लोकतंत्र का उल्टा गणित: मालिक लाइन में, नौकर एयरकंडीशनर में ! अन्नदाता के सपनों में दरार, सत्ता के गलियारों में बहार! जन की नहीं, मन की बात; किसान के हिस्से सिर्फ इंतजार ! बक्सर से भारत तक: कुर्सियों की खेती, किसानों की बर्बादी! खेत में दरार, व्यवस्था में बहार !
बक्सर - जिले की तपती धरती पर इन दिनों सिर्फ मिट्टी नहीं फट रही, बल्कि किसानों के सपने, उम्मीदें और भविष्य भी दरक रहे हैं। रोहिणी नक्षत्र गुजर रहा है, आसमान आग उगल रहा है, खेत पानी के लिए तरस रहे हैं और किसान बीज के लिए बाजार की खाक छान रहा है। लेकिन सत्ता और व्यवस्था की दुनिया में मौसम बिल्कुल अलग है। वहां हरियाली ही हरियाली है—कुर्सियों की हरियाली, बैठकों की हरियाली और स्वागत-सम्मान की हरियाली।जिस किसान की मेहनत से देश का पेट भरता है, आज वही किसान अपने खेत की मेड़ पर बैठकर बादलों का इंतजार कर रहा है। दूसरी तरफ सरकारी दफ्तरों में विकास की ऐसी फसल लहलहा रही है जो सिर्फ फाइलों, रिपोर्टों और पॉवर पॉइंट की स्लाइडों में उगती है। जमीन पर किसान परेशान है, लेकिन कागजों पर उसकी आय दोगुनी हो चुकी है। खेत सूखा है, मगर आंकड़े हरे-भरे हैं।
जनता मालिक थी, कब नौकर बन गई?
लोकतंत्र की किताब कहती है कि जनता मालिक है और सरकार उसकी सेवक। लेकिन जमीनी सच्चाई कुछ और कहानी सुनाती है। आज हालत यह है कि मालिक दफ्तरों के चक्कर काट रहा है और नौकर लालबत्ती, सरकारी बंगले, एसी कमरे और सुरक्षा घेरे में आराम फरमा रहे हैं।जिस किसान के टैक्स, पसीने और मेहनत से सरकारी खजाना भरता है, उसी किसान को अपनी समस्या बताने के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहना पड़ता है। सवाल पूछो तो जवाब मिलता है—"समीक्षा चल रही है", "निर्देश जारी है", "फाइल प्रक्रिया में है"। ऐसा लगता है कि इस देश में समस्याएं खेत में पैदा होती हैं और समाधान फाइलों में दफन हो जाते हैं।
कुर्सी की खेती सबसे लाभकारी व्यवसाय।
देश में खेती घाटे का सौदा हो सकती है, लेकिन कुर्सी की खेती सबसे लाभकारी व्यवसाय साबित हो रही है। किसान एक सीजन की फसल बचाने के लिए कर्ज लेता है, जबकि राजनीति और सत्ता की खेती करने वाले कुछ वर्षों में करोड़ों-अरबों की संपत्ति के मालिक बन जाते हैं।अन्नदाता अपनी बेटी की शादी के लिए जमीन गिरवी रखता है, लेकिन जनसेवा का दावा करने वाले कई चेहरे चुनावी मौसम के बाद आर्थिक चमत्कार कर देते हैं। यह ऐसा गणित है जिसे कृषि वैज्ञानिक नहीं समझते, अर्थशास्त्री नहीं समझते, लेकिन व्यवस्था बहुत अच्छी तरह समझती है।
सवालों से डर क्यों?
किसान पूछ रहा है कि नहरों में पानी कब आएगा?
सरकारी बीज कहां है?
उर्वरक महंगा और उपज सस्ती क्यों है?
किसानों की आय आखिर दोगुनी कब हुई?
बाढ़ और सूखे के मुआवजे का हिसाब क्या है?
बाजार समिति की संपत्तियों का क्या हुआ?
करोड़ों की परियोजनाओं पर ताले क्यों लटक रहे हैं?
शहर की गंदगी साफ करने के नाम पर करोड़ों खर्च होने के बाद भी गंदगी शहर में ही क्यों गिर रही है?
लेकिन इन सवालों के जवाब कम और सवाल पूछने वालों को नसीहत ज्यादा मिल रही है। मानो लोकतंत्र में अब सबसे बड़ा अपराध सवाल पूछना हो गया हो।
खेत नहीं, किसानों के सीने फट रहे हैं!
आज देश का किसान सिर्फ आर्थिक संकट से नहीं लड़ रहा। उसके आत्मविश्वास पर चोट हो रही है। उसके माथे की लकीरें हर साल और गहरी हो रही हैं। खेतों में जितनी दरारें नहीं पड़ीं, उससे ज्यादा दरारें उसके सपनों में पड़ चुकी हैं। विडंबना देखिए—जो आदमी पूरे देश का पेट भरता है, वही अपने घर का बजट नहीं संभाल पा रहा। जो दूसरों के लिए अन्न उगाता है, वही अपने बच्चों के भविष्य को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित है।
बक्सर की धरती से उठ रही यह पीड़ा सिर्फ एक जिले की कहानी नहीं है। यह उस भारत की कहानी है जहां अन्नदाता आज भी मौसम और भगवान के भरोसे है, जबकि सत्ता और व्यवस्था वातानुकूलित कमरों में विकास का उत्सव मना रही है। और शायद सबसे बड़ा सवाल यही है— जब लोकतंत्र का मालिक ही अपने अधिकारों के लिए भटकने लगे, तब आखिर लोकतंत्र बचता कहां है?












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