36 साल में बक्सर का सबसे बड़ा संक्रमण काल? टूटा ब्लैकबोर्ड, दम तोड़ती लाइफलाइन, बदहाल किसान, तार-तार होते शिक्षा के मंदिर और सरकारी दफ्तरों में सवालों की कब्र! जनता पूछ रही—कागज पर जेट प्लेन की रफ्तार से दौड़ता विकास जमीन पर आखिर रेंग क्यों रहा है?
बक्सर - 17 मार्च 1991 को जब बक्सर जिला बना था, तब लोगों ने सिर्फ एक प्रशासनिक नक्शा नहीं देखा था, उन्होंने अपने भविष्य की नई तस्वीर देखी थी। उम्मीद थी कि अब हक के लिए दर-दर नहीं भटकना पड़ेगा, गांव की आवाज जिला मुख्यालय तक पहुंचेगी और विकास की गाड़ी गांव की पगडंडी से निकलकर शहर की सड़क तक पहुंचेगी। लेकिन 36 साल बाद बक्सर जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां सवाल सिर्फ विकास का नहीं है। सवाल व्यवस्था के चरित्र का है। क्योंकि तस्वीरें अलग-अलग हैं, लेकिन दर्द एक है।टूटा ब्लैकबोर्ड, उसके सहारे बच्चों का भविष्य!
सरकारी स्कूल में टूटे हुए ब्लैकबोर्ड के सहारे बच्चों का भविष्य गढ़ने का दावा किया जा रहा है। कागजों पर किसान के खेत में सारी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। अन्नदाताओं की टूटी उम्मीदों को हौसलों की उड़ान देने के दावे हो रहे हैं। शहर की सड़कों के साथ लोगों की जिंदगी टूट रही है। गांव की लाइफलाइन बदहाली की तस्वीर बनी हुई है। सरकारी दफ्तरों में फाइलों के साथ जनता का अधिकार अटका हुआ है। मंदिर परिसर से चंदन के पेड़ कट रहे हैं। तो सवाल पूरे सिस्टम से है—साहब, वेतन किस बात का लेते हो, जब काम ही नहीं करते हो? पूरा सिस्टम आईने के सामने खड़ा है! 26 करोड़ का ROB 96 घंटे में सवाल बन गया, तो व्यवस्था पर सवाल उठेगा ही। बेरोजगार नौजवान रील बना रहा है। किसान सरकारी बाबू के कार्यालय का चक्कर लगा रहा है। शिक्षा के मंदिर तार-तार हो रहे हैं। मौत का सर्टिफिकेट लेने में लोगों को मौत से जूझना पड़ रहा है। बक्सर के लोगों की खामोश चीखों ने पूरे सिस्टम को आईने के सामने खड़ा कर दिया है। उस आईने में जिम्मेदारों को अपनी ही बदसूरत तस्वीर दिखाई दे रही है और शायद यही वजह है कि अब कई चेहरे सवालों से बचते नजर आ रहे हैं।
यह बदहाली नहीं, व्यवस्था का संक्रमण काल है!
बक्सर की मौजूदा तस्वीर को सिर्फ “व्यवस्था की कमी” कहकर छोड़ देना आसान है। लेकिन तस्वीर इससे कहीं ज्यादा गंभीर है। यह वह दौर है, जहां समस्या पैदा होने के बाद सिस्टम नही जागता है, शिकायत वायरल होने के बाद फाइल चलती है और कार्रवाई तब दिखाई देती है, जब मामला जनता की नजर में आ चुका होता है। तो चंद लोगो पर कार्रवाई शो कॉज करके मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है! साहब जब स्कूलों का निरीक्षण हो रहा है! सेल्फी डाले जा रहे है! मोनिटरिंग हो ही रही है! उसके बाद भी शिक्षा के मंदिर में ही बेटियों के अस्मत से खिलवाड़ कैसे हो रहा है! टुटा हुआ ब्लैक बोर्ड की मरम्मत क्यो नही हो रहा है! 7 वे क्लास के कई सरकारी बच्चे 12 तक टेबल नही जानते है! और आप ककहरा पढ़ाकर उन्हें साइंटिस्ट बनाने का दावा कर रहे है! जिस शिक्षा के मन्दिर में छात्र -छात्राओं का भविष्य उनका पुस्तक उनका खेल उपकरण शौचालय में बन्द हो वह बच्चा तेंदुलकर और कलेक्टर कैसे बनेगा ! सेल्फी से या सोशल मीडिया में चंद तस्वीरे डालकर सरकारी योजना पर डाका डालने से!
