गजब ! मोतियाबिंद के इलाज के नाम पर भी डकार गए 28 लाख 16 हजार ! 1 लाख 61 हजार एक्सपायरी दवा पर भी कर दिया स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों ने खर्च !

बक्सर स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों का खेल, सिस्टम बना ‘सेटिंग’ का मेल !फाइलों में इलाज, जमीन पर लूट!बीमार योजनाएं, मालामाल अफसर! छोटे कर्मचारी सस्पेंड, बड़े साहब साइलेंट—किसे बचा रहा सिस्टम? सरकारी पैसे पर ‘निजी राज’—जांच के बाद भी कार्रवाई गायब! घोटालों की फेहरिस्त लंबी, जवाबदेही शून्य—बक्सर में स्वास्थ्य बेहाल!

बक्सर-  जिले का स्वास्थ्य विभाग इन दिनों गंभीर आरोपों के घेरे में है। सरकारी योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये की कथित वित्तीय अनियमितताओं ने पूरे महकमे की कार्यशैली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। हैरानी की बात यह है कि बिहार सरकार के स्वास्थ्य विभाग द्वारा स्पष्ट निर्देश दिए जाने के बावजूद महीनों बीत जाने के बाद भी कार्रवाई के नाम पर केवल खानापूर्ति होती दिख रही है, जबकि बड़े अधिकारियों पर कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

मीडिया के हाथ लगी सरकारी पत्र तो मचा हड़कम्प !

मामला तब सामने आया जब स्वास्थ्य विभाग की एक आधिकारिक जांच रिपोर्ट मीडिया के हाथ लगी। रिपोर्ट के अनुसार, तत्कालीन अपर मुख्य चिकित्सा पदाधिकारी (ACMO) के कार्यकाल (जुलाई 2023 से अक्टूबर 2025) के दौरान कुल 11 प्रमुख बिंदुओं पर गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं। विभाग ने इसे स्पष्ट रूप से वित्तीय कदाचार और सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला माना है और एक सप्ताह के भीतर दोषियों की पहचान कर कार्रवाई करने का निर्देश दिया था।

कागजो पर होता रहा इलाज ! जमीन पर सब कुछ साफ !

जांच में सबसे चौंकाने वाला मामला निजी वाहन के अवैध उपयोग का सामने आया है, जिसमें सरकारी नियमों की अनदेखी कर ₹66,200 की राशि का दुरुपयोग किया गया। वहीं, कालाजार उन्मूलन योजना में बिना वास्तविक छिड़काव कार्य के ही ₹3.65 लाख खर्च दिखाकर राशि की निकासी कर ली गई। यह स्थिति दर्शाती है कि योजनाएं कागजों पर चल रही हैं, जबकि जमीनी स्तर पर लोगों को कोई लाभ नहीं मिल रहा।

एक्सपायरी दवा पर खर्च कर दी लाखो !

स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल तब और गहरे हो जाते हैं जब एक्सपायर्ड दवाओं पर ₹1.61 लाख खर्च करने का मामला सामने आता है। इसके अलावा फाइलेरिया उन्मूलन कार्यक्रम के नाम पर ₹9.56 लाख की राशि खर्च दिखाकर अनियमितता की गई, जिसका कोई ठोस प्रमाण विभाग को उपलब्ध नहीं कराया गया।पोषण योजना में भी भारी गड़बड़ी सामने आई है, जहां 390 मरीजों के नाम पर ₹12.04 लाख की राशि संदिग्ध खातों में ट्रांसफर कर दी गई। वहीं MMDP किट वितरण में न तो वितरण का कोई रिकॉर्ड मिला और न ही स्टॉक रजिस्टर का संधारण किया गया। खरीद प्रक्रिया में भी नियमों की अनदेखी करते हुए बिना टेंडर या कोटेशन के ₹6.41 लाख खर्च कर दिए गए।

आंखों की रौशनी के नाम पर 28 लाख 16 हजार हजम !

इतना ही नहीं, आयकर की अनिवार्य कटौती में भी लापरवाही बरती गई, जिससे सरकार को ₹57,008 का नुकसान हुआ। मोतियाबिंद ऑपरेशन के भुगतान में भी बिना सत्यापन के ₹28.16 लाख जारी कर दिए गए, जो सीधे तौर पर वित्तीय अनुशासन की धज्जियां उड़ाता है।इन तमाम गड़बड़ियों के बावजूद कार्रवाई के नाम पर केवल छोटे कर्मचारियों को निशाना बनाए जाने का आरोप लग रहा है। मामले को उजागर करने वाले कार्यालय सहायक मोहम्मद आसिफ को ही निलंबित कर पटना भेज दिया गया, जबकि बड़े अधिकारियों पर अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। विभागीय सूत्रों का कहना है कि मनमाफिक रिपोर्ट तैयार कर पूरे मामले को दबाने की कोशिश की जा रही है। इस पूरे प्रकरण ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर अनियमितताओं के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है? क्या यह केवल लापरवाही है या फिर सुनियोजित तरीके से किया गया घोटाला?

गौरतलब है कि यह पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी जिले में विभिन्न योजनाओं में गड़बड़ी के आरोप सामने आते रहे हैं, लेकिन हर बार कार्रवाई अधूरी ही रह जाती है। ऐसे में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस बार सख्त रुख अपनाती है या फिर यह मामला भी फाइलों में ही दफन हो जाएगा। फिलहाल, बक्सर की जनता जवाब का इंतजार कर रही है—क्या भ्रष्टाचार पर लगेगा ब्रेक, या फिर सिस्टम यूं ही चलता रहेगा?

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