श्रेय की चिंगारी में सुलग रही जिला जदयू की सियासत! संगठन बड़ा या किसी एक चेहरे की ब्रांडिंग? ‘

 

श्रेय की चिंगारी में सुलग रही जिला जदयू की सियासत!‘नीतीश संवाद’ के बाद खुला जदयू का अंदरूनी मोर्चा! पोस्टर से सोशल मीडिया तक श्रेय की जंग, भीड़ के दावे पर सवाल और कार्यकर्ताओं की मेहनत पर उठी आवाज—संगठन बड़ा या किसी एक चेहरे की ब्रांडिंग?

बक्सर- फरक्का जल संधि के मुद्दे पर जनता के बीच संवाद करने निकली जदयू को शायद अंदाजा नहीं रहा होगा कि कार्यक्रम खत्म होते-होते फरक्का पीछे छूट जाएगा और श्रेय का सवाल पार्टी के भीतर सियासी ज्वालामुखी बनकर धधकने लगेगा। मंच खाली हो गया, कुर्सियां समेट ली गईं, बैनर-पोस्टर उतर गए और नेताओं के भाषण भी खत्म हो गए, लेकिन ‘नीतीश संवाद’ के बाद सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस ने जिला जदयू के भीतर की उस गर्मी को बाहर ला दिया, जिसे अब तक संगठनात्मक अनुशासन की चादर में ढका जाता रहा होगा। सवाल अब यह नहीं कि कार्यक्रम में कितनी भीड़ आई? सवाल यह है कि उस भीड़ की राजनीतिक रसीद किसके नाम कटेगी?

श्रेय की चिंगारी ने पकड़ लिया संगठन का बारूद!


महीनों तक धूप, गर्मी और बरसात झेलकर पंचायत से बूथ तक कार्यकर्ता जुटते रहे। किसी ने पोस्टर लगाया, किसी ने लोगों को बुलाया, किसी ने वाहन की व्यवस्था संभाली तो किसी ने कार्यक्रम स्थल तक भीड़ पहुंचाने में भूमिका निभाई। लेकिन कार्यक्रम खत्म होते ही यदि सफलता का कैमरा किसी एक चेहरे पर टिक जाए तो सवाल उठना स्वाभाविक है—जिस संगठन ने पसीना बहाया, क्या उसकी मेहनत सिर्फ भीड़ का आंकड़ा है और चेहरा ही पूरी उपलब्धि का मालिक? यही सवाल अब सोशल मीडिया पर घूम रहा है। और राजनीति में सवाल जब अपने ही घर से निकलने लगें तो समझिए मामला महज पोस्ट का नहीं, अंदर जमा बारूद का है। ‘नीतीश संवाद’ का मंच फरक्का के पानी की बात कर रहा था, लेकिन मंच उतरते-उतरते जिला जदयू की राजनीति में ही पानी उबलने लगा।

बैनर पार्टी का, झंडा पार्टी का, कार्यकर्ता पार्टी के... फिर श्रेय किसका?

कार्यक्रम की तैयारी सामूहिक थी। पंचायत से लेकर प्रखंड और बूथ स्तर तक संगठन सक्रिय हुआ। पड़ोसी इलाकों से लोगों को बसों और छोटे वाहनों से लाया गया। शहर से बॉर्डर इलाके तक बैनर, पोस्टर और तोरणद्वारों से माहौल बनाया गया। यानी जमीन पर मेहनत का चेहरा संगठन था। फिर सवाल उठना लाजिमी है—जब बैनर पर पार्टी का नाम, झंडा पार्टी का, मंच पार्टी का और पसीना कार्यकर्ताओं का था, तो उपलब्धि का पोस्टर किसी एक चेहरे के नाम क्यों? क्या संगठन अब सिर्फ भीड़ जुटाने का इंजन है और राजनीतिक ब्रांडिंग का बोर्ड किसी एक नेता के नाम? क्या कार्यकर्ता चुनाव में झंडा उठाने के लिए है और कार्यक्रम की सफलता में श्रेय उठाने के लिए कोई दूसरा? यही सवाल इस पूरे विवाद को राजनीतिक बना रहा है।

एक कार्यक्रम, कई दावे और सोशल मीडिया पर खुला ‘श्रेय युद्ध’

