बक्सर में उठा सवाल ! क्या दरकने लगी है नीतीश कुमार की 21 वर्षों की विरासत? फरक्का जल संधि के बहाने बक्सर में जदयू का शक्ति प्रदर्शन… मंच पर दो बड़े नेता, नीचे खाली होती कुर्सियां!

 क्या दरकने लगी है नीतीश कुमार की 21 वर्षों की विरासत? फरक्का जल संधि के बहाने बक्सर में जदयू का शक्ति प्रदर्शन… मंच पर दो बड़े नेता, नीचे खाली होती कुर्सियां! सैकड़ों गाड़ियों से भीड़ आई, लेकिन भाषण खत्म होने से पहले ही निकल गई! हाथों में खाली पत्तल और मैदान से उठते कार्यकर्ताओं ने जदयू की 21 साल पुरानी राजनीतिक विरासत पर खड़ा कर दिया सबसे बड़ा सवाल ?

बक्सर -राजनीति में भीड़ सिर्फ संख्या नहीं होती। भीड़ राजनीतिक ताकत का संकेत होती है। और जब कोई पार्टी अपने सबसे बड़े नेता की विरासत के नाम पर मैदान में उतरती है, तब उस भीड़ का अंत तक टिके रहना नेतृत्व की ताकत का पैमाना बन जाता है। बक्सर में 5 सितंबर को कुछ ऐसा ही हुआ। मुद्दा था फरक्का जल संधि, नाम था ‘नीतीश संवाद’, मंच पर थे जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा, प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा समेत पार्टी के कई बड़े नेता। जदयू ने इसे बिहार के जलहित और फरक्का संधि के खिलाफ जनजागरूकता अभियान की शुरुआत के तौर पर पेश किया। लेकिन जन संवाद का मैदान ने जो तस्वीर दिखाई, उसने फरक्का से बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।

दरकने लगी है नीतीश कुमार की राजनीतिक विरासत ?

बदलते राजनीति का बड़ा संकेत !क्या नीतीश कुमार की 21 वर्षों की राजनीतिक विरासत अब धीरे-धीरे दरकने लगी है? ऐसा क्यो कहा जा रहा है ! क्योंकि मंच पर नेता थे, भाषण था, मुद्दा था, संगठन था और भीड़ भी थी। लेकिन कुछ देर बाद— कुर्सियां खाली थीं। भीड़ आई… लेकिन रुकी नहीं! जदयू संगठन ने पूरी ताकत लगाई। दर्जनों बसें, छोटी-बड़ी गाड़ियां और बड़ी संख्या में कार्यकर्ता कार्यक्रम स्थल तक पहुंचे। यानी भीड़ जुटाने में संगठन ने अपनी जिम्मेदारी निभाई। लेकिन असली परीक्षा उसके बाद शुरू हुई। मंच पर भाषण आगे बढ़ता गया और दर्शक दीर्घा पीछे हटती गई।
स्वागत में खड़े जदयू के जमीनी कार्यकर्ता !

एक-एक कर कुर्सियां खाली होती चली गईं।

सवाल सीधा है—अगर भीड़ जुटाना संगठन की सफलता थी, तो उस भीड़ को कार्यक्रम के अंत तक रोकना किसकी जिम्मेदारी थी? कार्यकर्ताओं  का यह सवाल  जदयू के बड़े- बड़े नेताओं के लिए यह सवाल असहज सवाल बन गया है। क्योंकि भीड़ को बसों में भरकर लाना संगठन की क्षमता हो सकती है, लेकिन भीड़ को अपने विचार और नेतृत्व से बांधे रखना राजनीतिक नेतृत्व की क्षमता होती है। बक्सर में पहली तस्वीर मजबूत थी। दूसरी तस्वीर ने सवाल खड़ा कर दिया है!

मंच पर फरक्का का हिसाब… मैदान में खाली कुर्सियों का हिसाब!

कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष का स्वागत करते 

कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय झा बिहार के पानी, गंगा में सिल्ट, बाढ़ और फरक्का जल संधि के प्रभावों का हिसाब बता रहे थे। पार्टी का तर्क है कि 1996 की 30 वर्षीय संधि दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली है और बिहार के हितों को ध्यान में रखकर आगे का फैसला होना चाहिए। लेकिन उसी वक्त नीचे का मैदान एक अलग हिसाब लिख रहा था। संजय झा पानी का हिसाब बता रहे थे और कार्यकर्ता कुर्सियों का हिसाब छोड़ रहे थे। यही बक्सर की सबसे कड़वी राजनीतिक तस्वीर है।

हम तो नीतीश के लिए आए थे?

