बक्सर में विकास के शव पर राजनीति का महाभोज! बक्सर की चिंता या कमीशन के लिए बर्चस्व की लड़ाई ! चार बर्षो की खामोशी अब भ्रष्टाचार पर महाभारत ! बड़का साहब की चुपी से उठा सियासी बवंडर ! पूछ रही है बक्सर की जनता कौन है इस खेल का महानायक !
बक्सर में इन दिनों नगर परिषद को लेकर जो सियासी महाभारत छिड़ी हुई है, उसे देखकर ऐसा लग रहा है मानो अचानक पूरे शहर में ईमानदारी का अवतार हो गया हो। जिन लोगों को चार साल तक सब कुछ दूध का धुला दिखाई देता रहा, उन्हें चुनावी वर्ष आते ही भ्रष्टाचार, कमीशनखोरी, घूसखोरी, परिवारवाद और लूट की पूरी रामायण दिखाई देने लगी है। जनता हैरान है कि आखिर यह चमत्कार हुआ कैसे? क्या चुनाव नजदीक आते ही नेताओं की आंखों में कोई ऐसा चश्मा लग जाता है जिससे सिर्फ भ्रष्टाचार ही दिखाई देता है?पीएचडी का छात्र बिट्टू विश्वकर्मा के तंज से हिला सिस्ट्म !
जिले के चर्चित युवा नेता सह पीएचडी के छात्र बिट्टू विश्वकर्मा ने चल रहे इस सियासी ड्रामे पर तंज कसते हुए कहा कि, असल सवाल यह नहीं है कि नगर परिषद में भ्रष्टाचार हुआ या नहीं। असली सवाल यह है कि अगर हुआ तो चार साल तक सबकी जुबान पर ताला किसने लगाया था? क्या तब शहर स्वर्ग बन गया था? क्या तब सड़कें चमक रही थीं? क्या तब नालियां इत्र बहा रही थीं? क्या तब शहर का कचरा गायब हो गया था? अगर नहीं, तो फिर यह अचानक जागी क्रांति आखिर किसके लिए है? ऐसे लोगो को बक्सर की चिंता बिल्कुल नही है! इन्हें तो अपनी हिस्सेदारी बढ़वाने की चिंता है! यह पूरा शहर जानता है!समाज सेवी रामजी सिंह ने दिखाया विकास का आइना !
जिले के समाज सेवी भ्र्ष्टाचार के घोर विरोधी रामजी सिंह ने बक्सर से लेकर पटना तक पूरे सिस्ट्म की परत दरपरत पोल खोलकर रख दी! रामजी सिंह की माने तो यह लड़ाई भ्रष्टाचार खत्म करने की नहीं, बल्कि भ्रष्टाचार में हिस्सेदारी तय करने की लड़ाई है। जब तक मलाई बराबर बंटती रही, तब तक सब शांत रहे। जैसे ही हिस्से पर सवाल खड़ा हुआ, वैसे ही नैतिकता और ईमानदारी का ज्वालामुखी फूट पड़ा। जिन लोगों ने वर्षों तक व्यवस्था का हिस्सा बनकर बैठकों में तालियां बजाईं, वही आज खुद को भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा विरोधी साबित करने में जुटे हैं। नगर परिषद में करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद शहर की सबसे बुनियादी समस्या तक हल नहीं हुई। वर्षों से विकास का ढोल पीटा गया, लेकिन बक्सर आज भी एक व्यवस्थित कूड़ा डंपिंग जोन के लिए तरस रहा है। शहर का कचरा सड़कों, खाली जमीनों और मोहल्लों के किनारे दम तोड़ता रहा, लेकिन किसी जनप्रतिनिधि की आत्मा नहीं जागी। क्योंकि कचरे से वोट नहीं निकलते, लेकिन आरोपों से सुर्खियां जरूर निकलती हैं। आज जो लोग मंचों पर खड़े होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ गरज रहे हैं, जनता उनसे पूछ रही है कि जब कथित खरीद-फरोख्त, कमीशनखोरी और टेंडर की शिकायतें पहली बार सामने आई थीं तब वे कहां थे? जब जांच की मांग उठी थी तब कितने लोग उसके साथ खड़े हुए थे? और अगर सब कुछ गलत था तो चार साल तक सत्ता के गलियारों में घूमते हुए उन्हें यह अन्याय क्यों नहीं दिखाई दिया?बोले सुनील मिश्रा विकास केवल कागजी शब्द !
नगर परिषद में चार दिनों से चल रहे सियासी ड्रामे पर उपचेयरमैन प्रतिनिधि सुनील मिश्रा ने तंज कसते हुए कहा कि, सच्चाई यह है कि बक्सर में विकास अब एक सरकारी फाइल का शब्द बनकर रह गया है। विकास के नाम पर योजनाएं आईं, बजट आया, बैठकें हुईं, भाषण हुए, फोटो खिंचे, मालाएं पहनी गईं, लेकिन शहर वहीं खड़ा रहा जहां वर्षों पहले था। फर्क सिर्फ इतना आया कि नेताओं की गाड़ियां बड़ी हो गईं, पोस्टर बड़े हो गए और दावे और भी बड़े हो गए ! आज पूरा घटनाक्रम देखकर ऐसा लगता है जैसे विकास की मौत बहुत पहले हो चुकी थी, लेकिन उसका मृत्यु प्रमाण पत्र चुनावी वर्ष में जारी किया गया है। अब विकास के शव के चारों तरफ खड़े लोग आंसू कम और राजनीतिक गणित ज्यादा लगा रहे हैं। कोई खुद को सबसे बड़ा ईमानदार साबित कर रहा है, कोई खुद को सबसे बड़ा पीड़ित बता रहा है, तो कोई जनता की हमदर्दी बटोरने में लगा है। लेकिन बक्सर की जनता अब पहले जैसी नहीं रही। वह समझ रही है कि यह लड़ाई शहर के भविष्य की नहीं, बल्कि राजनीतिक अस्तित्व बचाने की लड़ाई है। जनता जानती है कि सड़क, सफाई, जलनिकासी, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं आज भी वहीं खड़ी हैं जहां वर्षों पहले थीं। इसलिए अब सवाल भ्रष्टाचार का नहीं, पूरे सिस्टम का है।गौरतलब है कि बक्सर का आम आदमी आज सिर्फ इतना कह रहा है— “साहब, विकास का पोस्टमार्टम मत कराइए, पहले यह बताइए कि उसकी हत्या किसने की थी और चार साल तक लाश पर पहरा कौन दे रहा था?” और विकास के शव पर किस-किस ने बैठकर महाभोज किया !


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