हद हो गई बड़का साहब ! 390 टीबी मरीजो के भी राशि डकार गए अधिकारी और कर्मचारी ! जांच रिपोर्ट से हुआ खुलासा ! तो फाइलों को सेट करने में जुटा पूरा महकमा !

हद हो गई साहब ! जिला मुख्यालय में बड़का साहब के नाक के नीचे  390 “टीबी मरीजों का हक हजम कर गए स्वास्थय विभाग के अधिकारी और कर्मचारी ! “ गहरी निंद्रा में गोते लगाते रह गए बड़का साहब ! शर्म से झुकी इंसानियत का सर कलंकित हुआ बक्सर !

बक्सर- यह बिहार का बक्सर है साहब! यहां बीमारी से लड़ते टीबी मरीजों की भूख भी “सिस्टम” निगल जाता है और हैरानी यह कि डकार तक नहीं लेता। उत्तरायणी गंगा के किनारे बसा यह ऐतिहासिक शहर इन दिनों अपने अतीत नहीं, बल्कि “घोटाला संस्कृति” के लिए सुर्खियों में है। सदर अस्पताल से जुड़ा यह मामला सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि इंसानियत के खिलाफ अपराध की तरह सामने आया है। 390 टीबी मरीजों के पोषण योजना के तहत आने वाली 12.04 लाख रुपये की राशि मरीजों के खातों में जाने के बजाय “अन्य खातों” में ट्रांसफर कर दी गई। यानी जिनके शरीर को पोषण चाहिए था, उनके नाम पर साहब लोगों के खातों को ताकत मिलती रही।

खेल का हुआ फर्दाफ़ास फीर भी बच निकलने का रास्ता है साफ !

जांच रिपोर्ट ने जैसे ही इस खेल का पर्दाफाश किया, पूरे महकमे में सन्नाटा छा गया। जिन फाइलों में मरीजों की जिंदगी दर्ज थी, उन्हीं फाइलों से पैसा गायब होकर खास लोगों की जेब में पहुंच गया। सवाल यह है कि यह सिर्फ लापरवाही है या फिर सुनियोजित लूट का संगठित खेल?

जमीन पर नही हुआ छिड़काव कर ली लाखो की निकासी !

मामला यहीं नहीं रुकता। कालाजार उन्मूलन के नाम पर बक्सर जिला में  बिना एक बूंद छिड़काव किए 3 लाख 65 हजार रुपये खर्च दिखा दिए गए। कागजों में दवा छिड़की गई, फाइलों में मच्छर मरे और असलियत में पैसा साफ हो गया। अब सवाल उठता है कि आखिर इतनी हिम्मत किसने दी? जिला मुख्यालय में, बड़का साहब के नाक के नीचे करोड़ों का खेल चलता रहा और किसी को भनक तक नहीं लगी? या फिर यह सब “देखकर भी अनदेखा” करने की कला का हिस्सा है?

 जिम्मेदारों का जवाब—‘हम नहीं थे’ वाला राग

जब इस पूरे घोटाले पर एसीएमओ डॉक्टर विनोद प्रताप सिंह से सवाल किया गया, तो जवाब आया—“मैं उस समय नहीं था, वित्त मैं नहीं देखता।” यानी पैसा गया, घोटाला हुआ, लेकिन जिम्मेदार कोई नहीं! बक्सर में अब भ्रष्टाचार का नया मॉडल बन गया है—“काम सबका, जिम्मेदारी किसी की नहीं।”

घोटाले से ज्यादा उसे दबाने की तैयारी तेज

कार्यालय सूत्र बताते हैं कि मामला उजागर होते ही कई अधिकारी “डैमेज कंट्रोल” में जुट गए हैं। फाइलों को सेट किया जा रहा है, जिम्मेदारियों को घुमाया जा रहा है और एक बार फिर “छोटे कर्मचारी” को आगे कर पूरे खेल को बचाने की पटकथा लिखी जा रही है। यहां परंपरा साफ है—बड़े बचते हैं, छोटे फंसते हैं। डीपीएम कार्यालय के सहायक का हाल अभी ताजा उदाहरण है, जिसने विरोध किया तो सिस्टम ने उसी को सजा दे दी। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या बक्सर भगवान भरोसे है ?सबसे शर्मनाक पहलू यह है कि यह घोटाला उन मरीजों से जुड़ा है, जो टीबी जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। सरकार उन्हें पोषण दे रही थी ताकि वे जिंदा रह सकें, लेकिन यहां उनके हिस्से का निवाला भी छीन लिया गया।

अब सवाल सीधा है—

क्या बक्सर सच में प्रशासन चला रहा है या फिर “भगवान भरोसे” का बोर्ड लग चुका है? जांच रिपोर्ट सामने है, सबूत मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई की रफ्तार देखकर यही लगता है कि यहां सच से ज्यादा सिस्टम को बचाने की चिंता है। अगर यही हाल रहा, तो बक्सर का नाम इतिहास में नहीं, बल्कि “घोटाला मैनुअल” में दर्ज होगा—जहां यह सिखाया जाएगा कि कैसे गरीबों के हक पर डाका डालकर भी कुर्सी सुरक्षित रखी जाती है। अब देखना यह है कि कार्रवाई होती है या फिर यह मामला भी फाइलों में दफन होकर अगली लूट की तैयारी का रास्ता साफ करता है।

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