बक्सर के लोगो का आरोप - स्वच्छता पदाधिकारी ने बक्सर शहर का कर दिया कचरा! हनक ऐसी कि हड़कते हैं बड़े-बड़े साहब! उनके रसूख के आगे जिले का पूरा सिस्टम नतमस्तक!

 बक्सर के लोगो का आरोप - स्वच्छता पदाधिकारी ने बक्सर शहर का कर दिया कचरा! हनक ऐसी कि हड़कते हैं बड़े-बड़े साहब! उनके रसूख के आगे जिले का पूरा सिस्टम नतमस्तक! जहां चाहा बना दिया कूड़ा डंपिंग जोन! किला मैदान से लेकर नया बाजार में जमींदोज कर दिया हजारों टन लिगेसी वेस्ट के लिए रखा गया कचरा! गंगा नदी से महज 50-100 मीटर की दूरी पर बना दिया कचरा डंपिंग जोन, फिर भी खामोश हैं जिले के ‘बड़का साहब’!

बक्सर-  जिस अधिकारी के कंधे पर बक्सर शहर को साफ रखने की जिम्मेदारी है, उसी स्वच्छता पदाधिकारी ने पूरे शहर का कचरा कर दिया है! स्थानीय लोगों का आरोप है कि नगर परिषद के स्वच्छता पदाधिकारी रवि कुमार सिंह अपनी हनक और रसूख के दम पर शहर में जहां चाहते हैं, वहां कचरा डंप करवा देते हैं और ‘बड़का साहब’ भी चुप रह जाते हैं! स्थानीय लोग तंज कसते हुए कहते हैं—यह मजबूरी है या पर्दे के पीछे कोई और खेल चल रहा है, साहब?

रसूख ऐसा कि जहां चाहा कर दिया कूड़ा डंप!

हालात यह हैं कि आईटीआई रोड हो या किला मैदान, पिपरपांती रोड हो या सदर अस्पताल की सड़क—जब, जहां चाहा, कचरा डंप करा दिया! इससे जिला प्रशासन के बड़े-बड़े अधिकारियों की कार्यशैली पर भी गंभीर सवाल खड़ा हो गया है कि ये जिला मुख्यालय की सड़कें हैं या कूड़ा डंपिंग जोन? अब सवाल सिर्फ कचरे का नहीं है। सवाल यह है कि क्या स्वच्छता पदाधिकारी की हनक इतनी बड़ी हो गई है कि जिले के बड़े-बड़े अधिकारी भी उनके सामने कार्रवाई करने से हड़कते हैं?

आम आदमी को नियमों का पढ़ाते हैं ककहरा?

शहर की जनता को स्वच्छता का ककहरा पढ़ाने वाले नगर परिषद एवं जिला प्रशासन के अधिकारी आखिर सरकारी तंत्र की गलतियों पर सीधे कार्रवाई करने के बजाय पर्दा डालकर लीपापोती क्यों करते हैं? जब सरकारी सिस्टम खुद ही सार्वजनिक जगहों को कूड़ा डंपिंग प्वाइंट बना दे, तो फिर आम आदमी से नियम-कायदे की उम्मीद कैसे की जा सकती है?

शिकायत हुई तो पूर्व केंद्रीय मंत्री का फोन आने का दावा!

विभाग के ही एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर दावा किया कि एक सामाजिक व्यक्ति ने कूड़ा डंपिंग को लेकर शिकायत की थी। इसके बाद सीधे भारत सरकार के पूर्व मंत्री का फोन आने लगा। अधिकारी के मुताबिक, इसी वजह से लोग विरोध करने से बचते हैं। अगर यह दावा सही है तो सवाल बेहद गंभीर है—नगर परिषद के एक अधिकारी की शिकायत पर प्रशासनिक कार्रवाई के बजाय राजनीतिक फोन क्यों? और अगर फोन आया ही नहीं, तो संबंधित लोग इस दावे को सामने आकर खारिज क्यों नहीं करते? साहब लोगों की यही चुप्पी अब बक्सर में चर्चा का विषय बनी हुई है!


