विकास के शीश महल’ का जमीनी पोस्टमार्टम! टूटा ब्लैकबोर्ड, दफ्तरों के चक्कर और योजनाओं के बीच सवाल—आखिर विकास दिखता कहां है?

 80 साल की आजादी, फिर भी बक्सर बेहाल! जमीन पर कुछ नहीं, कागजों में सब तैयार ‘विकास के शीश महल’ का जमीनी पोस्टमार्टम! टूटा ब्लैकबोर्ड, दफ्तरों के चक्कर और योजनाओं के बीच सवाल—आखिर विकास दिखता कहां है?

बक्सर- आजादी के 80 साल बाद भी बक्सर की तस्वीर बदलने का दावा भले सरकारी कागजों और बैठकों में होता रहा हो, लेकिन जमीन पर हालात कई सवाल खड़े कर रहे हैं। दैनिक मजदूर से लेकर किसान, छात्र, युवा और गरीब परिवार तक अपनी छोटी-बड़ी समस्याओं के समाधान के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर हैं। अंचल कार्यालय से लेकर राजस्व कार्यालय, अनुमंडल और समाहरणालय तक लोगों के महीनों भटकने की शिकायतें सामने आ रही हैं।

सुविधा शुल्क का लगा आरोप !

बक्सर का भविष्य कचड़ा चुनने को मजबूर !

कई लोग आरोप लगाते हैं कि बिना कथित ‘सुविधा शुल्क’ के फाइलें आगे नहीं बढ़तीं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल यह है कि अगर सरकारी कार्यालयों में आम आदमी को अपने ही काम के लिए बार-बार चक्कर लगाना पड़ रहा है, तो शासन और प्रशासन की जवाबदेही आखिर किसके प्रति है! सवाल सीधा है—सुनवाई आखिर कहां होगी?

सारे विभागों का है वही हाल!


 शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य, जमीन से लेकर राशन, पर्यटन से लेकर स्वच्छता, खेल से लेकर पेयजल तक—शिकायतों की लंबी फेहरिस्त है। एक कार्यालय से दूसरे कार्यालय और एक अधिकारी से दूसरे अधिकारी तक पहुंचती शिकायतें आम आदमी के लिए राहत के बजाय नई तारीख और नए चक्कर का कारण बनती दिखाई देती हैं। छोटे अधिकारी की शिकायत बड़े अधिकारी तक पहुंचती है, फिर जांच, रिपोर्ट और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जाती है। लेकिन जमीन पर परिणाम कब दिखाई देगा, यह सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है।

एक प्लॉट, एक रिजेक्ट, एक सजेस्ट!

बक्सर अंचल के किसान भानु की शिकायत राजस्व व्यवस्था की जटिलता को सामने रखती है। उनका कहना है कि चार भाई-बहनों के बीच एक ही जमीन का आपसी बंटवारा हुआ। अन्य हिस्सेदारों का दाखिल-खारिज हो गया, लेकिन उनका आवेदन रिजेक्ट कर दिया गया। भानु का आरोप है कि आवेदन के पहले कर्मचारी की ओर से फोन कर कुछ ऐसा करने को कहा गया, जिसे वह पूरा नहीं कर सके। इसके बाद उनका दाखिल-खारिज नहीं हुआ। महीनों कार्यालय के चक्कर लगाने के बाद उन्होंने डीसीएलआर कोर्ट में अपील की। अब कर्ज लेकर मुकदमे की पैरवी और तारीखों का खर्च उठाने की बात कह रहे हैं। सवाल है कि —अगर एक ही जमीन के हिस्सेदारों में कुछ का दाखिल-खारिज हो गया और एक का आवेदन खारिज हुआ, तो इसकी वजह क्या थी? क्या पूरी प्रक्रिया की पारदर्शी जांच हो सकती है?

वरीय अधिकारी का आदेश भी फाइलों में?

