बक्सर— शहर की ट्रैफिक व्यवस्था इन दिनों पूरी तरह बेपटरी हो चुकी है। हालात ऐसे हैं कि जाम अब अपवाद नहीं, बल्कि बक्सर की पहचान बनता जा रहा है। जो एक बार इस जाल में फंस गया, उसका निकलना मानो किस्मत के भरोसे है। कागजों पर चमकदार और “सुपर प्लान” बताई गई ट्रैफिक व्यवस्था, जमीन पर आते-आते दम तोड़ देती है।
हवाहवाई दावों की हकीकत
जमीन पर खुली पोल
जमीन की आवाज
जाम में फंसे 55 वर्षीय दूध विक्रेता रामायण गोंड़ का दर्द पूरे सिस्टम की कहानी कह देता है— “सिर्फ 500 मीटर आने में 45 मिनट लग गए। ये कैसी व्यवस्था है? जो लोग जाम में पिस रहे हैं, वही असली हाल जानते हैं। एसी में बैठकर लाइन खींचने से कुछ नहीं होता, उसे जमीन पर उतारना भी पड़ता है।” स्थानीय लोगों का कहना है कि हर बड़े आयोजन में यही कहानी दोहराई जाती है—पहले बड़े-बड़े दावे, फिर जमीनी फेलियर।
कहां टूट रही कड़ी?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर कमी कहां है?
जवाब साफ है—प्लान और उसके क्रियान्वयन के बीच भारी खाई। ना पर्याप्त पुलिस बल, ना सख्त डायवर्जन, ना ही लोगों को सही दिशा-निर्देश। नतीजा—पूरा शहर जाम के हवाले।
जमीन पर ‘धुंआ-धुंआ’ सिस्टम
कागजों पर बनी रणनीति, भीड़ की पहली लहर में ही उड़ जाती है। ट्रैफिक कंट्रोल की जिम्मेदारी निभाने वाले खुद हालात के आगे बेबस दिखते हैं। शहर की सड़कों पर जाम, धूल और अफरातफरी का जो मंजर दिखता है, वह सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि सिस्टम की नाकामी की खुली तस्वीर है।
गौरतलब है कि बक्सर की जनता हर बार जाम में पिसती है और हर बार वही सवाल उठता है—क्या व्यवस्था सिर्फ कागजों के लिए है? जरूरत अब दिखावे से आगे बढ़कर जमीनी एक्शन की है। प्लान तभी सफल होगा, जब वह सड़क पर उतरेगा—वरना “कागज का शेर” बनकर ही रह जाएगा। बक्सर का यह जाम सिर्फ ट्रैफिक समस्या नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की असली परीक्षा बन चुका है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार जागते हैं या शहर यूं ही जाम में कराहता रहेगा।



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