लिगेसी वेस्ट के नाम पर कचरा जमीन में दफन!


नगर परिषद के उपसभापति प्रतिनिधि सुनील मिश्रा ने स्वच्छता पदाधिकारी रवि कुमार सिंह पर सीधे और गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि स्वच्छता पदाधिकारी तानाशाह हैं! उनके हनक का अंदाजा इस बात से लगाइए कि जहां सब्जी मंडी लगाने के लिए लाखों रुपये खर्च किए गए, पेवर ब्लॉक लगाए गए, कई दिनों तक नगर परिषद के बुलडोजर चलते रहे, साफ-सफाई हुई, वहीं सब्जी मंडी लगनी थी, वहां कूड़ा डंप करा दिया गया! वह भी एसडीएम साहब के आवास के सामने, किला मैदान के पीछे, गंगा नदी से करीब 50 मीटर दूर और नहर के किनारे! और पूरा प्रशासनिक महकमा जुबान पर ताला लगाए बैठा है! आखिर इसके पीछे असली खेल क्या है?

एक काम के लिए तीन बार सरकारी फंड!



स्थानीय लोगों का आरोप है कि एक ही काम के लिए तीन बार सरकारी फंड का दुरुपयोग किया जा रहा है। ऐतिहासिक किला मैदान में लिगेसी वेस्ट के लिए रखे गए हजारों टन कचरे को जमीन में जमींदोज करा दिया गया। नया बाजार में भी हजारों टन कचरा जमीन में दफना दिया गया। क्या यह एनजीटी के नियमों का उल्लंघन नहीं है? क्या इससे हमारी मातृभूमि दूषित नहीं हो रही है?जहां किला मैदान में पहले कचरा था, वहां नगर परिषद कार्यालय ने चंद ईंटें बिछाकर करीब 9 लाख रुपये का बजट/प्राक्कलन तैयार कर दिया और उसकी राशि का बोर्ड भी वहीं लगा दिया गया। क्या यह भ्रष्टाचार नहीं है?

किसके आदेश पर जमीन में दफना दिया गया हजारों टन कचरा?



अब सवाल है— की लिगेसी वेस्ट के लिए रखा गया अगर हजारों टन कचरा जमीन में दबाया गया, तो किसके आदेश पर? किसकी अनुमति से? किस तकनीकी प्रक्रिया के तहत? और 9 लाख रुपये का प्राक्कलन आखिर किस काम के लिए तैयार किया गया? कचरा जमीन में दबाकर क्या पर्यावरणीय खतरा खत्म हो जाता है?

14 करोड़ सालाना वाला कचरा’—सिस्टम पर रामजी सिंह का तंज!



पूर्व उपसभापति प्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता रामजी सिंह ने नगर परिषद की सफाई व्यवस्था पर ऐसा तंज कसा है, जो पूरे सिस्टम पर सवाल खड़ा करता है।उनका कहना है कि शहर की सड़कों पर डंप किया जा रहा कचरा कोई सामान्य कचरा नहीं है, बल्कि ‘14 करोड़ सालाना वाला कचरा’ है। इससे दुर्गंध नहीं, इत्र की खुशबू आती है? तभी तो जिले के बड़े-बड़े अधिकारियों ने अपनी जुबान पर ताला लगा रखा है।

सब्जी मंडी की जगह बना दिया कूड़ा डंपिंग जोन!



रामजी सिंह के मुताबिक, किला मैदान के पीछे, एसडीएम आवास के ठीक सामने, जिस जगह सब्जी मंडी के नाम पर लाखों रुपये खर्च कर पेवर ब्लॉक लगाए गए, वहां फिर कूड़ा डंप किया जा रहा है। और यह कोई सुनसान जगह नहीं है। करीब 50 मीटर पर एसडीएम आवास, करीब 100 मीटर पर जिला जज एवं एडीएम, करीब 150 मीटर पर डीडीसी, करीब 100 मीटर पर सर्किट हाउस और करीब 200 मीटर पर जिलाधिकारी का आवास है! ऐसे में सवाल तो उठेगा ही—अगर साहबों के घर-दफ्तर के आसपास कचरा पड़ा है तो साहबों की नजर क्यों नहीं पड़ती ? या फिर कचरे का यह ढेर दिखाई देता है, लेकिन कार्रवाई करने का साहस नहीं होता?

