मंत्रों की गूंज से जागा बक्सर, संस्कारों से सजा भविष्य – विश्वामित्र सेना का अनूठा प्रयास!संस्कारों से सशक्त समाज की ओर कदम – यज्ञोपवीत से जुड़ी नई पीढ़ी! सनातन की जड़ें अटूट, परंपरा अमर – बक्सर में दिखा धर्म, ज्ञान और अनुशासन का संगम!

त्रेतायुग की परंपरा, द्वापर का धर्म और कलयुग में संस्कार का संगम – बक्सर में दिखा सनातन का विराट स्वरूप! जनेऊ नहीं, यह है “द्विजत्व” का प्रवेश द्वार – 51 बटुक बने सनातन के वाहक! मंत्रों की गूंज से जागा बक्सर, संस्कारों से सजा भविष्य – विश्वामित्र सेना का अनूठा प्रयास!संस्कारों से सशक्त समाज की ओर कदम – यज्ञोपवीत से जुड़ी नई पीढ़ी! सनातन की जड़ें अटूट, परंपरा अमर – बक्सर में दिखा धर्म, ज्ञान और अनुशासन का संगम!  

 बक्सर-  जिले की पावन धरती एक बार फिर सनातन परंपरा की दिव्यता से आलोकित हो उठी, जब सिकटौना ग्राम स्थित श्रीधराचार्य वेद कर्मी गुरुकुलम के प्रांगण में विश्वामित्र सेना के तत्वावधान में भव्य निशुल्क सामूहिक यज्ञोपवीत (उपनयन) संस्कार का आयोजन किया गया। 9 अप्रैल को आयोजित इस कार्यक्रम में 51 बटुकों का विधि-विधान से उपनयन संस्कार संपन्न कराया गया, जो केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि सनातन संस्कृति के पुनर्जागरण का जीवंत उदाहरण बन गया।

विश्वामित्र सेना के नेतृत्व में हुआ आयोजन !

कार्यक्रम का नेतृत्व विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय संयोजक राजकुमार चौबे ने किया। उनके साथ आचार्य बनारसी दुबे के मार्गदर्शन और रंगनाथ द्विवेदी के संयोजन में वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह संस्कार संपन्न हुआ। पूरे परिसर में गूंजते मंत्रों की ध्वनि ने ऐसा वातावरण निर्मित किया, मानो त्रेतायुग के ऋषि-मुनियों की तपोभूमि सजीव हो उठी हो।

सनातन परंपरा में यज्ञोपवीत संस्कार का विशेष महत्व है। शास्त्रों में कहा गया है – “जन्मना जायते शूद्रः, संस्कारात् द्विज उच्यते”, अर्थात मनुष्य जन्म से सामान्य होता है, लेकिन संस्कार उसे “द्विज” यानी दूसरा जन्म प्रदान करते हैं। यही परंपरा त्रेतायुग में भगवान राम के समय से लेकर द्वापर युग में भगवान कृष्ण के काल तक समाज को संस्कारित करती रही और आज कलयुग में भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है।

 नई पीढ़ी को उसी सनातन धारा से जोड़ने का प्रयास !

इस आयोजन के माध्यम से नई पीढ़ी को उसी सनातन धारा से जोड़ने का प्रयास किया गया, जिसने हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति को जीवित रखा है। बटुकों को जनेऊ धारण कराकर उन्हें ब्रह्मचर्य, संयम और ज्ञान के मार्ग पर अग्रसर होने का संदेश दिया गया। गायत्री मंत्र की दीक्षा के साथ उन्हें आत्मिक और बौद्धिक विकास की दिशा में पहला कदम बढ़ाने का अवसर मिला।

क्या कहते है राष्ट्रीय अध्यक्ष !

मुख्य अतिथि राजकुमार चौबे ने अपने संबोधन में कहा कि यज्ञोपवीत संस्कार केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन को अनुशासन, ज्ञान और संस्कारों से जोड़ने का आधार है। उन्होंने कहा कि आज के आधुनिक दौर में जहां पश्चिमी प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है, वहां इस तरह के आयोजन सनातन मूल्यों को जीवित रखने का कार्य कर रहे हैं। यह केवल धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज निर्माण का सशक्त माध्यम है। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में अभिभावकों की उपस्थिति ने यह साबित कर दिया कि समाज आज भी अपनी जड़ों से जुड़ना चाहता है। माता-पिता ने अपने बच्चों को इस संस्कार से जोड़कर यह संदेश दिया कि आधुनिकता के साथ-साथ परंपरा का संतुलन ही सशक्त समाज की नींव है।

कलयुग में ऐसा सामूहिक आयोजन !

 त्रेतायुग में यह संस्कार ऋषियों के आश्रमों में होता था, द्वापर में गुरुकुलों के माध्यम से समाज को दिशा देता था, तो आज कलयुग में ऐसे सामूहिक आयोजन उसी परंपरा को पुनर्जीवित कर रहे हैं। यह केवल एक संस्कार नहीं, बल्कि संस्कृति, सभ्यता और आत्मिक जागरण का प्रतीक है। कार्यक्रम के अंत में भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें सभी श्रद्धालुओं ने प्रसाद ग्रहण किया। इस दौरान अशोक कुमार उपाध्याय, मोहित बाबा, गोवर्धन चौबे, अर्जुन तिवारी, ओम जी यादव और गुड्डू पांडेय समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित रहे। वहीं डॉक्टर लोकनाथ द्विवेदी, पंकज पांडेय, बबन तिवारी, जय कुमार तिवारी और विद्यासागर दुबे का विशेष सहयोग रहा।

बक्सर की इस पावन धरती पर आयोजित यह कार्यक्रम एक बार फिर यह संदेश दे गया कि सनातन केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की भी पहचान है। संस्कारों की यह ज्योति इसी तरह जलती रही, तो आने वाली पीढ़ियां न केवल अपनी जड़ों से जुड़ी रहेंगी, बल्कि एक सशक्त और संस्कारित समाज का निर्माण भी करेंगी

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