“विधायक जी बंगाल में व्यस्त, बक्सर में जनता धूप में पस्त!” “वोट बक्सर का, विज़न बंगाल का—जनता लाइन में, नेता ऑनलाइन!” “सुपर कॉप का सुपर ब्रेक—जनता करे वेट, सिस्टम आउटडेट!” “डिजिटल देशभक्ति फुल स्पीड, ज़मीनी हकीकत जीरो फीड!” “पहले सत्ता विस्तार, फिर जनता से प्यार—कब आएगा वो रविवार?”
बक्सर— जिले की राजनीति इन दिनों किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं लग रही। फर्क बस इतना है कि यहां हीरो पर्दे पर नहीं, पोस्टर पर दिख रहा है—और जनता असली सीन में संघर्ष कर रही है। एक तरफ बक्सर की सड़कों पर धूल उड़ रही है, तो दूसरी तरफ सत्ता की हवाओं में उड़ते नजर आ रहे हैं सदर विधायक आनन्द मिश्रा। अब हालात यह हैं कि बक्सर में विकास नहीं, बल्कि सवाल घूम रहा है—“विधायक जी आखिर हैं कहां?”हर गली, हर चौक पर एक ही शोर—“कहां हैं विधायक जी?”
चुनाव के वक्त “सुपर कॉप”, “सिस्टम क्लीनर” और “जनता का मसीहा” बनकर उतरे विधायक जी आज बक्सर में कम और बंगाल-असम के सियासी गलियारों में ज्यादा सक्रिय बताए जा रहे हैं। जनता कह रही है—“हमने नेता चुना था या टूरिस्ट?” हाल यह है कि लोग कभी अतिथि गृह, कभी पार्टी कार्यालय, तो कभी कमल सेवा केंद्र का चक्कर काट रहे हैं। लेकिन हर जगह एक ही जवाब—“विधायक जी बाहर हैं।” अब सवाल उठ रहा है—“क्या बक्सर भी अब ‘बंगाल’ में गिना जाएगा?”
क्या यही है जनप्रतिनिधित्व या ‘जनता-प्रतिक्षा योजना’?
44 डिग्री की तपती गर्मी में 75 वर्षीय रमझरिया देवी की बेबसी इस सिस्टम की असली तस्वीर दिखा रही है। बीमार नाती के इलाज के लिए मदद मांगने निकली बुजुर्ग महिला को हर जगह सिर्फ निराशा मिली। अंत में सलाह मिली—“भगवान भरोसे रहिए।” तो क्या अब सरकारी सिस्टम का नया स्लोगन यही है—“विधायक गायब, भगवान हाज़िर?”असंतोष की आग, डिजिटल पानी से बुझाने की कोशिश!
मामला तब और दिलचस्प हो गया जब खुद पार्टी के अंदर से आवाजें उठने लगीं। सोशल मीडिया पर किसी ने विधायक को “बहुरूपिया” कहा, तो किसी ने “बहेलिया”। हालांकि ऊपर से डांट पड़ी और पोस्ट हटे, लेकिन अंदर की आग अब भी धधक रही है। इधर “डिजिटल सेना” पूरी ताकत से मैदान में उतर चुकी है। फेसबुक-व्हाट्सएप पर फोटो, पोस्ट और कैप्शन के जरिए यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि विधायक जी से बड़ा राष्ट्रभक्त कोई नहीं। लेकिन जनता पूछ रही है—“देशभक्ति अच्छी बात है, पर मोहल्ले की सड़क भी देश में ही आती है ना?”“ऐसी राजनीति नहीं देखी”—किसानों का फूटा गुस्सा
लोकसभा की तैयारी या बक्सर से दूरी?
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि विधायक जी की नजर अब बड़े चुनाव पर है। यानी बक्सर “स्टेपिंग स्टोन” बन चुका है और जनता “वोट बैंक”। अब लोग तंज कस रहे हैं— “विधायक जी से मिलना है तो टिकट लेकर बंगाल जाइए!” बक्सर की गलियों में आज सिर्फ एक ही बहस है— “क्या हम सिर्फ वोट देने के लिए हैं? क्या हमारी समस्याएं सिर्फ चुनावी भाषण तक सीमित हैं?” यह मामला सिर्फ एक विधायक की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का आईना है जहां जमीनी जिम्मेदारियां छोड़कर डिजिटल छवि चमकाई जा रही है।



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