जोश में कार्यकर्ता 

बीच कार्यक्रम से निकलती भिंड

कार्यक्रम के बीच में निकलती महिलाओं से जब पूछा गया कि वे क्यों जा रही हैं तो जवाब ने पूरी कहानी का रुख बदल दिया। किसी ने कहा—नीतीश कुमार को देखने आए थे। किसी ने कहा—बताया गया था कि नीतीश संवाद है, लेकिन नीतीश कुमार ही नहीं हैं। यही बात जदयू के लिए सबसे गंभीर है। क्योंकि अगर जमीन पर मौजूद कार्यकर्ता और आम लोग आज भी कार्यक्रम को पार्टी से पहले नीतीश कुमार के चेहरे से जोड़ रहे हैं, तो फिर सवाल सिर्फ भीड़ का नहीं है। सवाल है— क्या जदयू ने नीतीश कुमार के बाद अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान तैयार की है? या फिर पार्टी आज भी उसी चेहरे की राजनीतिक पूंजी पर खड़ी है, जिसने दो दशक से ज्यादा समय तक बिहार की सत्ता और राजनीति को प्रभावित किया?

21 साल की विरासत का असली इम्तिहान!

नीतीश कुमार की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत सिर्फ सत्ता नहीं रही। उनकी सबसे बड़ी ताकत रही—संगठन और जनता के बीच बना वह भरोसा, जिसमें उनका नाम खुद एक राजनीतिक संदेश बन गया। लेकिन समय बदलता है। नेतृत्व बदलता है। पीढ़ियां बदलती हैं। और सबसे बड़ा सवाल तब उठता है जब विरासत संभालने वाले नेताओं को यह साबित करना हो कि भीड़ नेता के नाम पर आती है या संगठन के नाम पर।

परेशान है जदयू के रणनीतिकार !

बक्सर में यह परीक्षा हुई। भीड़ आई। लेकिन रुकी नहीं।यही तस्वीर जदयू के रणनीतिकारों को सबसे ज्यादा परेशान कर रही है! जंहा बड़े- बड़े नेता मंच पर थे ! महीनो की कार्यकर्ताओ की मेहनत थी कुर्सियां खाली होते ही नेतृत्व पर सवाल खड़े हो गए ! क्योकि भिंड जुटाना कार्यकर्ताओ की जिम्मेवारी थी तो उस भिंड को अंतिम समय तक रोके रहना किसकी जिम्मेवारी थी!

 पत्तल ने भी खोल दिया राजनीतिक पन्ना!



कार्यक्रम में भोजन की व्यवस्था भी की गई थी। लेकिन भोजन काउंटर के आसपास जो तस्वीर सामने आई, उसने सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में चर्चा को और तेज कर दिया। हाथों में खाली पत्तल लिए कार्यकर्ता खड़े थे। कोई उसी पत्तल से हवा कर रहा था। कोई भोजन काउंटर की ओर देख रहा था। जंहा रखे भोजन का पात्र बिल्कुल खाली था! लोगो की माने तो भोजन खत्म हो गया था!भोजन आने का इंतजार में कार्यकर्ता खड़े थे ! इधर दर्शक दीर्घा में खाली होती कुर्सियां इस पूरी तस्वीर के साथ एक अलग ही कहानी कह रही थीं।

राजनीति में तस्वीरे सफाई से ज्यादा तेज बोलती है!

मंच पर सत्ता की भाषा थी, मैदान में बेचैनी की तस्वीर। हालांकि पार्टी के कुछ नेताओं ने इसे कार्यक्रम की लंबी अवधि और भोजन के लिए लोगों के उठने से जोड़कर देखा है। लेकिन राजनीति में तस्वीरें सफाई से ज्यादा तेज बोलती हैं। 

अब ‘साजिश’ की कहानी भी सामने!

खाली कुर्सियों को लेकर जदयू के कुछ नेताओं का दावा है कि कार्यक्रम को कमजोर करने की साजिश की गई। उनका कहना है कि बिना अनुमति भोजन काउंटर शुरू होने के कारण कार्यकर्ता वहां चले गए और वापस दर्शक दीर्घा में नहीं लौटे। मामले की जांच की बात भी कही जा रही है। अगर जांच में यह बात सच निकलती है तो मामला गंभीर होगा। लेकिन अगर ऐसा नहीं होता, तो सवाल और भी सीधा रहेगा— क्या नेतृत्व अपनी राजनीतिक कमजोरी का जवाब साजिश में खोज रहा है? फैसला जांच करेगी। लेकिन तस्वीरें सवाल पूछ चुकी हैं।

जिलाध्यक्ष बोले—अद्भुत कार्यक्रम हुआ!

