जिस घर में सुनैना की हंसी गूंजती थी, वहां अब मातम है! किसके संरक्षण में जिले के निजी अस्पतालों में चल रहा है मौत का खेल !

 जिस घर में सुनैना की हंसी गूंजती थी, वहां अब मातम है! 24 साल की उम्र में जिंदगी से हार गई सुनैना… क्या सिस्टम उसकी मौत का जवाब देगा? पति की आंखों के सामने बुझ गई जिंदगी, पीछे रह गया सिर्फ एक सवाल—आखिर गलती किसकी थी? हर मौत के बाद जांच… लेकिन गरीब को न्याय कब? निजी अस्पतालों के इस खेल में अगली सुनैना कौन होगी?


बक्सर-किसी मां से उसकी 24 साल की बेटी के बारे में पूछिए… फिर उसी मां के सामने उसकी बेटी की अर्थी रख दीजिए। शायद उस दर्द की कोई भाषा नहीं होती।बक्सर जिले के बारुपुर की सुनैना देवी अब सिर्फ एक नाम रह गई हैं। 24 साल की उम्र… जिस उम्र में जिंदगी अपने सबसे खूबसूरत सपने बुनती है, उसी उम्र में सुनैना की जिंदगी खत्म हो गई। सोमवार को विवेक हॉस्पिटल में उसकी मौत हुई। एक परिवार उजड़ गया। एक पति की दुनिया उजड़ गई। एक मां की गोद सूनी हो गई। और पीछे रह गया एक सवाल— क्या सुनैना की मौत सिर्फ एक घटना है… या उस व्यवस्था की कहानी है, जहां गरीब की जिंदगी की कीमत अक्सर उसकी जेब देखकर तय होती है?

उस पति का दर्द कौन समझेगा?

जिस पति ने अपनी पत्नी को इलाज के लिए अस्पताल पहुंचाया होगा, उसने शायद सोचा भी नहीं होगा कि  उसे उसी पत्नी का शव लेकर घर लौटना पड़ेगा। कहा जाता है कि घटना के बाद विवाद हुआ, हंगामा हुआ, आरोप लगे और वीडियो भी सामने आए। लेकिन सोचिए…जिस आदमी की आंखों के सामने उसकी पत्नी की जिंदगी खत्म हुई हो, उस वक्त उसके भीतर क्या गुजर रही होगी?उसे पैसा नहीं चाहिए होगा। उसे भाषण नहीं चाहिए होगा। उसे जांच का कागज भी नहीं चाहिए होगा। उसे तो सिर्फ अपनी पत्नी चाहिए थी। लेकिन वह वापस नहीं मिली। अब उसके पास बचा है तो पत्नी की याद, घर की खामोशी और वह सवाल जिसे शायद वह जिंदगी भर अपने भीतर ढोएगा—“आखिर मेरी सुनैना क्यों नहीं बची?”

मौत के बाद सिस्टम क्यों जागता है?

यह सवाल सिर्फ एक विवेक हॉस्पिटल का नहीं है। बक्सर में ऐसे चल रहे सैकड़ो निजी अस्पतालों को लेकर है! जिनके ऊपर पहले भी गंभीर शिकायतें और आरोप लगते रहे हैं। कहीं शराब से भरी बोतलें मिलने की बात सामने आई। कहीं शराब पार्टी की तस्वीरें वायरल हुईं।कहीं इलाज के बाद मौत पर शव को लेकर विवाद हुआ।कहीं पैसे को लेकर परिजनों और अस्पताल प्रबंधन के बीच विवाद की खबर सामने आई। कहीं सरकारी डॉक्टरों के निजी अस्पतालों में सेवा देने को लेकर सवाल उठे। तो कही मौत के बाद पैसा देकर मामला दबाने का मामला भी सामने आया ! उसके बाद भी  हर बार क्या हुआ?हंगामा हुआ। पुलिस पहुंची। जांच की बात हुई। और फिर… सब शांत। लेकिन साहब लोगो को कौन बताए कि गरीब के घर में शांति नहीं आती। वहां तो मातम रहता है।

जांच की फाइल गरीब के आंसू नहीं पोंछती साहब!

जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को बताना चाहिए—पिछले एक साल में कितने निजी अस्पतालों की जांच हुई? कितनों पर कार्रवाई हुई? कितने अस्पतालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई? कितने जांच घरों की जांच हुई? कितनी मेडिकल दुकानों पर प्रतिबंधित दवाओं की बिक्री को लेकर कार्रवाई हुई? और अगर कार्रवाई हुई तो उसका परिणाम क्या हुआ? क्योंकि जांच का मतलब सिर्फ एक टीम भेज देना नहीं होता। जांच का मतलब सच सामने लाना होता है। जिम्मेदारी तय करना होता है।दोषी मिले तो कार्रवाई करना होता है। और सबसे जरूरी—अगली सुनैना को बचाना होता है।

सरकारी अस्पताल गरीब का सहारा है या निजी अस्पतालों का रास्ता?

एक और सवाल बक्सर के सरकारी अस्पताल से जुड़ा है।आरोप लगते रहे हैं कि सरकारी अस्पताल आने वाले मरीजों को निजी अस्पतालों और जांच केंद्रों तक पहुंचाने वाला कथित नेटवर्क सक्रिय है ! अगर यह सच नहीं है तो प्रशासन इसकी जांच कराकर आरोपों को खत्म करे।लेकिन अगर यह सच है तो फिर सवाल बहुत बड़ा है—सरकारी अस्पताल के भीतर बैठकर गरीब मरीजों की मजबूरी का रास्ता निजी अस्पताल तक कौन बनाता है?सीसीटीवी कैमरे क्या सिर्फ दीवारों की शोभा बढ़ाने के लिए लगाए गए हैं? अगर मरीजों को निजी अस्पताल तक पहुंचाने वाले कथित दलाल कैमरे में दिखाई देते हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं? और अगर कोई नेटवर्क नहीं है तो फिर सरकारी अस्पताल के आसपास घूमने वाले ऐसे लोगों की पहचान क्यों नहीं की जाती?