मामला पुराना था तो फाइलें धूल क्यों फांक रही थीं, साहब?
शिक्षा विभाग में पिछले दिनों सामने आए मामलों ने इस सवाल को और बड़ा कर दिया। स्कूल, जहां बच्चों को भविष्य की पहली इबारत लिखनी चाहिए, वहीं बच्चों के साथ दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप सामने आए। दो शिक्षकों पर छात्राओं के साथ दुष्कर्म के आरोप सामने आए और पुलिस कार्रवाई शुरू हुई। जिला प्रशासन के साहब कहते है मामला पुराना था ! तो साहब बताइए फाइले धूल क्यो फांक रही थी ! सवाल सिर्फ आरोपियों पर कार्रवाई का नहीं है। सवाल यह है कि बच्चों की चीख सिस्टम की दीवारों से टकराकर बाहर आने में इतनी देर क्यों लगती है? और काहे की निगरानी व्यवस्था, साहब? स्कूल में बच्चियों के साथ हुई हैवानियत की शिकायत अगर पहले की गई थी, तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई ! अगर निगरानी व्यवस्था थी, तो उसकी आंखें कहां थीं? और अगर सोशल मीडिया की आंख खुलने के बाद सरकारी आंख खुलती है, तो फिर करोड़ों रुपये की निगरानी व्यवस्था पर खर्च किसलिए किया जा रहा है?टूटा ब्लैकबोर्ड सिर्फ लकड़ी का टुकड़ा नहीं, आपके जिला के व्यवस्था का रिपोर्ट कार्ड है!
बक्सर के सरकारी विद्यालयों की तस्वीर को किसी भाषण से नहीं समझा जा सकता। उसे उस बच्चे की आंखों से देखना होगा, जो टूटे ब्लैकबोर्ड के सामने बैठकर अपना भविष्य पढ़ रहा है। जिस देश में डिजिटल शिक्षा की बात हो रही है, स्मार्ट क्लास की बात हो रही है, तकनीक से बच्चों को जोड़ने के दावे हो रहे हैं, वहां अगर किसी बच्चे को आज भी टूटे ब्लैकबोर्ड के सहारे पढ़ना पड़े, तो यह सिर्फ विद्यालय की खराब हालत नहीं है। यह आपकी कार्य क्षमता और आपके जिले का रिपोर्ट कार्ड है! यह उस व्यवस्था का आईना है, जिसने बच्चे को तो देख लिया, लेकिन उसके सामने का ब्लैकबोर्ड नहीं देखा। यही सबसे बड़ा फर्क है। किसी के लिए शिक्षा सुविधा है, तो किसी के लिए उम्मीद!बक्सर में साहब के बच्चे के लिए शिक्षा सुविधा है, जबकि गरीब के बच्चे के लिए शिक्षा उम्मीद है। एक के पास लैपटॉप है। दूसरे के सामने टूटा ब्लैकबोर्ड।फिर दोनों से समान भविष्य की उम्मीद कैसे?
किसान कमजोर नहीं, व्यवस्था से लड़ता फौलादी इंसान है!
बक्सर का किसान इस जिले की सबसे मजबूत कड़ी है।44 डिग्री तापमान में खेत में उतरता है। बाढ़ आती है तो पानी में खड़ा रहता है। सूखा पड़ता है तो आसमान देखता है। मौसम की मार आती है तो महीनों की मेहनत मिट्टी में मिल जाती है। लेकिन किसान टूटता नहीं। वह अगली सुबह फिर हल और कुदाल लेकर खेत में उतरता है। यही उसकी फौलादी ताकत है। उसे वेतन के बाद कमीशन की लालच नही है! उसे अपनी बाजुओं पर भरोसा है! जिस क्रॉप कटिंग के नाम पर हंसिया लेकर अधिकारी सेल्फी लेते है! रील बनाते है! वह किसान और उसके बच्चे सड़को पर भुखमरी के कगार पर है! किसान कार्यालय के एक छोटा साहब 8 बर्षो में बक्सर से लेकर बनारस तक पांच आलीशान बिल्डिंग बना ली है क्या वह उनके मेहनत की कमाई है या किसानों का हकमारी है! सवाल यह है—क्या सिस्टम भी किसान जितना मजबूत है?