गंगा किनारे कचरा, फिर भी किसका खौफ?


फाइल फ़ोटो

कचरा डंपिंग को लेकर एनजीटी के नियमों का भी हवाला दिया जा रहा है। कानून के जानकारों के अनुसार, गंगा किनारे कचरा डंपिंग को लेकर सख्त पर्यावरणीय प्रावधान हैं। स्थानीय स्तर पर 500 मीटर की दूरी और 50 हजार रुपये जुर्माने का दावा किया जा रहा है। लेकिन बक्सर में गंगा से महज 50 से 100 मीटर की दूरी पर दिन के उजाले में कचरा डंप किया जा रहा है। तो सवाल सिर्फ नगर परिषद से नहीं, जिला प्रशासन और पर्यावरण विभाग से भी है कि क्या गंगा बचाने की बातें मंचों से होंगी और गंगा किनारे कचरा डंप होता रहेगा?

अधिकारी का जवाब! स्थायी डंपिंग जोन नहीं है’?


स्वच्छता पदाधिकारी का जवाब - शहर की सड़कों पर कूड़ा डंप किए जाने को लेकर नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी कुमार ऋत्विक से सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि इसका जवाब स्वच्छता पदाधिकारी रवि कुमार सिंह देंगे। वहीं, रवि कुमार सिंह ने फोन पर साफ शब्दो में कहा कि यह स्थायी डंपिंग जोन नहीं है और कचरा जल्द हटाकर डंपिंग जोन में भेज दिया जाएगा। लेकिन उनका यही जवाब अब सबसे बड़ा सवाल बन गया है—जब यह डंपिंग जोन है ही नहीं, तो यहां कचरा डंप किसके आदेश पर कराया गया? अगर यह अस्थायी व्यवस्था है तो कितने दिन की अनुमति किसने दी है? और अगर जल्द हटना है तो कब हटेगा? या इसे भी जमीन में दफन कर राशि की निकासी की तैयारी है?

बक्सर पूछ रहा—यह शहर है या कचरे का साम्राज्य?

जिस अधिकारी की जिम्मेदारी शहर को स्वच्छ रखने की है, उसी अधिकारी पर शहर को कचरे में बदलने के आरोप लग रहे हैं। हजारों टन लिगेसी वेस्ट जमीन में दबाने का आरोप है। 9 लाख रुपये के प्राक्कलन पर सवाल है। गंगा किनारे कचरा डंपिंग का आरोप है। प्रशासनिक अधिकारियों के कार्यालयों के आसपास कूड़े के ढेर हैं। और इन सबके बीच सिस्टम की खामोशी है। आखिर यह खामोशी क्यों है? क्या स्वच्छता पदाधिकारी का रसूख इतना बड़ा है कि बड़े-बड़े साहब भी आंखें बंद कर लें? 

सवाल सीधा है साहब !

क्या नगर परिषद में कचरे के नाम पर जो पैसा खर्च हो रहा है, उसका हिसाब सार्वजनिक होगा? क्या लिगेसी वेस्ट को जमीन में दबाने के आरोप की जांच होगीक्या गंगा किनारे कचरा डंपिंग की पर्यावरणीय जांच होगी? और सबसे बड़ा सवाल—जिस अधिकारी को बक्सर साफ करना था, अगर उसी की कार्यशैली पर बक्सर को कचरा बनाने के आरोप लग रहे हैं, तो फिर शहर को साफ कौन करेगा? बक्सर की सड़क पर पड़ा कचरा सिर्फ गंदगी नहीं है। यह उस सिस्टम के मुंह पर पड़ा सवाल है, जो सब कुछ देखकर भी चुप है। अब जनता जानना चाहती है—बक्सर में सफाई का सिस्टम चल रहा है या कचरे का साम्राज्य?

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