“जनता का सांसद या शिक्षा विभाग का सुपर ठेकेदार?” “RTI ने खोला राज: सांसद का ‘प्राधिकृत सहयोगी’ या वसूली का ठेका?” “स्कूलों में पढ़ाई कम, वसूली का पाठ ज्यादा!” “टेंडर, ट्रांसफर और टैक्स… शिक्षा विभाग बना ‘कलेक्शन सेंटर’?” “सिस्टम की खामोशी या सियासत की साझेदारी?” बक्सर में शिक्षा विभाग पर वसूली के गंभीर आरोप, सांसद पर उठे सवाल !
बक्सर- बिहार के बक्सर जिले में शिक्षा विभाग से जुड़ा एक गंभीर विवाद सामने आया है, जिसने स्थानीय प्रशासन और सियासी गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। आरोपों के केंद्र में बक्सर के लोकसभा सांसद सुधाकर सिंह का नाम है। आरोप है कि सांसद के कथित संरक्षण में शिक्षा विभाग में एक समानांतर तंत्र खड़ा कर अवैध वसूली और ठेकों के खेल को बढ़ावा दिया जा रहा है।
आरटीआई से खुला राज !
मामले की शुरुआत सूचना के अधिकार (RTI) के तहत प्राप्त एक आधिकारिक जवाब से हुई है। संसदीय मंत्रालय के पत्र के अनुसार किसी भी लोकसभा सांसद को अपने संसदीय क्षेत्र में किसी सरकारी विभाग के लिए किसी व्यक्ति को “अधिकृत प्रतिनिधि” नियुक्त करने का कोई कानूनी अधिकार या प्रावधान नहीं है। इसके बावजूद सांसद द्वारा पत्रांक BXR/138 दिनांक 28 दिसंबर 2024 के जरिए जिला शिक्षा पदाधिकारी को पत्र लिखकर अरविंद कुमार सिंह को अपना “प्राधिकृत सहयोगी” बताया गया। यही वह बिंदु है जहां से पूरे मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया है।
बीजेपी नेता ने लगाया संगीन आरोप !
भारतीय जनता पार्टी के जिला प्रवक्ता दीपक पांडेय एवं शिक्षकों के एक वर्ग का आरोप है कि इसी कथित अधिकृतता के आधार पर अरविंद कुमार सिंह और उनके सहयोगी अजय सिंह शिक्षा विभाग में प्रभाव बनाकर शिक्षकों और कर्मियों से हर महीने 3000 से 7000 रुपये तक की अवैध वसूली करते हैं। आरोप यह भी है कि इस वसूली तंत्र के जरिए विभागीय कामकाज पर दबाव बनाया जाता है। भाजपा प्रवक्ता ने बताया कि इसी वसूली तंत्र से परेशान होकर कोई भी अधिकारी इस विभाग में नही रहना चाहता है! जिलाधिकारी बक्सर से लिखित शिकायत करने के बाद भी प्रशासनिक अधिकारी यह जानकारी उपलब्ध नही करा रहे है कि इस दिशा में अब तक क्या ठोस कार्रवाई हुई !
शिकायत के बाद भी नही होती है कार्रवाई !
कुछ अधिकारियों और शिक्षकों का दावा है कि इस तरह के दबाव के खिलाफ उन्होंने लिखित शिकायतें भी दी हैं। पूर्व जिला शिक्षा पदाधिकारी अमरेंद्र पांडेय द्वारा भी कथित तौर पर धमकी मिलने की शिकायत प्रशासन को दी गई थी। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अब तक किसी जांच एजेंसी द्वारा नहीं की गई है, लेकिन लगातार सामने आ रही शिकायतों ने पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया है।
कमीशन का खेल या सियासी दाव !
मामले का दूसरा पहलू सरकारी ठेकों से जुड़ा बताया जा रहा है। आरोप है कि शिक्षा विभाग में बेंच-डेस्क की आपूर्ति, मिड-डे-मील के बर्तन, सामग्री वितरण और टूल किट सप्लाई जैसे कार्यों में भी कथित तौर पर प्रभाव का इस्तेमाल कर ठेके हासिल किए गए। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह शिक्षा व्यवस्था में राजनीतिक हस्तक्षेप का गंभीर उदाहरण माना जाएगा।
आर्थिक घोटाले का मास्टरमाइंड कौन ?
सबसे विवादित आरोप First Idea Digital Application नामक कंपनी से जुड़े टेंडर को लेकर सामने आया है। आरोप है कि निविदा एक कंपनी के नाम से भरी गई, लेकिन अनुबंध मिलते-जुलते नाम वाली दूसरी कंपनी First Idea Digitals Applications से कर लिया गया और करोड़ों रुपये का भुगतान भी कर दिया गया। स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि इस कंपनी के पक्ष में विभिन्न बैठकों में पैरवी की गई थी। इस पूरे विवाद को और गंभीर बनाता है वह आरोप, जिसमें कहा जा रहा है कि संबंधित कंपनी के खातों से कुछ व्यक्तियों और उनके परिजनों के खातों में धनराशि का लेन-देन हुआ। यदि वित्तीय लेन-देन के ये आरोप जांच में सही पाए जाते हैं तो यह सिर्फ प्रशासनिक अनियमितता नहीं बल्कि संभावित आर्थिक घोटाले का मामला बन सकता है।
क्या कहते है राजनीति के जानकार ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक जिले का प्रशासनिक विवाद नहीं रह गया है। यह उस व्यापक सवाल को भी सामने लाता है कि क्या स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रभाव के जरिए सरकारी विभागों में समानांतर शक्ति केंद्र बनते जा रहे हैं। हालांकि सांसद या आरोपित व्यक्तियों की ओर से इन आरोपों पर प्रतिक्रिया सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आई है। लेकिन बढ़ते विवाद के बीच शिक्षकों के संगठनों और स्थानीय नागरिकों ने पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है।
स्वतन्त्र एजेंसी से हो जांच
मांग की जा रही है कि कथित वसूली तंत्र, ठेका प्रक्रिया और वित्तीय लेन-देन की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जाए तथा First Idea Digitals Applications से जुड़े भुगतान की विशेष ऑडिट कराई जाए।
बक्सर में उठे ये सवाल सिर्फ एक जिले तक सीमित नहीं हैं। यह बहस भी तेज हो गई है कि यदि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में राजनीतिक प्रभाव और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लग रहे हैं, तो इसकी पारदर्शी जांच लोकतांत्रिक व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही दोनों के लिए जरूरी है।




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