श्रेय की ट्रेन में हमारी सीट कहां है साहब? गुमटी बंद, है और श्रेय का गेट पहले ही खोल दिया! फाटक खुलने दीजिए साहब, श्रेय की प्लेट बाद में भी लगा लीजिएगा ! इटाढ़ी फाटक पर ‘एक अनार, सौ बीमार’—ताला रेलवे के हाथ में, चाबी का दावा नेताओं के पास ! कोई दिल्ली से लौटा तो कोई धरने से, कोई चिट्ठी लेकर खड़ा है तो किसी ने ट्रैक्टर चढ़ाकर रच दिया इतिहास!
बक्सर। इटाढ़ी रेलवे गुमटी के सामने इन दिनों नजारा कुछ ऐसा है कि फाटक बंद है, लेकिन राजनीति का गेट पूरी तरह से खुल चुका है। जनता रास्ता खुलने का इंतजार कर रही है और नेता श्रेय की ट्रेन में अपनी-अपनी सीट पक्की करने में जुटे हैं। रेलवे की तकनीकी और प्रशासनिक प्रक्रिया अभी पूरी होनी बाकी है, लेकिन सोशल मीडिया पर उपलब्धियों की ऐसी बौछार है, मानो गुमटी खुल चुकी हो और अब सिर्फ उद्घाटन की तारीख तय होनी बाकी हो। कहावत है—‘एक अनार, सौ बीमार।’ इटाढ़ी गुमटी के मामले में यह कहावत पूरी तरह चरितार्थ होती दिख रही है। फाटक खुलने की संभावित उपलब्धि एक है, लेकिन दावेदार इतने कि गिनते-गिनते रेलवे का टाइम टेबल ही बदल जाए।श्रेय के दावेदारों की लंबी कतार
बीजेपी नेता शौरभ तिवारी भी दावा कर रहे हैं कि उन्होंने विधायक और सांसद से पहले रेलवे अधिकारियों के सामने गुमटी खोलने की मांग उठाई थी। आंदोलन से जुड़े सरोज राजभर, कृष्णवती देवी समेत कई लोग अपनी भूमिका बता रहे हैं। उनका तर्क है—धरना हमने दिया, आंदोलन हमने किया, रेल चक्का जाम हमने किया, तो श्रेय की ट्रेन में हमारी सीट कहां है? दृश्य कुछ ऐसा बन गया है—रेलवे: ताला मेरे पास है।
नेता: चाबी मेरे पास है।
आंदोलनकारी: चाबी की मांग हमने की थी।
समर्थक: खोलवाया तो हमारे नेता ने ही है।
जनता: भाई, पहले खोल तो दो!
ट्रैक्टर चालक बना ‘ब्रांड एम्बेसडर’
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प किरदार वह ट्रैक्टर चालक है, जिसने संकीर्ण एफओबी पर ट्रॉली समेत ट्रैक्टर चढ़ाकर व्यवस्था की असली तस्वीर सामने रख दी। कार्रवाई झेली, जेल गया और फिर भी इटाढ़ी गुमटी की समस्या को चर्चा के केंद्र में ला दिया। लोगों ने उसे गुमटी का ‘ब्रांड एम्बेसडर’ तक कहना शुरू कर दिया। लेकिन सवाल यह है कि जिसने जोखिम उठाया, उसकी चर्चा कितनी और श्रेय की राजनीति में उसका हिस्सा कितना?रामजी सिंह का सवाल—तस्वीर से फैसला नहीं होता
सामाजिक कार्यकर्ता रामजी सिंह ने रेलवे अधिकारियों के साथ अपनी भी एक तस्वीर साझा करते हुए, तस्वीरों पर सवाल उठाते हुए कहा कि “तस्वीर प्रधानमंत्री के साथ भी हो तो क्या कोई केंद्रीय मंत्री बन जाता है?” उनका कहना है कि जिसके पास रेलवे का लिखित आदेश होगा, श्रेय उसी का माना जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि नेता रेलवे फाटक खुलने का श्रेय लेने के लिए आगे हैं तो इटाढ़ी आरओबी के टूटने का श्रेय लेने कोई सामने क्यों नहीं आता?रेल फाटक खोलने वाला आदेश किसके पास !
जिसके पत्र पर गुमटी खुल रही है—पत्र दिखाइए। जिसके प्रयास से रेलवे बोर्ड ने फैसला लिया—लिखित मंजूरी दिखाइए। जिस मुलाकात के बाद निर्णय हुआ—उसका आधिकारिक परिणाम बताइए।।मंत्री और अधिकारी के साथ तस्वीर होना एक बात है और उस तस्वीर के कारण सरकारी निर्णय होना दूसरी बात। जनता को फोटो नहीं, रास्ता चाहिए। प्रेस विज्ञप्ति नहीं, फाटक खुला हुआ चाहिए। इटाढ़ी गुमटी खुलती है तो जनता खुद तय करेगी कि किसने संघर्ष किया, किसने मांग उठाई, किसने आंदोलन किया और किसकी भूमिका कितनी रही।इतिहास में श्रेय लिखवाने के लिए प्रेस विज्ञप्ति नहीं, काम चाहिए।
इसलिए नेताओं से बस इतनी गुजारिश है— फाटक खुलने दीजिए… श्रेय की प्लेट बाद में लगा लीजिए। क्योंकि बक्सर की जनता अब इतनी भोली नहीं कि बंद गुमटी के सामने खड़े होकर खुले विकास की तस्वीर पर भरोसा कर ले। फाटक का ताला रेलवे खोलेगा, लेकिन श्रेय का ताला नेताओं ने पहले ही तोड़ दिया है। बक्सर की जनता रास्ता खोज रही है… और यंहा के नेता इतिहास में अपना रास्ता बनाने के लिए बेताब दिखाई दे रहे है!पंकज उपाध्याय और सरोज राजभर की टीम के बदौलत रेल फाटक खुलने की बढ़ी है उम्मीद !
वही स्थानीय लोगो की माने तो कांग्रेस एवं दलित अतिपिछड़ा मोर्चा के सभी टीम के सदस्य इसके हकदार है! जिन्होंने खेतीबाड़ी के मौसम में अपने घर का सारा काम छोड़कर जनता की आवाज को मजबूत करने के लिए धरना, रेल चक्का जाम एवं एफआईआर का दंश झेला! बाकी तो नाखून कटवाकर शाहिद होने वालों की संख्या यंहा कम नही है!






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