कार्यक्रम के बाद सोशल मीडिया पर अलग-अलग दावों ने जदयू की अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया। एक तरफ आयोजन की सफलता और भीड़ जुटाने का श्रेय एक खास चेहरे को देने की कोशिश दिखाई दी, तो दूसरी तरफ पार्टी से जुड़े लोगों ने ही सवाल खड़े कर दिए। यानी लड़ाई अब यह नहीं कि कार्यक्रम सफल था या नहीं। लड़ाई यह है कि सफलता का प्रमाणपत्र किसके नाम जारी होगा? राजनीति में भीड़ दिखाई देती है, लेकिन उस भीड़ को जुटाने वाले कार्यकर्ता अक्सर कैमरे के पीछे रह जाते हैं। इस बार शायद कैमरे के पीछे खड़े वही लोग सवाल पूछ रहे हैं—मेहनत हमारी थी तो कहानी में नाम आपका क्यों? और यही सवाल जदयू के लिए सबसे असहज सवाल बनता जा रहा है।

‘ब्रांडिंग’ की होड़ में कहीं संगठन ही तो फुटनोट नहीं बन गया?



सोशल मीडिया पर टूना राम नाम की फेसबुक आईडी से कथित तौर पर की गई एक पोस्ट ने विवाद को और हवा दी। पोस्ट में कार्यक्रम की सफलता का श्रेय किसी एक नेता को दिए जाने पर सवाल उठाए गए और राजपुर के विधायक एवं पूर्व मंत्री संतोष निराला को संगठन को एकजुट रखने वाला नेता बताया गया। पोस्ट बाद में हटा दी गई, लेकिन डिजिटल राजनीति में डिलीट बटन सवालों को नहीं मिटाता। सवाल अब भी वहीं है—क्या सामूहिक संगठनात्मक मेहनत को किसी एक चेहरे की राजनीतिक ब्रांडिंग में बदलने की कोशिश हो रही है? और अगर नहीं, तो फिर श्रेय को लेकर यह बेचैनी क्यों? क्या किसी को यह डर है कि अगर सफलता का श्रेय संगठन को मिल गया तो किसी एक चेहरे की चमक थोड़ी कम हो जाएगी? या फिर पार्टी के भीतर अब कार्यकर्ता बनाम ब्रांडिंग की नई लड़ाई आकार ले रही है?

खाली कुर्सियों से ज्यादा गर्म हुआ श्रेय का सवाल



कार्यक्रम के दौरान कुछ समय बाद दर्शक दीर्घा में कुर्सियां खाली दिखाई देने को लेकर भी चर्चा हुई। जदयू नेताओं का कहना है कि कुछ लोग भोजन के लिए चले गए थे। विपक्ष ने इसे भीड़ और व्यवस्था पर सवाल उठाने का हथियार बना लिया। सोशल मीडिया पर भी भीड़ को लेकर अलग-अलग दावे सामने आए। एक नेता ने करीब डेढ़ हजार कुर्सियां लगाए जाने की बात कही, जबकि समर्थकों की ओर से इससे कहीं अधिक भीड़ के दावे किए गए। अब सवाल ने व्यंग्य का रूप ले लिया—जब कुर्सियां डेढ़ हजार थीं तो पांच हजार की भीड़ आखिर बैठी कहां? क्या बाकी भीड़ कुर्सियों के सपने में खड़ी थी? या फिर राजनीति में भीड़ का गणित भी मौसम की तरह बदलता है? बेशक वास्तविक संख्या का अंतिम फैसला अलग विषय है, लेकिन इतना साफ है कि कार्यक्रम के बाद कुर्सियों से ज्यादा श्रेय की गिनती हो रही है।

कांग्रेस ने तंज कसा, लेकिन असली बारूद बाहर से नहीं आया


कांग्रेस जिलाध्यक्ष पंकज उपाध्याय ने कार्यक्रम को ‘नीतीश संवाद’ की जगह ‘जदयू बचाओ कार्यक्रम’ करार देते हुए तंज कसा। विपक्ष के हमले को राजनीतिक बयान मानकर खारिज किया जा सकता है। लेकिन मुश्किल तब बढ़ती है जब विपक्ष के सवालों को ताकत देने वाले सुर अपने ही संगठन के भीतर से सुनाई देने लगें।राजनीति में विरोधी के हमले से निपटना आसान है। उसे विपक्ष की राजनीति कह दीजिए और आगे बढ़ जाइए।लेकिन अपने ही कार्यकर्ता अगर पूछने लगें कि ‘मेहनत का श्रेय कहां गया?’ तो जवाब देना मुश्किल होता है।क्योंकि उस वक्त सामने विरोधी नहीं होता। आईना होता है।

