कमीशन के शहर में ‘स्वच्छता’ हुई बेघर! फाइल में हर गड़बड़ी का इलाज “शो कॉज़” है, और जमीन पर हर गलती का इलाज “कमीशन”! जनता की टैक्स के पैसे से कुछ लोग हो रहे है ‘मालामाल’, यही है अपना शहर बक्सर का हाल !
बक्सर - स्थानीय नगर परिषद क्षेत्र में “स्वच्छता” अब सरकारी कागजों में सबसे “गंदी कहानी” बन चुकी है. नगर परिषद की नई सरकार के कुछ जनप्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों ने मानो कमीशनखोरी को ही विकास का पर्याय मान लिया है. शहर के लोग अब खुलेआम कह रहे हैं . बक्सर में “शहर की सफाई नहीं, कमीशन की गिनती हो रही है!”नगर परिषद के अधिकारी और कुछ नए सत्ता-सेवी जनप्रतिनिधि, दोनों मिलकर शहर की सूरत को सुधारने की जगह, उसे “कमीशन के कॉन्ट्रैक्ट” में बदल चुके हैं. बाईपास नहर, सिंडिकेट गोलम्बर, नया बाजार, हुकहा लॉ कॉलेज ठोरा नदी के बाद अब एनएच 922 पटना-बक्सर फोरलेन के किनारे अहिरौली में कूड़ा डंप का नया ठिकाना बना दिया गया! यानी शहर की गंदगी को छिपाने की जगह बदल दी गई, पर मानसिकता गंदी ही रह गई !
13 करोड़ 80 लाख वाली गंदगी देखनी है तो आइये हमारे बक्सर में !
अपना शहर बक्सर की खूबसूरत तस्वीरप्रत्येक साल 13 करोड़ 80 लाख रुपए शहर के 42 वार्ड की साफ- सफाई पर खर्च किया जाता है.उसके बाद भी शहर की गलियां और सड़के बदबू से पट चुकी हैं. नई सरकार के चेयरमैन प्रतिनिधि नेमतुल्ला फरीदी ने चुनाव के दौरान दावा किया था — “हम आधे पैसे में बेहतर सफाई देंगे.” पर नतीजा यह हुआ कि की साफ -सफाई की राशि में कई गुणा वृद्धि करने के बाद भी इस शहर को कूडो का शहर बना दिया गया ! हैरानी की बात है कि त्योहारों के इस सीजन में यह हाल है.
स्वच्छता कर्मीयो के नाम पर धांधली !
स्थानीय लोगों का आरोप है कि प्रत्येक वार्ड में स्वच्छता कर्मियों के नाम पर भी धांधली हो रही है. जिनका नाम लिस्ट में है, वे मैदान में नहीं दिखते, और जो काम कर रहे हैं, उनके मजदूरी में भी कटौती की जा रही है. कहा जा रहा है कि कई जनप्रतिनिधि और अधिकारी “एजेंसी” के नाम के आड़ में अपनी जेबें गर्म कर रहे हैं यानी “स्वच्छ भारत” का नारा अब “स्वच्छ कमीशन, गंदा शहर” में तब्दील हो गया है. ऐसे में बेहतर साफ- सफाई की कल्पना कैसे की जा सकती है.
कूड़ा डम्पिंग का नया पता पटना बक्सर फोरलेन एनएच 922 !
एनएच 922 की खूबसूरत तस्वीरअब जिला मुख्यालय के एनएच 922 कूड़ा डम्पिंग का नया ठिकाना बन गया है. जंहा बिना रोकटोक के कूड़ा डंप किया जा रहा है. और अधिकारी एवं जवाबदेह लोग कमीशन गिनने में इतना ब्यस्त है कि जनता की तकलीफ उन्हें नही दिखाई दे रही है. जब इसकी जानकारी स्वच्छता पदाधिकारी रवि कुमार से ली गई, तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा — “हमें कोई जानकारी ही नहीं है, आप फोटो-वीडियो भेजिए, हम शो कॉज़ कर देंगे.” शहरवासी कहते हैं कि यही “शो कॉज़ संस्कृति” असली सफाई की सबसे बड़ी दुश्मन बन चुकी है. फाइल में हर गड़बड़ी का इलाज “शो कॉज़” है, और जमीन पर हर गलती का इलाज “कमीशन”.
कम्प्लेन बनता है कमाई का जरिया !
वही एक सफाईकर्मी ने नाम नही लिखने के शर्त पर बताया कि, “जब भी कोई शिकायत आती है, तो ऊपर तक सबका बल्ले-बल्ले हो जाता है. उसी के बहाने वसूली की नई सौगात मिलती है.” यानी शिकायत भी अब कमाई का जरिया बन चुकी है. शहर के जागरूक लोगो कि माने तो स्वच्छता अब सिर्फ सफाई का मुद्दा नहीं, बल्कि प्रशासनिक सड़ांध का उदाहरण बन गया है. जनता के टैक्स से मिलने वाले करोड़ों रुपए, सफाई कर्मियों तक पहुंचने से पहले ही ‘कमीशन की नालियों’ में बह जाते हैं.बाईपास से लेकर बाजार तक फैली गंदगी, टूटे नाले, दुर्गंध और जगह- जगह डंपिंग ग्राउंड की तस्वीरें बताती हैं कि बक्सर नगर परिषद का प्रशासन और प्रशासक अब जनता नहीं, ‘एजेंसियों की साझेदारी से चलता है.
गौरतलब है कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, घोषणाओं के फूल झरते रहेंगे, लेकिन शहर की हालत वही — गंदगी में लिपटा हुआ है.अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में बक्सर का नाम “कूड़ासिटी” रख देना ही प्रशासन की ईमानदारी होगा !



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