किसके संरक्षण में विवेक हॉस्पिटल में चल रहा था गर्भपात का गंदा खेल ! सीएस ने कहा गर्भपात के लिए अस्पताल के पास नही है मान्यता ! फीर भी कार्रवाई नही हुई साहब !

 सुनैना की मौत के बाद कानून क्यों बेबस दिख रहा है साहब ? 24 साल की जिंदगी चली गई… अस्पताल के पास गर्भपात की वैध अनुमति नहीं थी, फिर डीएनसी कैसे हुई? 48 घंटे बाद भी कार्रवाई का इंतजार क्यों?

बक्सर - जिस घर में 24 साल की सुनैना देवी की हंसी गूंजती थी, वहां अब सन्नाटा है। जिस पति के साथ उसने जिंदगी के सपने देखे थे, आज वही पति अपनी पत्नी की मौत का जवाब ढूंढ रहा है। सवाल सिर्फ एक जिंदगी के बुझ जाने का नहीं है… सवाल उस सिस्टम का है, जिसके भरोसे आम आदमी अपनी जान अस्पताल के दरवाजे पर छोड़ देता है। सुनैना की मौत ने बक्सर के स्वास्थ्य महकमे के सामने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब सिर्फ कागजों में नहीं, जमीन पर चाहिए।

धड़ल्ले से चल रहा है जिले में गर्भपात का खेल !

अगर विवेक हॉस्पिटल के पास गर्भपात की वैध अनुमति नहीं थी, जैसा कि सिविल सर्जन ने बताया है, तो वहां डीएनसी जैसी प्रक्रिया आखिर कैसे हुई? और अगर यह प्रक्रिया नियमों के खिलाफ थी, तो कार्रवाई की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?

पति की आंखों के सामने बुझ गई जिंदगी… अब जवाब कौन देगा?


सुनैना के पति अजित कुमार के मुताबिक, उनकी पत्नी की डीएनसी की गई थी। इसके बाद एक बाहरी महिला स्वास्थ्यकर्मी को अस्पताल बुलाया गया। उसके जाने के बाद अस्पताल में मौजूद नर्स ने इंजेक्शन लगाया और इसके बाद सुनैना की तबीयत बिगड़ने लगी। कुछ ही देर में वह जिंदगी की जंग हार गई। एक पति ने अपनी पत्नी को बचाने के लिए अस्पताल का दरवाजा खटखटाया था… लेकिन वापस उसे पत्नी की लाश मिली। अजित ने अस्पताल प्रबंधन पर उसके साथ मारपीट किए जाने का भी आरोप लगाया है। हालांकि इन आरोपों की  पुष्टि जांच के बाद ही होगी। लेकिन एक सवाल तो आज भी जिंदा है— अगर इलाज नियमों के मुताबिक था, तो फिर सुनैना की मौत कैसे हुई?

सीएस का बयान ही खोल रहा है व्यवस्था की पोल!

सिविल सर्जन शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती के मुताबिक अस्पताल की फाइल की जांच की गई है। उनका कहना है कि अस्पताल के पास जनरल प्रैक्टिस का लाइसेंस था, लेकिन उसका नवीनीकरण फिलहाल नहीं हुआ है। वही अस्पताल के पास गर्भपात कराने से संबंधित वैध कागजात भी नहीं मिले।

 मामला सिर्फ एक अस्पताल की नही हो रहे मौत की है!

यदि विवेक अस्पताल गर्भपात के लिए मान्यता प्राप्त नहीं था  तो प्रक्रिया किसके भरोसे हुई?

अगर लाइसेंस रिन्यू नहीं था तो अस्पताल किस आधार पर चल रहा था?

अगर सबकुछ नियमों के मुताबिक था तो सुनैना की मौत के बाद कार्रवाई की तस्वीर इतनी धुंधली क्यों है?

कानून है… लेकिन क्या गरीब के लिए उसकी रफ्तार भी है?