जिलाध्यक्ष बोले—कार्यकर्ताओं ने किया कमाल



जदयू जिलाध्यक्ष राजकुमार शर्मा ने कार्यक्रम को अद्भुत बताते हुए खाली कुर्सियों को लेकर कहा कि कुछ लोग भोजन के लिए चले गए थे। पूर्व जिलाध्यक्ष अशोक यादव ने भी सफलता का श्रेय किसी एक नेता को देने के बजाय एक-एक कार्यकर्ता की मेहनत को अहम बताया। वही इस कार्यक्रम के सुर्ख़ियो में रहे जदयू नेता धीरज कुशवाहा ने भी बूथ से जिला और प्रदेश स्तर तक के कार्यकर्ताओं की मेहनत को कार्यक्रम की सफलता का का सबसे बड़ा श्रेय बताते हुए कहा कि , जनतादल यू के एक -एक कार्यकर्ता एवं कुशल संगठन के नेतृत्व का ही देन है कि हमारे समाजवादी नेता नीतीश कुमार को यंहा की जनता ने सबसे अधिक दिनों तक बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में अपना आशीर्वाद देते रहे!यह सफलता संगठन और उससे जुड़े हजारो लाखो कार्यकर्ताओं की है ! इन बयानों की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि पार्टी के भीतर से ही सामूहिक श्रेय की तस्वीर सामने रखी गई।लेकिन फिर वही सवाल सामने खड़ा हो जाता है— अगर कार्यक्रम संगठन की सामूहिक मेहनत से सफल हुआ तो सोशल मीडिया पर किसी एक चेहरे की ब्रांडिंग का शोर क्यों? अगर कार्यकर्ता असली ताकत है तो उसकी मेहनत किसी नेता की राजनीतिक उपलब्धि का बैकग्राउंड पोस्टर क्यों बने? और अगर एक नेता ने वाकई असाधारण भूमिका निभाई है तो पार्टी खुलकर उसका श्रेय घोषित क्यों नहीं करती? यानी सवाल दोनों तरफ हैं और जवाब अभी किसी तरफ नहीं।

मंच पर एकता, मोबाइल स्क्रीन पर अलग-अलग दरबार!


यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दिलचस्प राजनीतिक पहलू है। मंच पर नेता साथ दिखाई देते हैं। फोटो में संगठन एक दिखाई देता है। भाषणों में सामूहिकता की बात होती है। लेकिन मोबाइल स्क्रीन पर समर्थकों के अपने-अपने नेता हैं। कोई अपने नेता को कार्यक्रम का नायक बता रहा है। कोई संगठन की सामूहिक शक्ति गिना रहा है। कोई दूसरे चेहरे को संगठन का असली सहारा बता रहा है। तो सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या जदयू की एकता मंच तक सीमित है और असली राजनीतिक खेमेबंदी मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई दे रही है? अगर नहीं, तो फिर यह श्रेय युद्ध इतना मुखर क्यों?

श्रेय की राजनीति ने खोल दी पुरानी गांठ!

यह विवाद केवल एक फेसबुक पोस्ट या एक कार्यक्रम का मामला मानकर खत्म कर देना शायद आसान होगा। लेकिन जिस तेजी से श्रेय का सवाल सोशल मीडिया पर उभरा, उससे यह संकेत जरूर मिल रहा है कि जिला संगठन के भीतर अपने-अपने राजनीतिक स्पेस को मजबूत करने की होड़ मौजूद है। मंच पर सब साथ हैं।लेकिन समर्थकों की लड़ाई अलग-अलग है। एक तरफ चेहरा बड़ा करने की कोशिश है। दूसरी तरफ संगठन को बड़ा बताने की कोशिश। एक तरफ भीड़ का हिसाब है।दूसरी तरफ कार्यकर्ता की मेहनत का हिसाब।।और इन दोनों हिसाबों के बीच सवाल सिर्फ एक है—जदयू में बड़ा कौन—संगठन या चेहरा?

