डुमराँव की सियासत में धन-बल का नया खेल! कर्म से नहीं, करंसी से वोट तय करने की तैयारी में है नेता जी ! ददन की दाव में उलझ गई है पूरी समीकरण ! क्या अजित लगाएंगे जीत का जोड़ा !
बक्सर- जिले की 201 डुमराँव विधानसभा सीट पर चुनावी तापमान तेज़ी से बढ़ रहा है. विकास के मुद्दे पीछे छूट गए हैं और अब मंच पर ‘नोट, नारा और नेटवर्किंग’ की तिकड़ी का बोलबाला है. नेता जी सोशल मीडिया पर इतने सक्रिय हैं कि दिन में तीन बार डिजिटल हाजिरी लगाते हैं।. बताया जा रहा है कि उन्होंने लाखों रुपये खर्च कर एक सोशल मीडिया टीम खड़ी की है, जो हर पोस्ट पर “जय हो नेताजी” की लाइन बिछा देती है.
राहुल सिंह जदयू उम्मीदवार
मुख्यमंत्री के निर्णय पर संशय में आधी आबादी !
रेलवे स्टेशन पर बैठी महिलाएँ भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के फैसले पर सवाल उठाती नजर आईं — “नीतीश जैसे सुलझे मुख्यमंत्री किस दबाव में ऐसे पैराशूट प्रत्याशी को आगे कर दिए, जो खुद नहीं बता पा रहा कि उसे वोट क्यों दें?” अब जनता पूछ रही है — क्या टिकट अब कर्म से नहीं, करंसी से तय होता है?
शिवांग विजय सिंह जन सुराज उम्मीदवार
राजाओं-महाराजाओं की इस धरती पर अब नेता जी का शाही अंदाज़ !
चर्चा में है जिस धरती पर कभी तिलक, तराजू और तलवार की राजनीति करते थे, अब कैमरा, कंटेंट और क्लिक पर टिके हैं. जनता कहती है, “जो आज खर्च कर रहा है, वो कल वसूलेगा भी.” डुमराँव के लोग जानते हैं कि चुनाव में बहाया गया पैसा विकास में नहीं, सत्ता सुख में बदलता है.
नेता जी का देश भक्ति से !
मंच से नेता जी जब देशभक्ति का पाठ पढ़ाते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे पूरे भारत में आख़िरी देशभक्त वही बचे हों. उनके भाषणों में ‘विकास’ शब्द गुम है, पर ‘देश’, ‘धर्म’ और ‘दुश्मन’ की गूंज भरपूर है.
अजित कुमार सिंह विधायक
क्या कहते है वर्तमान विधायक ?
वर्तमान विधायक अजित कुशवाहा ने तीखा प्रहार करते हुए कहा — “डुमराँव की मिट्टी शहीदों के खून से लाल हुई है, यह पूंजीपतियों की धरती नहीं।” उन्होंने याद दिलाया कि 16 अगस्त को आज भी यहाँ क्रांति दिवस मनाया जाता है, जहां शहीदों के बलिदान की भावना जिंदा है.
ददन पहलवान बीएसपी उम्मीदवार !
ददन पहलवान की दाव से उलझ गई है पूरी समीकरण
इस बार बहुजन समाज पार्टी से पूर्व मंत्री ददन पहलवान भी मैदान में हैं। उनकी एंट्री ने समीकरणों को उलझा दिया है। समर्थकों का कहना है — जनता अब नारों से नहीं, नतीजों से संतुष्टि चाहती है। बिजली, पानी और रोजगार जैसे मुद्दे अब भी अधूरे हैं. डुमराँव का मतदाता अब समझदार है — उसे पता है कि जो नेता ऑनलाइन ‘लाइव’ रहते हैं, वे जनता की तकलीफों पर अक्सर ‘ऑफलाइन’ हो जाते हैं। आने वाला चुनाव तय करेगा कि डुमराँव किसे चुनेगा — विकास के सिपाही को या प्रचार के सम्राट को।





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