जदयू जिलाध्यक्ष राजकुमार शर्मा ने कार्यक्रम को अद्वितीय बताया। उन्होंने खाली कुर्सियों की बात को पूरी तरह खारिज नहीं किया। उनका कहना था कि कार्यक्रम लंबा चला, इसलिए कुछ लोग भोजन करने चले गए। यह जवाब भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। क्योंकि बहस अब यह नहीं है कि भीड़ आई या नहीं। बहस यह है कि— भीड़ कितनी देर तक रही? और उससे भी बड़ा सवाल— भीड़ किसके लिए आई थी? वही 

जमीनी कार्यकर्ता का जोश रहा हाई !

जदयू के युवा एवं जमीनी कार्यकर्ताओ को जोश हाई था ! इस कार्यक्रम को लेकर जदयू के युवा एवं अनुभवी नेता धीरज कुशवाहा ने कहा कि यह किसी एक कार्यकर्ता की नही यह पुरी संगठन का मेहनत था कि ऐसा अद्भुत कार्यक्रम विश्वामित्र के इस पावन धरती पर सफलता पूर्वज सम्पन्न हुई ! यह कोई चुनावी कार्यक्रम नही था! यह बिहार की हित बिहार वासियों का हक की लड़ाई है! जंहा से बिहार में गंगा प्रवेश करती है! उसी पावन धरती से फरक्का जल संधि समझौता को रद्द करने की हुंकार हुई ! हमारे प्रधानमंत्री जी दूरदर्शी नेता है! और वह बिहार के हित में बड़ा कदम उठाएंगे ! राजनीति में विरोधियों का होना भी स्वाभाविक है! नही तो फिर राजनीति का कोई मतलब नही रह जायेगा ! 

सहयोगी सरकार में सड़क पर शक्ति प्रदर्शन क्यों?

कार्यक्रम के बाद जब संजय झा से पूछा गया कि केंद्र और बिहार में गठबंधन की सरकार होने के बावजूद जदयू को फरक्का के मुद्दे पर अलग से जनसंवाद क्यों करना पड़ रहा है, तो जवाब में पुराने राजनीतिक संदर्भ सामने रखे गए। लेकिन सवाल अपनी जगह कायम है। अगर केंद्र सरकार गठबंधन की साथी है, तो बिहार के जलहित का मुद्दा सत्ता के गलियारों में कितना प्रभावी ढंग से उठाया जा रहा है? और अगर जदयू को सड़क पर उतरकर अपना पक्ष जनता तक पहुंचाना पड़ रहा है, तो क्या यह सिर्फ जनजागरूकता अभियान है या राजनीतिक दबाव बनाने की कवायद भी? इन सवालों का जवाब आने वाला वक्त देगा।

असल खतरा फरक्का नहीं, खाली कुर्सियां हैं!

फरक्का जल संधि पर जदयू का अभियान आगे बढ़ेगा। पार्टी बिहार के 12 जिलों में संवाद करने वाली है। लेकिन बक्सर की पहली तस्वीर पार्टी के सामने एक ऐसा सवाल छोड़ गई है, जिसे किसी राजनीतिक नारे से ढका नहीं जा सकता। फरक्का से बिहार को कितना नुकसान हुआ—इस पर बहस बाद में भी हो सकती है। लेकिन बक्सर में जदयू की खाली कुर्सियां यह पूछ रही हैं— नीतीश कुमार के नाम के बिना क्या जदयू की भीड़ उतनी ही मजबूती से खड़ी रहेगी?  क्या कार्यकर्ता पार्टी के साथ हैं या चेहरे के साथ? क्या जनता जदयू के नेतृत्व को सुनने आई थी या नीतीश कुमार को देखने? और सबसे बड़ा सवाल— क्या दरकने लगी है नीतीश कुमार की 21 वर्षों की विरासत?

कही बड़े राजनीतिक संकेत को नजर अंदाज तो नही कर रहे है जदयू के नेता !

 बक्सर का जवाब अभी अंतिम नहीं है। लेकिन संकेत साफ है। भीड़ जुटी थी। भीड़ दिखाई भी गई। लेकिन भीड़ को रोकना मुश्किल हुआ। राजनीति में यही अंतर संगठन और नेतृत्व के बीच की दूरी बताता है। और अगर जदयू नेतृत्व ने इस तस्वीर को सिर्फ ‘कुछ खाली कुर्सियां’ समझकर टाल दिया, तो हो सकता है कि वह उस बड़े राजनीतिक संकेत को नजरअंदाज कर दे, जो बक्सर की जमीन ने दिया है। क्योंकि विरासत भाषणों से नहीं बचती। विरासत तब बचती है, जब नेता का नाम मंच से उतरकर कार्यकर्ता के भीतर जिंदा रहे। बक्सर में मंच पर नीतीश नहीं थे। और शायद इसी वजह से सवाल मंच से उतरकर सीधे जदयू के भविष्य तक पहुंच गया है—  नीतीश के बाद कौन? और उससे भी बड़ा सवाल— क्या वह चेहरा नीतीश की 21 साल की विरासत को संभाल पाएगा?

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