“18 KM में बिखरा विकास—गड्ढों में गुम सरकार!” “सड़क टूटी नहीं, सिस्टम सड़ गया है!” “जनता पिस रही, साहब फाइलों में हंस रहे!” “वोट के वक्त एक्सप्रेसवे, अब एक्सीडेंटवे!” “नींद में हुक्मरान, दर्द में बक्सर की जान!”
बक्सर—जिले में विकास का असली चेहरा अब किसी सरकारी रिपोर्ट, भाषण या विज्ञापन में नहीं, बल्कि उस 18 किलोमीटर लंबी बदहाल सड़क पर साफ नजर आ रहा है, जो जिला मुख्यालय को डुमराँव अनुमंडल से जोड़ती है। यह सड़क अब सिर्फ एक रास्ता नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता, भ्रष्ट सोच और राजनीतिक धोखे की खुली किताब बन चुकी है। चुनाव के समय जिस सड़क को “एक्सप्रेसवे” बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए थे, आज वही सड़क “एक्सीडेंटवे” बन चुकी है। जगह-जगह गड्ढे ऐसे मुंह बाए खड़े हैं मानो हर गुजरने वाले से हादसे का इंतजार कर रहे हों। हालात यह हैं कि 18 किलोमीटर की दूरी तय करने में लोगों को घंटों लग जाते हैं। एंबुलेंस समय पर नहीं पहुंच पाती, मरीज रास्ते में दम तोड़ देते हैं, स्कूली बच्चे रोज जान जोखिम में डालकर सफर करते हैं और किसानों का माल बाजार पहुंचने से पहले ही बर्बाद हो जाता है।वादों का जुमला या बचकाना राजनीति !
स्थानीय लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण में भारी अनियमितता हुई है। कुछ ही वर्षों में सड़क का इस तरह बिखर जाना साफ संकेत देता है कि गुणवत्ता से समझौता किया गया। लोगों का गुस्सा इस बात पर भी है कि जब सड़क बनवाने की नीयत ही नहीं थी, तो 100 दिन में निर्माण का वादा क्यों किया गया? क्या यह सिर्फ वोट बटोरने का जुमला था? यह सड़क इलाके की जीवनरेखा मानी जाती है। धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पंचकोशी परिक्रमा के दौरान हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हैं, लेकिन अब यह यात्रा आस्था से ज्यादा परेशानी का कारण बन चुकी है। वहीं, रोजगार और शिक्षा के लिए रोज आने-जाने वाले युवाओं के लिए यह सड़क एक स्थायी संकट बन गई है।
मिशन कमीशन या जनसेवा !
बक्सर व्यवहार न्यायालय के अधिवक्ता अयोध्या यादव ने तीखा व्यंग करते हुए कहा कि शहर में 3 किलोमीटर सड़क पर 42 करोड़ खर्च किए जाते हैं, जबकि ग्रामीण इलाकों में 18 किलोमीटर सड़क महज 3 करोड़ में बना दी जाती है। उन्होंने आरोप लगाया कि “मिशन कमीशन” के बिना कोई काम नहीं होता, और अगर कमीशन में कमी रह जाए तो अधिकारियों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच जाता है।
अनुभव का बचकनापन!
वहीं, वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. एस. एन. सिंह ने इस पूरे मामले को या तो “अनुभव का बचकनापन” या “इच्छाशक्ति की कमी” बताया। उनका कहना है कि जिस सड़क के मुद्दे ने दो विधायकों का राजनीतिक भविष्य बदल दिया, उसी सड़क पर आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं होना वर्तमान नेतृत्व की नीयत पर सवाल खड़ा करता है। आज स्थिति यह है कि सड़क गड्ढों में दबी है और सिस्टम बहानों में। जनता रोज गिर रही है, लेकिन सत्ता के गलियारों में सन्नाटा पसरा है। सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या “बड़का साहब” नींद से जागेंगे, या बक्सर की जनता यूं ही गड्ढों में गिरती रहेगी?

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