आनन्द मिश्रा के बयान से भाजपा में ही आ गया सियासी भूचाल! अपनी ही सरकार पर खड़े कर दिए कई सवाल!

 आनन्द मिश्रा के बयान से भाजपा में ही आ गया सियासी भूचाल! अपनी ही सरकार पर खड़े कर दिए कई सवाल! स्थानीय लोगों ने कसा तंज—नहर में किसानों के लिए बनवाया जा रहा पुल कमीशनखोरी है! तो क्या गंगा ब्रिज पर बन रहे पुल रामराज की निशानी हैं? आरओबी हादसे के दस दिन बाद विधायक आनंद मिश्रा की टूटी चुप्पी ने विपक्ष से ज्यादा भाजपा के भीतर बढ़ा दी है बेचैनी! ‘अली बाबा-40 चोर’, ‘10 साल तक माल किसने खाया’ और ‘पीछे कोई बड़ा चेहरा हो सकता है’ जैसे बयानों ने बक्सर की राजनीति में ऐसा सियासी बारूद बिछा दिया है, जिसकी गूंज अब चाय की दुकानों से लेकर पार्टी कार्यालयों तक सुनाई दे रही है।

बक्सर—राजनीति में कभी-कभी एक बयान वह काम कर जाता है, जो बड़े-बड़े आंदोलन भी नहीं कर पाते। बक्सर आरओबी का स्लैब टूटने से जितनी हलचल नहीं मची थी, उससे कहीं ज्यादा भूचाल पूर्व आईपीएस अधिकारी सह सदर विधायक आनंद मिश्रा के एक बयान ने खड़ा कर दिया है।

दस दिनों तक चुप रहने के बाद जब विधायक सामने आए तो लोगों को उम्मीद थी कि वे बताएंगे कि पुल क्यों टूटा, जिम्मेदार कौन है और जनता को राहत कब मिलेगी। लेकिन जवाबों की जगह उन्होंने ऐसे सवाल छोड़ दिए, जिन्होंने पूरी राजनीति को उलझाकर रख दिया।

किसने खाया 10 वर्षों तक माल!

सबसे बड़ा विस्फोट तब हुआ, जब उन्होंने कहा—“10 साल तक पुल का माल किसने खाया, एक-एक चोर का नंबरिंग करके बताएंगे।” यहीं से कहानी बदल गई। क्योंकि जनता के दिमाग में तुरंत सवाल उठा कि जिस आरओबी परियोजना को वर्षों तक भाजपा की उपलब्धि बताया जाता रहा, जिस पर भाजपा के बड़े-बड़े नेताओं ने श्रेय लिया, अगर दस साल का हिसाब खुला तो फिर कटघरे में सिर्फ विपक्ष कैसे खड़ा होगा? उन नेताओं का क्या होगा, जो मंत्री और सांसद बनकर श्रेय लेते रहे?

क्या विधायक ने विपक्ष की आड़ में अपने ही घर में बिछा दी सियासी बारूद?

बीजेपी विधायक के इस बयान के बाद अब शहर के चौक-चौराहों से लेकर गांव की गलियों तक लोग पूछ रहे हैं कि यह हमला वास्तव में मुन्ना तिवारी पर था ! या फिर विपक्ष की आड़ में अपने ही राजनीतिक परिवार के पुराने चेहरों पर निशाना साधा गया है? क्योंकि जिस परियोजना की चर्चा विधायक जी कर रहे हैं, उसका श्रेय 2019 एवं 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के फायरब्रांड नेता अश्विनी कुमार चौबे को दिया जाता रहा है।

क्या कहते हैं राजनीति के जानकार?

राजनीति के जानकार कहते हैं कि पुलिस की गोली से इंसान केवल एक बार घायल होता है, लेकिन राजनीति में छोड़ा गया शब्द कई नेताओं की वर्षों तक नींद उड़ा देता है। आनंद मिश्रा का बयान भी कुछ वैसा ही साबित हो रहा है। उनके तरकश से निकला यह तीर अपने ही परिवार की राजनीतिक पारदर्शिता पर कई सवाल खड़े कर रहा है।

चाय की दुकान पर जून की तपिश से ज्यादा गर्म दिखा सियासी बयान!

