जुमलों में उलझा जनादेश, सड़कों पर डूबा लोकतंत्र ! लोक रो रहा सड़कों पर, तंत्र आराम में मस्त!

 जुमलों में उलझा जनादेश, सड़कों पर डूबा लोकतंत्र! वोट के बाद गायब नेता जी, जनता हल्की बारिश में बेहाल! सियासी वादों की सड़क बनी दलदल का प्रतीक!  लोक रो रहा सड़कों पर, तंत्र आराम में मस्त! बक्सर की सड़क ने खोल दी जुमलेबाजी की पूरी पोल!

बक्सर – लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता होती है, लेकिन जब वही जनता अपने ही चुने हुए जनप्रतिनिधियों से ठगी महसूस करने लगे, तो सवाल उठना लाजमी है। बक्सर जिले में बक्सर अनुमंडल को डुमरांव अनुमंडल से जोड़ने वाली बहुप्रचारित सड़क आज सियासी वादों और हकीकत के बीच की खाई को उजागर कर रही है। वर्ष 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव में जिस सड़क को विकास का प्रतीक बनाकर जनता के सामने पेश किया गया था, वही सड़क आज लोगों के लिए परेशानी और आक्रोश का कारण बन गई है।

बदहाल है दर्जनों गांव का जीवन रेखा !

बक्सर गोलम्बर से जासो, नदाव, कुल्हड़िया, बसौली होते हुए डुमरांव तक जाने वाला यह मुख्य मार्ग दर्जनों गांवों की जीवनरेखा माना जाता है। लाखों की आबादी इस सड़क पर रोजमर्रा की जरूरतों के लिए निर्भर है। लेकिन हालात यह हैं कि हल्की सी बारिश होते ही यह सड़क झील में तब्दील हो जाती है। गड्ढों में भरा पानी, कीचड़ और बदहाल स्थिति ने लोगों की जिंदगी को मुश्किल बना दिया है। स्कूल जाने वाले बच्चों से लेकर अस्पताल जाने वाले मरीजों तक, हर कोई इस समस्या से जूझ रहा है।

छोटा पॉकेट बड़ा धमाका !
चुनाव के दौरान इसी सड़क को लेकर बड़े-बड़े दावे किए गए थे। नेताओं ने मंचों से लोकतंत्र और विकास की दुहाई देते हुए इसे प्राथमिकता में शामिल करने का वादा किया था। लेकिन चुनाव जीतने के बाद हालात बिल्कुल उलट नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि चुनाव खत्म होते ही जनप्रतिनिधि जनता से दूर हो गए हैं। अब न तो कोई सुनवाई हो रही है और न ही कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दे रही है।

क्या लोक को तंत्र ने दिखा दिया असली रंग ?
70 वर्षीय लालबिहारी का कहना है कि अभी चुनाव का रंग भी पूरी तरह फीका नहीं पड़ा है और तंत्र ने अपना असली रंग दिखाना शुरू कर दिया है। उनके अनुसार, छह महीने बीत जाने के बाद अब कार्यकाल पूरा होने का बहाना बनाया जा रहा है। उनका सवाल है कि अगर काम ही नहीं करना था, तो चुनाव के समय इतने बड़े-बड़े वादे क्यों किए गए? क्या यह सब केवल वोट हासिल करने की रणनीति थी? जिले का बच्चा -बच्चा जानता था कि सड़क कार्यकाल पूरा होने के बाद ही बनेगा ! तो क्या लोक को तंत्र ने अपना असली रंग दिखाया है !

नेता जी का कुर्सी प्रेम !
स्थानीय लोगों के बीच यह भावना तेजी से बढ़ रही है कि जनप्रतिनिधियों को जनता से ज्यादा अपनी कुर्सी से प्रेम है। जिन लोगों ने उन्हें चुनकर सत्ता तक पहुंचाया, वही आज बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सड़क की बदहाल स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि विकास के दावे सिर्फ कागजों और भाषणों तक ही सीमित रह गए हैं। अगर समस्या ही नही रहेगी तो सियासत कैसे होगा ! 

लोक से तंत्र की बढ़ गई है दूरी !
लोग अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर लोकतंत्र में लोक और तंत्र के बीच इतनी दूरी क्यों बढ़ गई है। क्या जनता की समस्याएं सिर्फ चुनावी मुद्दा बनकर रह गई हैं? क्या जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही केवल चुनाव तक ही सीमित है? बक्सर की यह सड़क सिर्फ एक मार्ग नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का आईना बन गई है, जिसमें वादे तो बड़े होते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत उनसे कोसों दूर होती है। अब देखना यह होगा कि जिम्मेदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस मुद्दे पर कब तक चुप्पी साधे रहते हैं और कब इस सड़क की स्थिति सुधारने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं। फिलहाल, जनता परेशान है और तंत्र आराम फरमा रहा है।

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