आज बक्सर केवल एक जवाब चाहता है। - स्लैब क्यों टूटा? गुणवत्ता की निगरानी किसने की? एफआईआर केवल संवेदक पर ही क्यों? निगरानी करने वाले अभियंताओं की जवाबदेही कब तय होगी?


11 साल का सपना, 96 घंटे में मलबा — आखिर किसका अपराध है यह ? पुल नहीं टूटा है, हजारों लोगों का भरोसा टूटकर बिखरा है!  टैक्स जनता ने दिया, श्रेय नेताओं ने लिया, अब जिम्मेदारी कौन लेगा?  ठेकेदार कटघरे में, लेकिन निगरानी करने वाले अभियंता बेदाग क्यों?  बक्सर रो रहा है, और सत्ता-विपक्ष मुद्दे को राजनीति में दफनाने में जुटे हैं!

बक्सर-  इटाढ़ी रेलवे गुमटी पर बना 26 करोड़ 40 लाख रुपये का आरओबी केवल एक पुल नहीं था। यह उन लाखों लोगों की उम्मीद थी, जो 11 वर्षों से रेल फाटक पर लगने वाले जाम, एंबुलेंस की देरी, किसानों की परेशानी और छात्रों की मुश्किलों से मुक्ति का सपना देख रहे थे। लेकिन किसे पता था कि 11 साल की उम्मीद महज 96 घंटे में मलबे में बदल जाएगी।

Ai द्वारा बनाये गए ग्राफ

आरओबी नही टुटा है लोगो का भरोसा !

आज पुल का स्लैब टूटा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा बुरी तरह टूटा है आम लोगों का भरोसा। जिस दिन आरओबी का उद्घाटन हुआ था, उस दिन लोगों ने सोचा था कि अब उनकी जिंदगी आसान होगी। नेताओं ने तस्वीरें खिंचवाईं, सोशल मीडिया पर विकास के गीत गाए गए, बधाइयों की बारिश हुई लेकिन चार दिन बाद ही जब स्लैब धंस गया, सरिया बाहर निकल आई और पुल बंद हो गया, तब वही लोग कहीं दिखाई नहीं दिए जो कल तक विकास के पोस्टर बने हुए थे।

सियासत का आरओबी !

बक्सर का एक बूढ़ा किसान कहता है, "बेटा, हम लोग 50 साल पहले मिट्टी की दीवार से मकान बनाकर हथिया नक्षत्र के बर्षा को चुनौती देते थे ! यंहा के पढ़े लिखे इंजीनियर साहब लोग तो लगता है श्मशान की चिता के राख से आरओबी तैयार कराए थे ! जो बालू की रेत की तरह बिखर गया ! हमलोगों ने 11 साल से पुल का इंतजार किया है। सोचे कि अब बाजार जल्दी पहुंचेंगे, अस्पताल जल्दी पहुंचेंगे। लेकिन अब लगता है कि सपना भी हमसे मजाक कर गया।"

जवाबदेही से भटकाने का खेल !

अब सवाल यह नही है आरओबी क्षतिग्रस्त हो गया। सबसे बड़ा सवाल  यह है कि अब असली सवालों को दबाने की कोशिश हो रही है। कोई राजद की बात कर रहा है, कोई भाजपा की, कोई जदयू की। लेकिन जनता पूछ रही है कि आखिर यह राजनीतिक बहस क्यों? क्या पुल किसी पार्टी कार्यालय से बनकर आया था? क्या इसमें सीमेंट की जगह चुनावी पोस्टर डाले गए थे? क्या इसकी ढलाई किसी राजनीतिक दल के झंडों से हुई थी? नहीं। यह पुल जनता के टैक्स के पैसों से बना था। उस किसान के पैसे से बना था जो खाद खरीदते समय टैक्स देता है। उस मजदूर के पैसे से बना था जो हर सामान खरीदते समय टैक्स देता है। उस दुकानदार के पैसे से बना था जो सरकार को राजस्व देता है। इसलिए जनता का सवाल भी सीधा है—अगर पुल टूटा है तो राजनीति क्यों हो रही है? जवाबदेही क्यों नहीं तय हो रही है?


इंजीनियर पर कब होगा एफआईआर !

उधर कनीय अभियंता की शिकायत पर संवेदक के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गई। लेकिन यहीं से सवाल और बड़ा हो जाता है। जब निर्माण हो रहा था तब गुणवत्ता की निगरानी कौन कर रहा था? मापी किसने की थी? निर्माण को मानक के अनुरूप किसने बताया था? भुगतान की अनुशंसा किसने की थी? यदि ठेकेदार दोषी है तो निगरानी करने वाले अभियंता निर्दोष कैसे हो सकते हैं? अगर पुल में खामी थी तो इंजीनियरों ने काम क्यों नहीं रोका? और अगर खामी नहीं थी तो पुल 96 घंटे में कैसे टूट गया? बक्सर के लोग आज यही महसूस कर रहे हैं कि जैसे किसी गरीब के घर की छत गिर जाए और जांच में केवल राजमिस्त्री को दोषी बता दिया जाए, जबकि काम की निगरानी करने वाले मालिक, मुंशी और इंजीनियर सब सम्मानित अतिथि बने रहें।

रेल फाटक और आरओबी दोनों बन्द !

इधर हालात यह हैं कि आरओबी बनने के बाद रेलवे फाटक स्थायी रूप से बंद कर दिया गया। अब फाटक भी बंद है और पुल भी बंद है। जो रास्ता कभी चार मिनट में तय हो जाता था, आज वहां लोगों को लंबा चक्कर लगाना पड़ रहा है। मरीज अस्पताल पहुंचने के लिए जूझ रहे हैं। किसान बाजार जाने के लिए परेशान हैं। बच्चों को स्कूल पहुंचने में कठिनाई हो रही है। लेकिन अफसोस, जनता की परेशानी पर चर्चा कम और राजनीतिक शतरंज ज्यादा खेली जा रही है।

आज बक्सर केवल एक जवाब चाहता है।

स्लैब क्यों टूटा? गुणवत्ता की निगरानी किसने की?एफआईआर केवल संवेदक पर ही क्यों? निगरानी करने वाले अभियंताओं की जवाबदेही कब तय होगी? क्योंकि यह केवल एक पुल का मामला नहीं है। यह उस भरोसे का मामला है जो जनता सरकार, प्रशासन और व्यवस्था पर करती है! 26 करोड़ का पुल फिर बन जाएगा। टूटा हुआ स्लैब भी बदला जा सकता है। लेकिन अगर जनता का भरोसा टूट गया, तो उसे जोड़ने में शायद 11 साल भी कम पड़ जाएंगे।

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