शहर के ज्योति चौक पर सुबह-सुबह चाय का आनंद लेने पहुंचे लोग अपने-अपने ढंग से इस बयान के मायने निकाल रहे थे। चीनी मिल के रहने वाले एक युवा इंजीनियर ने तंज भरे लहजे में कहा—“साहब, समझ में नहीं आ रहा है कि केंद्र से लेकर बिहार तक कुल 21-22 राज्यों में सरकार आपकी है, आज से नहीं वर्षों से! फिर मलाई मुन्ना बाबा ने कैसे खाई? माना कि बक्सर का पुल मुन्ना बाबा की कमीशन के कारण गिर गया, तो भागलपुर का पुल किसने गिराया? जब सांसद आपके, प्रधानमंत्री आपके, मुख्यमंत्री आपके, मंत्री आपके, तो फिर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?”

कौन है अली बाबा 40 चोर?

स्थिति तब और दिलचस्प हो गई, जब विधायक ने कहा कि “जरूरी नहीं कि मुन्ना बाबा ही अली बाबा हों, उनके पीछे कोई और भी हो सकता है।”

बस फिर क्या था।

शहर में नया खेल शुरू हो गया—“अली बाबा खोजो अभियान।”

कोई कह रहा है असली चेहरा पर्दे के पीछे है। कोई कह रहा है नाम पता है तो सार्वजनिक करो। कोई पूछ रहा है कि अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो एफआईआर क्यों नहीं? और अगर सबूत नहीं है तो फिर ऐसे भारी-भरकम आरोप क्यों?

कौन है असली कमीशनखोर?

महदह नहर पर पुराने पुल के बगल में बन रहे पुल को लेकर आनंद मिश्रा के दिए गए बयान ने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। विधायक अपने 4 मिनट 59 सेकंड के बयान में कहते हैं—“पुराने पुल के बगल में नया पुल बनवाया जा रहा है। पूछने पर लोग कहते हैं पुराने वाले विधायक जी बनवा रहे हैं। यार, कॉमन सेंस ही नहीं है! पुराने पुल की मरम्मत ही करवा देते, लेकिन नहीं! माल जो खाना है, कमीशन जो लेना है। सभी की जांच होगी।”

अब विधायक जी के इस बयान की आंच किसानों के खेतों तक पहुंच गई। अपने धान की बिचड़ा सिंचाई कर रहे युवा किसान विजय, हरदयाल, डॉक्टर सुरेश यादव और विष्णुदेव पासवान आपस में तर्क करते दिखे—“गजबे बोलत बाड़न विधायक जी! किसान खातिर जवन पुल बनत बा, ओहमें कमीशनखोरी होला? त बक्सर गंगा जी में इतना पुल काहे बनावत बिया सरकार? कमीशनखोरीये खातिर नू! पुरनके पुलवा मरम्मत करवा दिहित सरकार। गजबे हाल बा विधायक जी के!”

हर बयान में नया सस्पेंस!

ज्योति चौक की चाय दुकानों पर लोग मजाक में कह रहे हैं कि बक्सर की राजनीति अब नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज बन गई है, जहां हर एपिसोड में नया सस्पेंस आता है लेकिन विलेन का चेहरा नहीं दिखता। सरकार अपनी, विधायक अपने, सांसद अपने, मंत्री अपने, व्यवस्था अपनी, लेकिन जनता को आज भी सिर्फ “रिक्वेस्ट” का भरोसा दिया जा रहा है।

आवेदन लिखने के लिए नहीं दिया था वोट!

इटाढ़ी रेल फाटक के मुद्दे पर जब विधायक ने कहा कि वे डीआरएम से मिलकर अनुरोध करेंगे, तब लोगों ने तंज कस दिया—“जनता ने वोट सरकार बनाने के लिए दिया था या आवेदन लिखवाने के लिए?” यदि सड़क चौड़ीकरण रोकने वाले लोग सचमुच मौजूद हैं, तो उनके नाम क्यों नहीं बताए जा रहे?

यदि आरओबी में गड़बड़ी हुई है, तो जिम्मेदारों को कानून के हवाले क्यों नहीं किया जा रहा?

और यदि दस साल का हिसाब खुलना है, तो फिर हिसाब आधा-अधूरा क्यों?

आज बक्सर में चर्चा आरओबी से ज्यादा उस बयान की है, जिसने भाजपा के भीतर ही असहजता पैदा कर दी है। जनता अब सिर्फ पुल खुलने का इंतजार नहीं कर रही। जनता इंतजार कर रही है उस दिन का, जब मंच से पहली बार कोई नेता माइक पकड़कर साफ-साफ बताएगा कि आखिर “अली बाबा कौन है?”

अब बक्सर की जनता अब इशारों की राजनीति नहीं, नाम वाली राजनीति सुनना चाहती है। और जब जनता नाम मांगने लगे, तब समझ लीजिए कि राजनीतिक बयान नहीं, राजनीतिक भूकंप शुरू हो चुका है।

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