दो साल पुराने सवाल आज भी जवाब मांग रहे हैं

सरकारी अस्पताल के कुछ कर्मचारियों द्वारा दो साल पहले कथित मरीज-ट्रांसफर सिंडिकेट का खुलासा किए जाने की बातें सामने आई थीं। अगर उस समय शिकायत हुई थी तो जांच का क्या हुआ? अगर दोषी मिले तो कार्रवाई कहां है? और अगर शिकायत करने वाले ही दबाव में आ गए तो यह और बड़ा सवाल है—क्या इस सिस्टम में सच बोलने वाला ज्यादा कमजोर है और कथित सिंडिकेट ज्यादा ताकतवर? अगर ऐसा है तो फिर गरीब अपनी शिकायत लेकर जाए तो जाए कहां?

शहर का आम आदमी जानता है… साहब क्यों नहीं जानते?

विडंबना देखिए। शहर का ई-रिक्शा चालक तक बता देता है कि किस इलाके में कौन सा अस्पताल है, कौन सी दुकान पर क्या बिकता है और किस जगह मरीजों को भेजा जाता है। लेकिन जिन अधिकारियों को इन सबकी निगरानी करनी है, उनके पास अक्सर जवाब होता है—“जांच कराई जाएगी।”आखिर कब तक? कितनी मौतों के बाद? कितने घर उजड़ने के बाद? किसी अधिकारी की फाइल पर लिखी एक लाइन क्या उस मां की जिंदगी वापस ला सकती है, जिसकी बेटी अब कभी दरवाजे से आवाज नहीं देगी?

पुलिस ने कहा—एफआईआर नहीं हुई! घरवालों ने कहा मौत नही हत्या है!

घटना के संबंध में नगर थाना के सरकारी नंबर पर संपर्क किया गया तो एसआई मुकेश ने बताया कि परिजन घर चले गए हैं और कोई एफआईआर नहीं हुई है।लेकिन यह जवाब भी एक सवाल छोड़ गया। क्या न्याय पाने के लिए पहले टूटे हुए परिवार को ही थाने की चौखट पर जाना होगा? क्या मौत के बाद व्यवस्था खुद संज्ञान नहीं ले सकती? क्या एक परिवार के पास इतना साहस बचा होगा कि वह अपनी बेटी की मौत के अगले ही पल थाने, अस्पताल और सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाए? जिस परिवार की दुनिया उजड़ चुकी हो, क्या अब न्याय की लड़ाई भी उसी परिवार के कंधे पर डाल दी जाएगी? इन तमाम सवालों के बीच परिजन इसे लापरवाही में की गई हत्या बताकर पुलिस पर कार्रवाई नही करने का आरोप लगा रहे है!

कल फिर अस्पताल खुलेगा… लेकिन सुनैना का घर नहीं

कुछ दिन गुजरेंगे। हंगामा खत्म हो जाएगा। सोशल मीडिया पर नई खबरें आ जाएंगी। अधिकारी दूसरी बैठकों में चले जाएंगे। जांच की फाइल किसी टेबल पर चली जाएगी। और विवेक हॉस्पिटल का दरवाजा शायद फिर मरीजों के लिए खुल जाएगा। लेकिन सुनैना के घर का एक दरवाजा हमेशा बंद रहेगा। वह दरवाजा, जिसके पीछे अब उसकी आवाज नहीं सुनाई देगी। उसका पति जब घर आएगा तो शायद एक पल के लिए दरवाजे की तरफ देखेगा… शायद उसे लगेगा कि सुनैना अभी बाहर से आवाज देगी। लेकिन आवाज नहीं आएगी। क्योंकि सुनैना चली गई है। इस सिस्टम को आइना दिखाकर! क्योकि ? सुनैना को अब कोई जांच वापस नहीं ला सकती। लेकिन उसकी मौत के बाद अगर सिस्टम जाग जाए, दोष तय हो जाए और किसी दूसरी गरीब बेटी की जिंदगी बच जाए… तो शायद सुनैना की मौत व्यर्थ नहीं जाएगी।

अब जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग को जवाब देना होगा—कितने अस्पतालों की जांच हुई? कितनों पर कार्रवाई हुई? कितनी मेडिकल दुकानों पर प्रतिबंधित दवाओं को लेकर कार्रवाई हुई? सरकारी अस्पताल से निजी अस्पताल तक मरीज पहुंचाने वाले कथित नेटवर्क की जांच कब होगी? और निजी अस्पतालों में लगातार उठ रहे सवालों का स्थायी समाधान कब होगा? 

 सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सुनैना कैसे मरी?

सबसे बड़ा सवाल यह है कि— अगर आज इस मौत का जवाब नहीं मिला, तो कल किसी और घर की बेटी अस्पताल जाएगी… और क्या वह भी सिर्फ एक खबर बनकर लौटेगी? सुनैना की चिता की आग बुझ जाएगी। उसके घर का रोना धीरे-धीरे कम हो जाएगा। लोग आगे बढ़ जाएंगे। लेकिन एक पति के भीतर शायद यह सवाल जिंदगी भर जिंदा रहेगा—“मेरी सुनैना को कौन वापस लाएगा?” और इस सवाल का जवाब न कोई अस्पताल दे सकता है, न कोई फाइल। औऱ न ही कोई बड़का साहब ! इसका अब जवाब देना होगा सिस्टम को।

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