डीपीएम साहब का ‘सुपरपावर’ बेहोश होकर भी सुन ली पूरी कहानी!” “मेडिकल साइंस फेल, बक्सर ऑफिस पास!” “गाली, थप्पड़ और कुर्सी—सबका हिसाब बेहोशी में भी साफ!”

 “कुर्सी का करंट ऐसा कि बेहोशी में भी सुनाई दे गालियाँ!” “डीपीएम साहब का ‘सुपरपावर’ बेहोश होकर भी सुन ली पूरी कहानी!” “मेडिकल साइंस फेल, बक्सर ऑफिस पास!” “गाली, थप्पड़ और कुर्सी—सबका हिसाब बेहोशी में भी साफ!” “सिस्टम में नई खोज—‘बेहोश चेतना’ का बक्सर मॉडल!”

बक्सर – कहते हैं सत्ता का नशा बड़ा अजीब होता है, लेकिन बक्सर के स्वास्थ्य विभाग में तो यह नशा अब विज्ञान की किताबों को भी चुनौती देने लगा है। यहां कुर्सी का पावर ऐसा है कि बेहोशी की हालत में भी आवाजें साफ-साफ सुनाई देती हैं ! वो भी सिर्फ कोई सामान्य आवाज नहीं, बल्कि “स्पेशल कैटेगरी” की गालियाँ!

अद्भुत डीपीएम !

मामला स्वास्थ्य विभाग के चर्चित गालीबाज डीपीएम मनीष कुमार से जुड़ा है, जिनका ऑडियो पहले ही सुर्खियों में था। अब इस पूरे प्रकरण में एक नया “वैज्ञानिक चमत्कार” जुड़ गया है। वायरल सरकारी पत्र के मुताबिक, डीपीएम साहब को कार्यालय सहायक ने ऐसा थप्पड़ मारा, जिससे वे कुर्सी से गिरकर बेहोश हो गए। लेकिन कहानी में ट्विस्ट यह है कि बेहोशी के बाद भी साहब ने न सिर्फ गालियाँ “सुनीं”, बल्कि यह भी देख लिया कि उनके ऊपर संचिकाएँ फेंकी जा रही थीं! अब सवाल यह उठता है कि यह घटना मेडिकल साइंस की नई खोज है या फिर “कुर्सी विज्ञान” का नया अध्याय?

क्या कहता है मेडिकल साइंस!

जब इस पर जिले के वरीय चिकित्सक डॉ. एस. एन. सिंह से सवाल किया गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा“बेहोशी का मतलब ही है कि व्यक्ति चेतना में नहीं है। ऐसे में कुछ सुनना या देखना असंभव है।” यानी सीधी भाषा में कहें तो या तो मेडिकल साइंस गलत है… या फिर बक्सर में कोई नया ‘चमत्कारी सिस्टम’ काम कर रहा है।

खामोश है बड़का साहब !

इधर, पूरे मामले में सबसे ज्यादा दिलचस्प है “बड़े साहब” की चुप्पी। तीन सदस्यीय जांच कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सील बंद लिफाफे में सौंप दी, लेकिन वह लिफाफा अब तक शायद किसी अलमारी में ‘गहरी नींद’ में है। कार्रवाई का इंतजार करते-करते फाइलें भी अब शायद खुद बेहोश होने वाली हैं। जांच कमिटी सूत्रों की माने तो इस पूरे प्रकरण में डीपीएम को दोषी पाया गया है! उसके बाद भी रसूखदारो के साथ उठ-बैठ करने वाले डीपीएम पर कार्रवाई करने का कोई भी अधिकारी  हिम्मत नही जुटा पा रहे है! हैरानी की बात यह है कि गाली सुनने वाला पीड़ित कर्मचारी न्याय की गुहार लगाता रह गया, और विभाग ने न्याय का नया फॉर्मूला निकालते हुए उसी को निलंबित कर दिया। यानी यहां न्याय भी कुर्सी देखकर मिलता है! बड़ी कुर्सी सुरक्षित, छोटी कुर्सी निलंबित!

डीपीएम कार्यालय या कुर्सिधारी रहस्य !

डीपीएम कार्यालय के अंदर की बातें भी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं हैं। नाम नहीं छापने की शर्त पर एक कर्मी ने दावा किया कि कुछ महीने पहले शराब लदी एम्बुलेंस पकड़े जाने से लेकर रोज़ के “उठ-बैठ” तक, सबका कनेक्शन इसी कार्यालय से जुड़ा है। अगर सीसीटीवी कैमरों की ईमानदारी से जांच हो जाए, तो कई “कुर्सीधारी रहस्य” उजागर हो सकते हैं। बक्सर का डीपीएम कार्यालय स्वास्थ्य सेवाओं से ज्यादा “सियासी प्रयोगशाला” बनता जा रहा है, जहां हर दिन कोई नया प्रयोग होता है! कभी गाली का, कभी जांच का, और कभी बेहोशी में सुनने की अद्भुत क्षमता का।

 सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह मामला वाकई गंभीर है या फिर कुर्सी के नशे में लिखा गया एक ऐसा स्क्रिप्ट, जिसमें तर्क की छुट्टी और ताकत की ड्यूटी लगी हुई है? फिलहाल बक्सर में चर्चा गर्म है कि यहां इलाज से ज्यादा “इल्जाम” और “इजाद” हो रहे हैं। और अगर यही हाल रहा, तो आने वाले दिनों में मेडिकल साइंस की किताबों में एक नया चैप्टर जुड़ सकता है—“बक्सर मॉडल: बेहोशी में भी सक्रिय इंद्रियां!”

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