मुआवजे के लिए साहब के कार्यालयों का चक्कर, फिर भी हाथ खाली!
2025 की बाढ़, फसल कटनी के समय मौसम की मार और फसल क्षति के बाद किसानों के मुआवजे को लेकर उठे सवाल बताते हैं कि खेत में नुकसान के बाद असली संघर्ष कई बार सरकारी कार्यालय की चौखट पर शुरू होता है। किसान खेत में प्रकृति से लड़कर जीत भी जाए, तो कागज की लड़ाई में क्यों हार जाता है ? जिस हाथ ने अन्न उगाया, वही हाथ मुआवजे के लिए फाइल क्यों ढोए?।यह सवाल सिर्फ किसान का नहीं है। यह उस व्यवस्था से है, जो किसान को देश का अन्नदाता तो कहती है, लेकिन उसके नुकसान का हिसाब लगाते समय नियमों की इतनी दीवार खड़ी कर देती है कि किसान उस दीवार के बाहर खड़ा रह जाता है। जिले में बीज, यूरिया और डीजल अनुदान के साथ क्षतिग्रस्त फसल का मुआवजा कितना मिला इसकी जानकारी जब साहब को ही नही है तो तो बेचारा किसान का करे ! एसी कमरे की लजीज व्यंजन खाकर नही भूखे पेट रहकर अपने बच्चों को किताब कलम देता है! उस शिक्षा के मंदिर को तो कलंकित कर दिया !36 बर्षो में कभी नही था जिले का इतना बुरा हाल !
युवा पीएचडी के मैथेमैटिशियन संदीप कहता है ! बक्सर जिला का स्थापना से लेकर अब तक जिले का इतना बुरा हाल कभी था ही नही ! चारो तरफ त्राहिमाम मचा हुआ है! जिनके कंधे पर जिले की जिम्मेवारी है! वह भी फोन नही उठाते आरजकता का स्थिति बनी हुई है! अंचल कार्यालय में सुविधा देने के लिए गहना गिरवी रखकर लोग जमीन का दाखिल खारिज करवाने के लिए मजबूर है! केवल किला मैदान में खुला मंच से ग्यारहों प्रखण्ड के लोगो को बुलाकर उनकी समस्या बता दिया जाए तो सिस्ट्म बहरा हो जाएगा !
सड़क नहीं, गांव की लाइफलाइन है—इसे तोड़कर विकास का भाषण मत दीजिए!
बक्सर में सड़क की बदहाली को महज सड़क की समस्या समझना सबसे बड़ी भूल होगी। गांव की सड़क उसके लिए सिर्फ सड़क नहीं, लाइफलाइन है। इसी रास्ते से किसान खेत से मंडी जाता है। इसी रास्ते से गर्भवती महिला अस्पताल पहुंचती है। इसी रास्ते से शव को श्मशान घाट ले जाया जाता है। इसी रास्ते से बच्चा स्कूल जाता है। इसी रास्ते से दूध शहर पहुंचता है। इसी रास्ते से मजदूर रोजी कमाने जाता है। और इसी रास्ते से एंबुलेंस जिंदगी बचाने दौड़ती है। सिंडिकेट नहर से ज्योति चौक, बक्सर गोलंबर से जासो, भैया-नादांव और ग्रामीण इलाकों की बदहाल सड़कों पर सवाल इसलिए बड़ा है, क्योंकि टूटी सड़क सिर्फ गड्ढा नहीं बनाती, वह गांव और विकास के बीच की दूरी बढ़ाती है। राजधानी तक पहुंचने की रफ्तार का दावा अपनी जगह है। लेकिन सवाल है—जिस ग्रामीण की सड़क ही उसे गांव से बाहर निकलने नहीं दे रही, उसके लिए विकास की एक्सप्रेसवे कहानी किस काम की?
26 करोड़ का पुल 96 घंटे में सवाल बन गया!
