होली के रंग में सियासत का सच! विश्वामित्र सेना का होली मिलन बना सत्ता से जवाबदेही का मंच!

 होली के रंग में सियासत का सच! विश्वामित्र सेना का होली मिलन बना सत्ता से जवाबदेही का मंच! राष्ट्रीय अध्यक्ष का बड़ा बयान—नेताओं ने खुद को चमकाया, बक्सर को भुलाया ! एयरपोर्ट, पर्यटन और वामन कॉरिडोर पर सरकार से सीधे सवाल ! कहा—गौरवशाली इतिहास वाला बक्सर आज राजनीतिक बेरुखी का शिकार

बक्सर- देशभर में होली भाईचारे और उत्सव का पर्व है, लेकिन बक्सर में विश्वामित्र सेना का होली मिलन समारोह इस बार राजनीतिक चेतना और सवालों का मंच बन गया। रंग-गुलाल के बीच जहां एक ओर पारंपरिक गीत गूंजे, वहीं दूसरी ओर सत्ता की चुप्पी पर तीखे सवाल भी उठे। समारोह में विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजकुमार चौबे के नेतृत्व में पत्रकारों को गुलाल लगाकर सौहार्द का संदेश दिया गया, लेकिन असली संदेश साफ था—अब बक्सर की अनदेखी नहीं चलेगी।

बक्सर का विकास कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि संघर्ष का राष्ट्रीय मुद्दा है। 

अपने संबोधन में राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि बक्सर का विकास कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि संघर्ष का राष्ट्रीय मुद्दा है। उन्होंने याद दिलाया कि वर्ष 2025 की रामनवमी के दौरान खुले में मांस-मछली की बिक्री के खिलाफ जब आवाज उठाई गई, तब प्रशासन और सरकार को मजबूरन कदम उठाना पड़ा। आज पूरे प्रदेश में इस पर बहस हो रही है। उन्होंने सवाल किया—अगर जनता सड़क पर न उतरे, तो क्या सरकारें खुद जागती हैं?  यह बहस सत्ता की संवेदनशीलता नहीं, बल्कि जनदबाव की जीत है।

नेताओ पर कसा तंज !

वही उन्होंने नेताओं पर सीधा हमला करते हुए कहा कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति होती, तो बक्सर आज पिछड़ेपन की पहचान नहीं बनता। वैदिक काल से लेकर त्रेतायुग तक बक्सर का इतिहास देश की सांस्कृतिक रीढ़ रहा है। भगवान राम ने इसी धरती पर ताड़का और सुबाहु का वध किया, चौसा और बक्सर की धरती ने इतिहास की दिशा मोड़ने वाले युद्ध देखे, लेकिन आज वही भूमि राजनीतिक उपेक्षा का उदाहरण बन चुकी है।

क्या इतिहास सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है ?

राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि च्यवन ऋषि ने इसी धरती से च्यवनप्राश का निर्माण कर पूरे समाज को स्वास्थ्य का मार्ग दिखाया। आज च्यवनप्राश बनाने वाली कंपनियां अरबों की संपत्ति पर बैठी हैं, लेकिन बक्सर—जहां से यह विरासत निकली—आज भी सड़क, रोजगार और पर्यटन के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या इतिहास सिर्फ भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है?

नेताओ की बढ़ गई हजारो गुणा सम्पति !

 बक्सर से चुनाव जीतने वाले नेताओं की संपत्ति, पद और प्रभाव तो बढ़ता गया, लेकिन बक्सर के हिस्से में सिर्फ वादे आए। नेताओं की आमदनी बढ़ी, बक्सर वसियो की परेशानियां। यही वजह है कि जनता का भरोसा टूट रहा है और असंतोष अब खुलकर सामने आ रहा है। उन्होंने दावा किया कि विश्वामित्र सेना के संघर्ष ने राष्ट्रीय स्तर पर बहस शुरू कराई है। दो साल पहले शुरू हुए आंदोलन का असर यह है कि आज बक्सर की ऐतिहासिक पहचान पर राज्यसभा से लेकर विधानसभा तक चर्चा हो रही है। भगवान वामन को जेल परिसर से बाहर निकालने, वामन कॉरिडोर, विश्वामित्र पार्क और रिवरफ्रंट जैसे मुद्दे अब राजनीतिक एजेंडे में शामिल हो चुके हैं। उन्होंने साफ कहा—यह सरकार की कृपा नहीं, जनता के दबाव का नतीजा है।

सिर्फ वोट के लिए होता है चुनावी घोषणा !

 जहां भगवान राम ने शस्त्र और शास्त्र की शिक्षा ली, वह बक्सर आज भी पर्यटन के नक्शे पर हाशिये पर है। बिहार के कई जिलों में एयरपोर्ट बन रहे हैं, लेकिन बक्सर के लिए आज तक संसद या विधानसभा में ठोस आवाज क्यों नहीं उठी? क्या बक्सर सिर्फ चुनाव के समय याद किया जाने वाला इलाका है? उन्होंने कहा कि अगर बक्सर पर्यटन केंद्र बने, तो रोजगार बढ़ेगा, पलायन रुकेगा और क्षेत्र की तस्वीर बदलेगी—लेकिन मौजूदा राजनीति को बक्सर के भविष्य से कोई सरोकार नहीं दिखता।

समारोह के अंत में होली की शुभकामनाएं दी गईं, लेकिन संदेश बेहद स्पष्ट और राष्ट्रीय था—विश्वामित्र सेना अब सिर्फ सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि विकास, पर्यटन और सांस्कृतिक अस्मिता को लेकर आगे भी संघर्ष करेगी।


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