"झील बनी डुमराँव की नेशनल हाईवे, युवाओं ने रोप दिया धान" वादों की नाव डूबी, पानी में तैर रहा है डुमराँव का सम्मान ! अजब डुमराँव की गजब कहानी, सड़क बनी खेती और जनता परेशान

 "झील बनी डुमराँव की नेशनल हाईवे, युवाओं ने रोप दिया धान" वादों की नाव डूबी, पानी में तैर रहा है डुमराँव का सम्मान ! अजब डुमराँव की गजब कहानी, सड़क बनी खेती और जनता परेशान

बक्सर-  कहते हैं कहानियों में चमत्कार होते हैं। कहीं पत्थर बोलने लगते हैं, कहीं रेगिस्तान में नदी बहने लगती है। लेकिन बिहार के बक्सर जिले के डुमराँव में जो हुआ, वह किसी लोककथा से कम नहीं। यहाँ एक सड़क थी। जी हाँ, कभी सड़क थी। उस पर गाड़ियाँ चलती थीं, लोग सफर करते थे और नेता विकास के सपने दिखाते थे। लेकिन समय बीता, वादे बूढ़े हुए और सड़क ने शायद खुद को सड़क कहलाने से इंकार कर दिया। आज वह एक विशाल जलाशय का रूप धारण कर चुकी है।

किस्मत और बाइक दोनों संभालते दिखे लोग !

राज हाई स्कूल के सामने नेशनल हाईवे-120 पर जमा पानी को देखकर पहली नजर में ऐसा लगता है जैसे सरकार ने चुपके से डुमराँव को नया पर्यटन स्थल घोषित कर दिया हो। दूर से देखने पर दृश्य इतना मनमोहक है कि कोई अनजान व्यक्ति इसे "मिनी लेक व्यू पॉइंट" समझ बैठे। फर्क सिर्फ इतना है कि यहाँ नाव नहीं चलती, लोग अपनी किस्मत और बाइक दोनों संभालते हुए यंहा से गुजरते हैं।

युवा किसानों ने कर डाली धान की रोपनी !


कहानी में नया मोड़ तब आया जब शुक्रवार को कुछ युवाओं ने इस झीलनुमा सड़क को गौर से देखा। उन्होंने सोचा कि जब प्रशासन इसे सड़क मानने को तैयार नहीं और प्रकृति इसे खेत बनाने पर तुली है, तो फिर बीच का रास्ता क्यों न निकाला जाए? बस फिर क्या था। रोहिणी नक्षत्र का शुभ समय चल रहा था। किसान खेतों में धान की रोपनी कर रहे थे। डुमराँव के युवाओं ने तय किया कि वे भी परंपरा निभाएंगे। फर्क सिर्फ इतना रहा कि उन्होंने खेत नहीं खोजा, बल्कि सीधे नेशनल हाईवे-120 को ही कृषि योग्य भूमि मान लिया। कुछ ही देर में सड़क पर धान की रोपनी शुरू हो गई। जहाँ कल तक वाहन फँस रहे थे, वहाँ आज धान के पौधे रोपे जा रहे थे। राहगीर रुककर वीडियो बनाने लगे। बच्चे तालियाँ बजाने लगे। कुछ लोग हँस रहे थे, कुछ तस्वीरें ले रहे थे और कुछ व्यवस्था पर मौन प्रश्नचिह्न बनकर खड़े थे।

ट्रक ट्रैक्टर और धान का नेशनल हाइवे !


युवाओं ने घोषणा की कि शायद यह दुनिया का पहला ऐसा नेशनल हाईवे है जहाँ ट्रक, ट्रैक्टर और धान की फसल एक साथ दिखाई देती है। किसी ने मजाक में कहा कि अगर यही हाल रहा तो अगले सीजन में कृषि विभाग यहीं "आधुनिक खेती प्रशिक्षण शिविर" भी आयोजित कर सकता है। चुनाव के समय जनता को बताया गया था कि डुमराँव बदल जाएगा। विकास दौड़ेगा। सिंगापुर जैसी तस्वीर बनेगी।

सात महीने बाद तस्वीर सचमुच बदली है।

बस फर्क इतना है कि सिंगापुर की चमचमाती सड़कें यहाँ पानी में प्रतिबिंब बनकर तैर रही हैं। गाँव के बुजुर्ग अब मजाक में पूछते हैं कि "बबुआ, यह सड़क है या धान का खेत?" और बच्चे जवाब देते हैं, "दादा, चुनाव के बाद दोनों एक ही चीज हो गई है।" एक बुजुर्ग किसान ने मुस्कुराते हुए कहा, "सरकार चाहे तो इस सड़क का दाखिल-खारिज कृषि विभाग में करा दे। कम से कम धान तो उपज जाएगा।" वहीं एक युवक बोला, "अगर सड़क पर खेती शुरू हो गई तो शायद किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य यहीं पूरा हो जाए।"

सोशल मीडिया में सरपट दौड़ रहा है विकास !

उधर सोशल मीडिया पर विकास 4K क्वालिटी में दौड़ रहा है। पोस्टरों में मुस्कुराहटें चमक रही हैं। बधाई संदेशों की बाढ़ आई हुई है। लेकिन जमीन पर जनता घुटनों तक पानी में खड़ी होकर विकास को ढूँढ रही है। स्थानीय लोगों ने बताया कि समस्या पर जनप्रतिनिधियों का पक्ष जानने की कोशिश की गई। फोन मिलाया गया, लेकिन मोबाइल बंद मिला। इस पर एक युवक ने चुटकी ली, "शायद मोबाइल भी सड़क की हालत देखकर नेटवर्क नहीं, नैतिक झटका खा गया होगा।" अब डुमराँव की यह अनोखी रोपनी सोशल मीडिया पर वायरल है। लोग हँस रहे हैं, शेयर कर रहे हैं, लेकिन हर हँसी के पीछे एक सवाल भी छिपा है।

क्योंकि लोकतंत्र में यह शायद पहली घटना होगी जहाँ जनता ने सड़क बनवाने के लिए न धरना दिया, न भूख हड़ताल की, न ज्ञापन सौंपा। लोगों ने सीधे सड़क को खेत मान लिया। अब डुमराँव इंतजार कर रहा है। देखना सिर्फ इतना है कि इस "विकास वाली झील" में पहले धान की बालियाँ निकलेंगी या फिर जिम्मेदारों की नींद टूटेगी।  अगर अगले कुछ दिनों तक यही हाल रहा, तो हो सकता है आने वाली पीढ़ियाँ इतिहास की किताबों में पढ़ें "डुमराँव, वह शहर  है जहाँ नेशनल हाईवे पर धान की खेती होती थी और विकास पानी में तैरता था।"

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