विश्वकर्मा यादव की शिकायत इससे भी गंभीर सवाल उठाती है। उनका कहना है कि दाखिल-खारिज का आवेदन रिजेक्ट होने के बाद उन्होंने डीसीएलआर कोर्ट में अपील की और उनके पक्ष में आदेश भी हुआ। बावजूद इसके महीनों बाद भी दाखिल-खारिज लंबित है। हर दिन कार्यालय पहुंचने पर कथित तौर पर एक ही जवाब मिलता है—“हो जाएगा।” लेकिन सवाल यह है कि आखिर कब होगा? अगर वरीय न्यायिक/राजस्व प्राधिकारी के आदेश के बाद भी मामला लंबित है, तो आदेश के अनुपालन की जिम्मेदारी किसकी है?

हजारों टन कचरा जमीन में दफन, जवाबदेह कौन?

शहर में कचरा प्रबंधन भी सवालों के घेरे में है। युवा मैथेमैटिशियन संदीप ठाकुर ने सर्किट हाउस के पीछे और नया बाजार इलाके में कचरा दबाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि बड़ी मात्रा में कचरा जमीन में दबाया गया। यदि यह लिगेसी वेस्ट था, तो क्या इसका वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेसिंग और निस्तारण किया गया? क्या पर्यावरणीय मानकों का पालन हुआ? क्या जमीन और भूजल की जांच कराई गई? कचरा जमीन में दबा दिया गया तो भविष्य में उससे होने वाले संभावित पर्यावरणीय नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?

किला मैदान में खेल का मैदान या सिर्फ कागजों का खेल?

ऐतिहासिक किला मैदान में क्रिकेट खेलने वाले युवाओं की शिकायत है कि खेल सुविधाओं की स्थिति अपेक्षा के अनुरूप नहीं है। खिलाड़ियों का सवाल है कि जब मैदान, प्रशिक्षण और जरूरी संसाधनों की बुनियादी सुविधाएं ही पर्याप्त नहीं होंगी तो खेल प्रतिभाएं तैयार कैसे होंगी? सरकार खेल प्रतिभाओं को आगे बढ़ाने और पदक जीतने की बात करती है। लेकिन सवाल—मैदान कहां है? कोचिंग कहां है? प्रशिक्षण की व्यवस्था कहां है? और खिलाड़ियों के लिए स्थायी खेल ढांचा आखिर कब बनेगा?

पर्यटन के नाम पर विरासत का हिसाब कौन देगा?

बक्सर की पहचान इतिहास और धार्मिक विरासत से जुड़ी है। लेकिन स्थानीय लोग लगातार सवाल उठा रहे हैं कि पर्यटन विकास की योजनाओं का वास्तविक लाभ जमीन पर कितना दिखाई दे रहा है। महारानी ताड़का का मंदिर और प्रतिमा की स्थिति क्या है? महर्षि नारद आश्रम की जमीन का क्या हुआ? त्रेतायुग से जुड़े विश्राम सरोवर और कताकौली मैदान की स्थिति क्या है? क्या सिर्फ लाइट एंड साउंड और सौंदर्यीकरण की परियोजनाओं से बक्सर पर्यटन नगरी बन जाएगा, या ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की भी कोई ठोस योजना है?

सड़क, नशा और राशन—हर जगह सवाल!

जिला मुख्यालय की सड़कों की बदहाली पर भी लोग सवाल उठा रहे हैं। वहीं एक चिकित्सक ने नाम न छापने की शर्त पर कुछ मेडिकल दुकानों से कथित तौर पर नशीली दवाओं की बिक्री की शिकायत की है। आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल गंभीर है। यदि शिकायतें मिलती हैं तो ड्रग इंस्पेक्टर की जांच और कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं होना चाहिए? राशन कार्ड से नाम कटने की शिकायतें भी सामने आ रही हैं। गरीब परिवार महीनों कार्यालय के चक्कर लगाने की बात कह रहे हैं। वहीं टीबी मरीजों की ओर से पोषण सहायता राशि मिलने में देरी की शिकायतें भी सामने आती रही हैं।

पानी के लिए तरसते परिवार, अधिकारी तक पहुंचना मुश्किल?

