खेत जल रहे हैं, किसान टूट रहा है... क्या अब भी चुनाव का इंतज़ार है?" "वोट मिल गया तो अन्नदाता भी भूल गए? बक्सर के सूखे खेत सत्ता से पूछ रहे हैं सबसे बड़ा सवाल!" "धान नहीं सूखा है साहब... सरकार के वादों पर किसानों का भरोसा सूख गया है!" "भाषणों में 'अन्नदाता', हकीकत में 'बेसहारा'... यही है कृषि प्रधान देश की सबसे बड़ी त्रासदी!" "जब खेतों में दरार पड़ती है तो लोकतंत्र के दावों में भी दरार साफ दिखाई देती है!"
बक्सर - जिले के खेतों में इस समय केवल धान का बिचड़ा नहीं सूख रहा, बल्कि उन करोड़ों किसानों का विश्वास भी दम तोड़ रहा है, जिन्हें हर चुनाव से पहले देश का "अन्नदाता" कहकर मंचों पर सम्मान दिया जाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हों या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, हर चुनाव में किसानों की आय, सिंचाई, समर्थन मूल्य और खेती को लाभ का धंधा बनाने के बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही किसान सूखी धरती पर आसमान की ओर टकटकी लगाए खड़ा रह जाता है।न वर्षा हुई न नहरों से पानी पंहुचा!
बक्सर में जुलाई समाप्ति की ओर है। न आसमान ने पानी दिया और न सरकार की नहरें खेतों तक पहुंचीं। नतीजा यह है कि रोहिणी नक्षत्र में बोया गया धान का बिचड़ा खेतों में ही जलने लगा है। यह केवल मौसम की मार नहीं है, बल्कि सिंचाई व्यवस्था की नाकामी और सरकारी संवेदनहीनता का जीवंत प्रमाण भी है।2 लाख 22 हजार किसान वाले जिले का यह हाल !
जिले के 2 लाख 22 हजार से अधिक पंजीकृत किसान खरीफ की खेती पर निर्भर हैं। लेकिन आज उनकी सबसे बड़ी पूंजी—उम्मीद—ही सूख रही है। सवाल यह है कि जब करोड़ों रुपये की योजनाएं, कृषि टास्क फोर्स की बैठकें और सरकारी दावे मौजूद हैं, तो खेतों तक पानी क्यों नहीं पहुंचा? आखिर इन बैठकों का लाभ किसान को कब मिलेगा? जगदीशपुर पंचायत के किसान कहते हैं कि चुनाव के समय हर नेता खेतों में फोटो खिंचवाता है, लेकिन संकट आने पर कोई नहर का गेट खुलवाने तक नहीं पहुंचता। महदह नहर से कुछ ही दूरी पर बसे गांवों में भी खेत सूखे पड़े हैं। यह प्राकृतिक आपदा से अधिक प्रशासनिक विफलता की कहानी लगती है।किसान का बेटा नही करना चाहता है किसानी !
सबसे कड़वा सच यह है कि किसान अब अपनी अगली पीढ़ी को खेती में नहीं देखना चाहता। क्योंकि खेती अब सम्मान नहीं, संघर्ष बन चुकी है। एक तरफ लागत लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर सिंचाई, बीज और बाजार की व्यवस्था किसान को अकेला छोड़ देती है। फसल तैयार होने पर भी न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ हर किसान तक नहीं पहुंचता। नमी, तौल और दलाली के नाम पर उसकी मेहनत का मूल्य घटा दिया जाता है। यह वही देश है जहां किसान को अन्नदाता कहा जाता है, लेकिन आज वही अन्नदाता अपनी फसल बचाने के लिए बूंद-बूंद पानी का मोहताज है। सत्ता यदि सचमुच किसानों के साथ खड़ी है तो उसे भाषणों से नहीं, खेतों तक पानी पहुंचाकर साबित करना होगा।बक्सर के सूखे खेत आज केवल बारिश नहीं मांग रहे हैं। वे सत्ता से जवाब मांग रहे हैं—क्या किसान सिर्फ चुनावी भाषणों का विषय है, या देश की प्राथमिकता भी? यदि इस सवाल का जवाब अब भी नहीं मिला, तो खेतों में पड़ रही दरारें आने वाले समय में व्यवस्था की विश्वसनीयता पर भी गहरी दरार बन जाएंगी।



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