सियासत का नया खेल!” “विधायक के बचाव में उतरी ट्रोल ब्रिगेड, सांसद पर ‘लापता’ का तैयार है टैग !” “काम गायब, पोस्ट हाजिर स्क्रीन पर विकास, जमीन पर सन्नाटा!” “कमल सेवा केंद्र बनाम जनता की पुकार—किसके पास है असली अधिकार?”

डिजिटल ढाल, जमीनी फेल—बक्सर में सियासत का नया खेल!” “विधायक के बचाव में ट्रोल ब्रिगेड, सांसद पर ‘लापता’ का टैग रेडी!” “काम गायब, पोस्ट हाजिर—स्क्रीन पर विकास, जमीन पर सन्नाटा!” ! “कमल सेवा केंद्र बनाम जनता की पुकार—किसके पास है असली अधिकार?” “सत्ता सुख की स्क्रिप्ट लिखती डिजिटल सेना, जनता बनी मूक दर्शक!”

बक्सर— जिले की राजनीति इन दिनों ऐसी डिजिटल जंग में बदल चुकी है, जहां मुद्दे नहीं, मैसेज लड़ रहे हैं। हालात इतने तीखे हैं कि तुलना अब अंतरराष्ट्रीय तनाव से होने लगी है, लेकिन फर्क साफ है—यहां हथियार नहीं, हैशटैग चल रहे हैं। बीजेपी की डिजिटल सेना सदर विधायक आनन्द मिश्रा के बचाव में मोर्चा संभाले हुए है, तो राजद खेमे से सांसद सुधाकर सिंह को लेकर पलटवार जारी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस वक्त सियासी पोस्ट वार से पटे पड़े हैं। हर तरफ दावे, प्रतिदावे और तंज की बौछार है। लेकिन इस डिजिटल धुंध में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह लड़ाई जनता की समस्याओं के समाधान के लिए है या सिर्फ छवि बचाने का संगठित अभियान?

अपनों ने ही खोली पोल, फिर शुरू हुआ ‘डैमेज कंट्रोल’ कहानी की जड़ में है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘समृद्धि यात्रा’ के बाद उठा भाजपा का अंदरूनी असंतोष। पार्टी के कार्यकर्ताओं ने ही विधायक आनन्द मिश्रा और जिलाध्यक्ष ओमप्रकाश भुवन पर सवाल उठाने शुरू कर दिए। यह असंतोष सोशल मीडिया पर खुलकर सामने आया, और जैसे ही मीडिया ने इसे उछाला—मामला ‘आंतरिक विवाद’ से निकलकर ‘सार्वजनिक सियासत’ बन गया। इसके बाद जो हुआ, वह क्लासिक डैमेज कंट्रोल था। नाराज आवाजों को शांत किया गया और वही चेहरे अब डिजिटल सेना बनकर बचाव में उतर आए। कल तक जो सरकारी अस्पताल को बदहाल बता रहे थे, आज वही उसे ‘सुपर मल्टी स्पेशियलिटी’ घोषित कर रहे हैं। जो सड़क जाम से कराह रही थी, वह अचानक ‘हाई-स्पीड कॉरिडोर’ बन गई। यानी हकीकत जस की तस, लेकिन डिजिटल नैरेटिव पूरी तरह बदला हुआ।

विधायक गायब या प्राथमिकताएं बदल गईं?

इसी बीच, विधायक आनन्द मिश्रा का बंगाल और असम चुनाव में व्यस्त रहना स्थानीय असंतोष को और हवा दे रहा है। पांच से सात अप्रैल तक उनका असम दौरा तय है, जबकि बक्सर की जनता अपनी समस्याओं के समाधान के लिए दर-दर भटक रही है। समर्थकों का तर्क है कि ‘कमल सेवा केंद्र’ के जरिए रोज 100-150 आवेदन निपटाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या जनप्रतिनिधि का रोल अब फाइल प्रोसेसिंग सिस्टम तक सीमित हो गया है? जनता ने वोट किसी ‘प्रबंधन तंत्र’ को नहीं, बल्कि सीधे जवाबदेह प्रतिनिधि को दिया था। यह मॉडल कहीं न कहीं उस पुराने ‘साहब संस्कृति’ की याद दिलाता है, जहां जनता नीचे के कर्मचारियों से जूझती रहती है और असली निर्णयकर्ता दूर रहता है।

डिजिटल सेना बनाम जमीनी हकीकत

डिजिटल सेना का तर्क है—“पूर्व विधायक से सवाल क्यों नहीं?” लेकिन यह तर्क खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारता दिखता है। अगर पहले काम नहीं हुआ, तो बदलाव के नाम पर चुने गए प्रतिनिधि से सवाल पूछना तो और जरूरी हो जाता है। वहीं, जमीनी हकीकत कुछ और कहानी कह रही है। फसल में आग लगने की घटनाएं, किसानों की परेशानी और स्थानीय मुद्दे—इन सबका जिक्र डिजिटल पोस्ट में नदारद है। वहां सिर्फ उपलब्धियों का ओवरडोज है।

सांसद पर हमला, पलटवार भी तैयार

बीजेपी की डिजिटल सेना सांसद सुधाकर सिंह को ‘लापता’ बता रही है, जबकि राजद का दावा है कि सांसद लगातार क्षेत्र में सक्रिय हैं। जवाबी हमले में विधायक की अनुपस्थिति को मुद्दा बनाया जा रहा है। यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि अब राजनीति में परफॉर्मेंस से ज्यादा परसेप्शन की लड़ाई चल रही है। जो दिख रहा है, वही बिक रहा है—चाहे सच उससे कितना भी दूर क्यों न हो।

 डिजिटल शोर में दबती जनता

बक्सर की यह सियासी लड़ाई एक खतरनाक ट्रेंड की ओर इशारा करती है—जहां असली मुद्दे पीछे छूट रहे हैं और डिजिटल नैरेटिव आगे निकल रहा है। नेता अपनी-अपनी छवि बचाने में लगे हैं, डिजिटल सेना उनके लिए ढाल बनी हुई है, लेकिन इस पूरी जंग में जनता सिर्फ एक डेटा पॉइंट बनकर रह गई है। आखिर में सवाल वही है—क्या बक्सर की राजनीति अब जमीन पर नहीं, सिर्फ स्क्रीन पर चलेगी? और अगर ऐसा है, तो फिर जनता की असली लड़ाई कौन लड़ेगा?

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