इटाढ़ी गुमटी पर बना करीब 26.40 करोड़ रुपये का ROB उद्घाटन के महज 96 घंटे बाद क्षतिग्रस्त होने के बाद निर्माण गुणवत्ता पर सवालों के घेरे में आया। प्रशासन ने सुरक्षा कारणों से आवागमन रोक दिया। यह सिर्फ एक पुल की कहानी नहीं है। यह जनता के पैसे और सरकारी गुणवत्ता नियंत्रण का सवाल है। 11 साल के इंतजार के बाद जनता को पुल मिला और कुछ ही दिनों में पुल खुद जांच का विषय बन गया। आज जनता पूछ रही है—सीमेंट किसका था, साहब? गुणवत्ता जांच किसने की? जिम्मेदारी किसकी थी? और अगर निर्माण में कमी थी, तो निगरानी तंत्र ने उसे पकड़ा क्यों नहीं? पुल के क्षतिग्रस्त होने से बड़ा सवाल अब यह है कि जिम्मेदारी भी उसी तेजी से तय होगी या फाइलों में उसकी उम्र भी 36 साल हो जाएगी?
मंदिर की दीवार चढ़ गया चोर, व्यवस्था की दीवार कहां थी?
नाथ बाबा मंदिर परिसर से चंदन के विशाल पेड़ों की चोरी ने सुरक्षा व्यवस्था को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। दीवार पार हुई। पेड़ कटे। लकड़ी बाहर गई। और कई घंटे तक किसी को खबर नहीं हुई। बाद में लकड़ी बरामद होने की बात सामने आई, लेकिन अपराधियों तक पहुंचने में इतना विलंब क्यों हो रहा है? लोग पूछ रहे है क्या कोई बड़ा रसूख वाला चोर है! या सिस्ट्म का ही कोई सेटिंग है! क्योकि बक्सर की पुलिस का कार्य क्षमता पूरे बिहार में अव्वल है! चंद घण्टो में अपराधियो को पाताल से घसीट लाने का रिकॉर्ड है! फीर यह मामूली चोर को आसमान निगल गया या जमीन ! और यहां सवाल सिर्फ चोर का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जिसकी नाक के नीचे पेड़ कट गया और पहरेदार व सेवादार खड़े देखते रह गए। आस्था के मंदिर की सुरक्षा अगर इतनी कमजोर है, तो आम आदमी अपनी संपत्ति की सुरक्षा के लिए किसके भरोसे पर खड़ा रहेगा?सरकारी कार्यालय में शराब!
परिवहन विभाग के सरकारी कार्यालय की अलमारी में शराब मिली—सवाल बोतल का नहीं, सिस्टम की चाबी का है! परिवहन कार्यालय में शराब की बोतलें मिलने का मामला भी इसी कड़ी की एक और तस्वीर है। जांच अपनी जगह है। लेकिन सवाल बिल्कुल सीधा है— सरकारी कार्यालय की अलमारी और परिसर तक शराब पहुंची कैसे? अगर किसी बाहरी व्यक्ति ने रखी, तो वह अंदर तक कैसे पहुंचा?अगर कोई कर्मचारी जिम्मेदार है, तो पहचान क्यों नहीं हुई? और अगर जिम्मेदार व्यक्ति अज्ञात है, तो सरकारी कार्यालय की सुरक्षा व्यवस्था किसके भरोसे है? सरकारी परिसर में बरामद शराब के मामले में जांच की फाइल कितनी दूर पहुंची—जनता को इसका जवाब भी चाहिए।मेरे लिए काम की बात कब होगी?
बेरोजगारो के हाथों में डिग्री, मोबाइल और रील—कहां है काम? बक्सर की सबसे बदसूरत तस्वीर शायद यह है कि यहां युवा सिर्फ नौकरी नहीं तलाश रहा, वह अपने भविष्य का रास्ता तलाश रहा है। पीएचडी के छात्र बिट्टू विश्वकर्मा कहते है! मंचों से युवाओं की बात होती है। युवाओं के सपनों की बात होती है। युवा शक्ति की बात होती है। युवा संवाद होता है! लेकिन जो बच्चे डिग्री लेकर भटक रहे है उनका रोजगार की बात कब होगी ? आज हर बेरोजगार पूछ रहा है—“मेरे लिए काम की बात कब होगी?” बेरोजगारी सिर्फ आंकड़ा नहीं है। यह वह काला सच है, जो घर से निकलकर शहरों और दूसरे राज्यों में मजदूरी बन जाता है। यह वह डिग्री है, जो फाइल में बंद हो जाती है। यह वह प्रतिभा है, जो अवसर नहीं मिलने पर पलायन कर जाती है। और यह वह युवा है, जो नौकरी की जगह मोबाइल स्क्रीन पर अपना समय काटता है। जिनका इस्तेमाल राजनेता से लेकर राजनीति करने वाले लोग अपने हिसाब से कर रहे है! उनके पास काम रहेगा तो उनका भाषण कौन सुनेगा !अब सवाल बक्सर की जनता से भी है!