विपक्ष को बैठे-बिठाए मिल गया हथियार

फरक्का जल संधि के मुद्दे पर जनता के बीच राजनीतिक संदेश देने निकली जदयू के सामने अब एक अतिरिक्त चुनौती खड़ी हो गई है। विपक्ष के सवाल अपनी जगह हैं, लेकिन पार्टी के भीतर की श्रेय की बहस ने उन सवालों को अतिरिक्त राजनीतिक ऑक्सीजन दे दी है। फरक्का का मुद्दा क्या था? कार्यक्रम का संदेश क्या था? जनता तक क्या पहुंचा? इन सवालों पर चर्चा होनी चाहिए थी।लेकिन चर्चा घूमकर यहां आ गई कि कार्यक्रम कराया किसने, भीड़ जुटाई किसने और श्रेय ले कौन रहा है?यानी जिस संवाद का विषय फरक्का था, उसका सबसे तीखा संवाद अब जदयू के भीतर ही चल रहा है।

‘नीतीश संवाद’ खत्म, अब ‘जदयू संवाद’ कब?



बक्सर में ‘नीतीश संवाद’ समाप्त हो गया है। लेकिन जिला जदयू के सामने शायद अब उससे ज्यादा जरूरी एक और संवाद है—‘जदयू संवाद’। ऐसा संवाद जिसमें पार्टी खुद अपने कार्यकर्ताओं से पूछे— क्या संगठन में व्यक्ति से बड़ा संगठन है? क्या कार्यक्रम की सफलता सामूहिक मेहनत है? क्या किसी एक चेहरे की ब्रांडिंग के लिए संगठनात्मक श्रम को पीछे किया जा सकता है? क्या कार्यकर्ता सिर्फ पोस्टर लगाने और भीड़ जुटाने के लिए है? और सबसे बड़ा सवाल— अगर श्रेय बांटने की नौबत आ जाए तो क्या पार्टी के भीतर भी हिस्सेदारी के दावे शुरू हो जाएंगे?

ज्वालामुखी अभी फटा नहीं, सिर्फ धुआं निकला है!

फिलहाल मंच उतर चुका है। पोस्टर हट चुके हैं। कुर्सियां समेटी जा चुकी हैं। नेता अपने-अपने राजनीतिक संदेश के साथ आगे बढ़ चुके हैं। लेकिन सोशल मीडिया पर उठी श्रेय की चिंगारी ने जिला जदयू की अंदरूनी राजनीति के उस हिस्से को जरूर उजागर कर दिया है, जो सामान्य दिनों में संगठनात्मक अनुशासन के पीछे छिपा रहता है।मंच पर फरक्का का पानी था, लेकिन मंच उतरते ही संगठन के भीतर लावा क्यों उबलने लगा? यह सवाल अभी बाकी है। क्योंकि भीड़ एक दिन जुटाई जा सकती है। पोस्टर एक रात में लगाए जा सकते हैं। तोरणद्वार कुछ घंटों में खड़े किए जा सकते हैं। लेकिन संगठन की असली ताकत न पोस्टर से बनती है, न सोशल मीडिया की ट्रेंडिंग पोस्ट से। वह बनती है कार्यकर्ता के भरोसे से। और जिस दिन वही कार्यकर्ता यह सवाल खुलकर पूछने लगे कि— “पसीना हमारा, झंडा हमारा, संगठन हमारा... फिर श्रेय किसी और का क्यों?” उस दिन मामला फेसबुक पोस्ट का नहीं रहेगा। वह संगठन की राजनीति का सवाल बन जाएगा। फिलहाल ‘नीतीश संवाद’ का मंच शांत है।।लेकिन जिला जदयू की सियासत का ज्वालामुखी शांत नहीं दिख रहा। चिंगारी निकल चुकी है। धुआं दिखाई देने लगा है। अब देखना यह है कि यह सिर्फ श्रेय की आग है या आने वाले दिनों में बक्सर जदयू की सियासत का कोई बड़ा विस्फोट?



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