कानून में अवैध गर्भपात और लापरवाही के मामलों से निपटने के प्रावधान मौजूद हैं। मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी कानून और आपराधिक कानून के तहत परिस्थितियों और साक्ष्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय की जा सकती है।

लेकिन आम आदमी का दर्द यहीं से शुरू होता है।

कानून की किताब मोटी है… मगर कार्रवाई की फाइल इतनी पतली क्यों?

एक गरीब परिवार के लिए अस्पताल का बिल तुरंत बन जाता है, लेकिन अस्पताल की जवाबदेही तय करने में दिन, हफ्ते और कभी-कभी साल क्यों लग जाते हैं?

सुनैना अब जवाब मांगने के लिए इस दुनिया में नहीं है। उसका पति है… उसका परिवार है… और उसकी मौत की खामोश गवाही देता एक सवाल है— क्या अस्पताल में नियमों से ज्यादा ताकतवर कोई और व्यवस्था चल रही थी?

48 घंटे बाद भी सवाल वही—एफआईआर कहां है? कार्रवाई कहां है?

सुनैना की मौत के 48 घंटे से ज्यादा समय बीत चुका है। ऐसे में यदि अभी तक पुलिस या स्वास्थ्य विभाग की ओर से ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई है, तो सवाल उठना लाजिमी है।

क्या विभाग पोस्टमार्टम, मेडिकल रिकॉर्ड, अस्पताल के दस्तावेज और इलाज से जुड़े सभी लोगों की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर रहा है?

क्या अस्पताल में उस दिन मौजूद डॉक्टर, नर्स और कथित तौर पर बाहर से बुलाई गई स्वास्थ्यकर्मी से पूछताछ हुई?

क्या डीएनसी की अनुमति और प्रक्रिया से जुड़े दस्तावेज जब्त किए गए?

और सबसे बड़ा सवाल—अगर अस्पताल के पास गर्भपात की वैध अनुमति नहीं थी, तो फिर सिस्टम ने पहले क्यों नहीं रोका?

सुनैना की मौत सिर्फ एक मौत नहीं… सिस्टम की परीक्षा है

अब सुनैना वापस नहीं आएगी। उसके पति की आंखों का दर्द भी किसी सरकारी आदेश से खत्म नहीं होगा। उसके परिवार को मुआवजा मिल भी जाए तो मां, बेटी, पत्नी और बहू के रूप में खोई जिंदगी वापस नहीं लौटेगी।लेकिन कम से कम इतना तो हो सकता है कि उसकी मौत बेकार न जाए।

जांच हो।

जिम्मेदारी तय हो।

दोषी मिले तो कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।

और अगर अस्पताल या किसी स्वास्थ्यकर्मी की लापरवाही नहीं थी, तो यह भी साफ-साफ सामने आए।

क्योंकि न्याय सिर्फ दोषी को सजा देने का नाम नहीं है… न्याय उस परिवार को सच बताने का नाम भी है, जिसने अपनी 24 साल की बेटी खो दी।

अब बक्सर के ‘साहब’ से तीन सीधे सवाल हैं—

पहला—जब अस्पताल के पास गर्भपात की वैध अनुमति नहीं थी, तो डीएनसी की प्रक्रिया वहां कैसे हुई?

दूसरा—सुनैना की मौत के 48 घंटे बाद भी अगर ठोस कार्रवाई नहीं हुई, तो जिम्मेदार कौन है?

तीसरा—क्या कानून की धीमी रफ्तार का फायदा अस्पतालों को मिलेगा, या सुनैना की मौत के बाद सिस्टम किसी एक जिम्मेदार को कानून के कटघरे तक पहुंचाएगा? क्योंकि सुनैना चली गई है… लेकिन उसका सवाल अभी जिंदा है। और इस सवाल का जवाब अब फाइल नहीं, सिस्टम को देना होगा।

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