ठोस साक्ष्य मिले। किसी भी कर्मचारी ने डीपीएम के आरोपों का समर्थन नहीं किया। सबसे हैरान करने वाली बात यह रही कि डीपीएम खुद जांच के दौरान अपने आरोपों के समर्थन में कोई लिखित साक्ष्य या स्पष्ट जवाब पेश नहीं कर सके। इसके बावजूद, राज्य स्वास्थ्य समिति द्वारा कार्यालय सहायक को बिना ठोस जांच के ही निलंबित कर दिया गया। अब यही फैसला पूरे मामले का सबसे बड़ा विवाद बन गया है।
खेल मसल पावर का !
जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद लोगों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि जब आरोप गलत साबित हो गए, तो फिर एक निर्दोष कर्मचारी पर कार्रवाई क्यों की गई? क्या यह अफसरशाही का दुरुपयोग नहीं है? क्या छोटे पद पर काम करने वाले कर्मचारियों का कोई सम्मान या अधिकार नहीं है? मामले में एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब मीडिया ने डीपीएम से उनका पक्ष जानने की कोशिश की। ऑन कैमरा सवालों का सामना करते हुए वे असहज नजर आए और जवाब देने से बचते दिखे। कैमरा बंद होने के बाद उन्होंने बातचीत को टालने की कोशिश की, जिससे उनकी स्थिति और भी कमजोर होती नजर आई।
गौरतलब है कि डीपीएम का विवादों से पुराना नाता रहा है। एक के बाद एक सामने आ रहे सरकारी पत्र और आरोप विभाग की छवि को लगातार नुकसान पहुंचा रहे हैं। अब जबकि जांच रिपोर्ट ने सच्चाई उजागर कर दी है, ऐसे में राज्य स्वास्थ्य समिति की भूमिका पर भी सवाल उठना लाजिमी है। यह मामला केवल एक अधिकारी और कर्मचारी के बीच का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे सिस्टम में व्याप्त सत्ता के दुरुपयोग, दबाव की राजनीति और कमजोर वर्ग के कर्मचारियों पर हो रहे अन्याय की कहानी बन चुका है। अब देखना यह है कि क्या इस मामले में जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होती है या फिर यह भी फाइलों में दबकर रह जाएगा।



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