क्या हम बदहाली को भी पार्टी, जाति और नेता के चश्मे से देखते रहेंगे? क्या हर सवाल का जवाब यही होगा— “हमारा साहब महान है।” “हमारा नेता सबसे अच्छा है।”“हमारी पार्टी सही है।” अगर स्कूल में बच्चा पीड़ित है, तो वह किसी पार्टी का बच्चा नहीं है। गढ़े और पानी भरे रास्ते से शव को श्मशान ले जाया जा रहा है! उनके गले मे किसी पार्टी का टैग नही लगा है! अगर किसान की फसल बर्बाद है, तो उसका खेत किसी जाति का खेत नहीं है। अगर सड़क टूटी है, तो गड्ढा किसी दल को देखकर नहीं पड़ता। अगर सरकारी दफ्तर में फाइल अटकी है, तो भ्रष्टाचार पार्टी देखकर नहीं रुकता। फिर जनता सवाल पूछने में इतनी डरी क्यों है? क्यो नही अपने सांसद विधायक मुखिया और मुख्यमंत्री, के साथ ही कलेक्टर से लेकर क्लर्क तक से सवाल क्यो नही पूछते ! रिश्वत मांगने वाले उस कर्मचारी के प्रति कोई मुहिम क्यो नही छेड़ते ! क्या आप सभी की चुप्पी ही इनका मनोबल नही बढ़ा रहा है!
36 साल बाद बक्सर को जश्न नहीं, जवाब चाहिए!
17 मार्च 1991 को बक्सर जिला बना था।।36 साल बाद जिले के सामने उपलब्धियों की सूची रखी जा सकती है। लेकिन अगर उसी सूची के बगल में एक किसान का सूखा खेत, एक बच्चे का टूटा ब्लैकबोर्ड, एक मरीज को ढोती सड़क, एक बेरोजगार की डिग्री, एक सरकारी दफ्तर में अटकी फाइल और 26.40 करोड़ के ROB की तस्वीर रख दी जाए, तो सवाल खुद खड़ा हो जाएगा।लोगों का सवाल है, साहब! विकास हुआ है या विकास का प्रचार ज्यादा हुआ है? क्योंकि रेत का शीशमहल दूर से बहुत चमकता है। लेकिन एक बार पैर फिसले तो नीचे सिर्फ रेत होती है। बक्सर की जनता अब उस चमक से प्रभावित नहीं होना चाहती। उसे जमीन पर योजना चाहिए। ऐसी सड़क चाहिए, जो लाइफलाइन बने। ऐसा स्कूल चाहिए, जहां ब्लैकबोर्ड शर्म का कारण न हो। ऐसी शिक्षा की व्यवस्था चाहिए जंहा बच्चियो का अस्मत न लुटे ! ऐसी व्यवस्था चाहिए, जहां किसान मुआवजे के लिए दर-दर न भटके। ऐसा प्रशासन चाहिए, जहां कार्रवाई वायरल वीडियो देखकर नहीं, व्यवस्था की निगरानी से शुरू हो। ऐसा विकास चाहिए, जिसका उद्घाटन मंच पर नहीं, जनता की जिंदगी में दिखाई दे।
साढ़े तीन दशक बाद भी जवाब का इंतजार!
क्योंकि 36 साल बाद सवाल यह नहीं है कि बक्सर कितना बदल गया। सवाल यह है कि बक्सर को बदलने के नाम पर जो कुछ बनाया गया, उसमें आम आदमी की जिंदगी कितनी बदली? और अगर इस सवाल का जवाब देने में पूरा महकमा असहज हो रहा है—तो शायद यही असहजता बक्सर की सबसे बड़ी खबर है।






















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