सिमरी प्रखंड की एक दलित बस्ती में पेयजल संकट की शिकायत भी सामने आई है। ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभाग के अधिकारी से संपर्क की कोशिश के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। ग्रामीणों के मुताबिक कई दिनों तक फोन करने और कार्यालय जाने के बाद भी राहत नहीं मिली। सवाल—जब ‘हर घर नल का जल’ जैसी योजनाएं चल रही हैं, तब आज भी किसी बस्ती के परिवारों को साफ पानी के लिए अधिकारियों के दरवाजे क्यों खटखटाने पड़ रहे हैं?

शिक्षा क्रांति का दावा, स्कूल में टूटा ब्लैकबोर्ड!



कुसरूपा मध्य विद्यालय है साहब ! शिक्षा क्रांति स्थल !?

सबसे बड़ा सवाल शिक्षा व्यवस्था पर है। जिले के एक सरकारी विद्यालय से जुड़े दो शिक्षकों पर नाबालिग छात्रा से संबंधित गंभीर आरोपों के मामले में पुलिस कार्रवाई कर रही है। मामला जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है, इसलिए आरोपों की अंतिम सत्यता अदालत और जांच के निष्कर्ष से ही तय होगी। लेकिन इस घटना ने स्कूलों की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं। जब स्कूलों में नियमित निरीक्षण, वीसी, बैठकें, शोकॉज और विभागीय समीक्षा होती है, तो ऐसी गंभीर शिकायतें समय रहते सामने क्यों नहीं आतीं? टुटा हुआ ब्लैक बोर्ड से  क्या आएगी शिक्षा में क्रांति ! कुसरूपा मध्य विद्यालय में टूटा हुआ ब्लैकबोर्ड बच्चों की शिक्षा व्यवस्था की दूसरी तस्वीर दिखाता है। वहीं विद्यालय में शिक्षक के कुर्सी पर पैर रखकर मोबाइल चलाने की तस्वीर/शिकायत भी व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है। सवाल—जिस स्कूल में बच्चों को पढ़ाने के लिए बुनियादी ब्लैकबोर्ड तक दुरुस्त नहीं है, वहां शिक्षा क्रांति का दावा आखिर किस आधार पर है? और अगर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ हमारा नारा है, तो बेटियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी तय करने वाली निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?

कार्यालयों और कागजों में उलझी आम आदमी की जिंदगी!

जन्म प्रमाणपत्र से मृत्यु प्रमाणपत्र तक, आय-आवासीय प्रमाणपत्र से जमीन और राशन तक—आम आदमी की जिंदगी कागजों और कार्यालयों के बीच उलझती नजर आती है। योजनाओं की सूची लंबी है। घोषणाएं बड़ी हैं। बैठकों के आंकड़े भी शानदार हैं। लेकिन जमीन पर सवाल वही है— क्या लाभार्थी तक योजना पहुंची? क्या किसान को समय पर राहत मिली? क्या छात्र को बेहतर स्कूल मिला? क्या गरीब को राशन मिला? क्या मरीज को इलाज मिला? क्या नागरिक को बिना भटकाए उसका काम हुआ? और क्या अधिकारी ने कभी फाइल से बाहर निकलकर उस जमीन की हकीकत देखी, जिसके विकास की रिपोर्ट कागज पर तैयार होती है?

बक्सर पूछ रहा है—साहब, ‘विकास के शीश महल’ में आंकड़ों की चमक बहुत है, लेकिन कभी जमीन पर उतरकर उसका जमीनी पोस्टमार्टम भी कराइए। क्योंकि जनता अब सिर्फ विकास की कहानी सुनना नहीं चाहती, वह विकास को अपनी आंखों से देखना चाहती है।

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