₹100 की दिहाड़ी, 8 महीने की भूख: यही है ‘स्वच्छ’ बिहार का सच ! नाली में उतरता मजदूर, एसी में सोता तंत्र! एक कप चाय से सस्ती सफाई, मगर सरकार को महंगी जवाबदेही ! लोहिया स्वच्छ बिहार: नाम में स्वच्छता, ज़मीन पर बदहाली ! भत्ता बढ़ता रहा, गरीब का चूल्हा बुझता रहा ₹100 की दिहाड़ी, 8 महीने का इंतज़ार ! बक्सर में ‘स्वच्छता’ के नाम पर मजदूरों के साथ खुला मज़ाक
बक्सर - यह बिहार का बक्सर जिला है साहब—जहां गरीब, दिहाड़ी मजदूर, सफाईकर्मी और किसान तब तक सिस्टम की नजर में मौजूद ही नहीं होते, जब तक वे सड़क पर उतरकर भूख और बेबसी का प्रदर्शन न करें। यहां अफसरों की नींद तभी खुलती है, जब हालात विस्फोटक हो जाते हैं। उससे पहले एसी कमरों में बैठा तंत्र यह मानकर चलता है कि ₹100 की दिहाड़ी पर काम करने वालों को शायद भूख नहीं लगती।
उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे बक्सर जिले की आबादी लगभग 24 लाख है। जिले के 11 प्रखंडों में करीब 2.45 लाख परिवार खेती पर निर्भर हैं, जबकि उससे भी बड़ी आबादी दिहाड़ी मजदूरी कर किसी तरह जीवन काट रही है। इसके उलट जिले में कुछ ऐसे रसूखदार चेहरे भी हैं, जिन्होंने सरकारी और कमजोर तबके की जमीनों पर कब्ज़ा कर अकूत संपत्ति खड़ी कर ली। हालात ऐसे हैं कि पूरा प्रशासन उनके सामने नतमस्तक नजर आता है। आज तक कोई ऐसा अधिकारी नहीं हुआ, जो उनसे ढंग से होर्डिंग टैक्स तक वसूल सके। सख्ती अगर कहीं दिखती है, तो सिर्फ गरीबों पर।
फाइलों में चमक रही है योजना, लेकिन ज़मीन पर मार रही है बदबू !
ग्रामीण इलाकों की साफ-सफाई के नाम पर वर्ष 2022 में राज्य सरकार ने ‘लोहिया स्वच्छ बिहार अभियान’ की शुरुआत की थी। मकसद था—हर पंचायत के वार्ड, गली और नाली को साफ रखना। इसके लिए स्वच्छता कर्मियों की बहाली की गई—₹100 प्रतिदिन की दिहाड़ी पर। निगरानी के लिए विकास मित्र स्तर पर सुपरवाइजर भी नियुक्त किए गए। लेकिन हकीकत यह है कि मई 2025 से अब तक—पूरे 8 महीने—इन सफाई कर्मियों को उनकी मामूली मजदूरी तक नसीब नहीं हुई। नतीजा यह कि कई वार्डों में महीनों से सफाई पूरी तरह ठप है। योजना फाइलों में चमक रही है, लेकिन ज़मीनी हकीकत बदबू मार रही है।
साहब की “एक कप चाय से सस्ती है हमारी मेहनत”
सदर प्रखंड के जगदीशपुर पंचायत में कुल 14 वार्ड हैं। वार्ड संख्या 10 और 11 में पिछले एक साल से सफाई पूरी तरह बंद है। सफाईकर्मी आक्रोश में कहते हैं— “साहब लोग जितने में एक कप चाय पी जाते हैं, उतने में हम पूरा दिन एक वार्ड की नाली और गली साफ करते हैं। ₹100 में कचरा उठाना, नाली साफ करना, सब कुछ। ठेला खराब हो जाए तो अपनी जेब से बनवाते हैं। फिर भी 8 महीने से एक रुपया नहीं मिला। क्या हमारे घर में ठंड नहीं पड़ती? क्या हमारे बच्चों को भूख नहीं लगती? हमारे घरों के चूल्हे महीनों से ठंडे पड़े हैं।”
जिम्मेदार बोले: पैसा है ही नहीं
मजदूरों के इस परेशानी को लेकर विकास मित्र रेनू कुमारी से संपर्क किया गया तो उनके पति भरत राम ने बताया कि जगदीशपुर पंचायत में 18 सफाईकर्मी कार्यरत हैं। लेकिन भुगतान नहीं होने के कारण वार्ड 10 और 11 के कर्मियों ने काम बंद कर दिया है। “₹100 की मजदूरी, वह भी 8 महीने बाद—ऐसे में कौन काम करेगा?” उन्होंने सवाल उठाया। की इतने कम पैसे में भला कोई काम करता है क्या ? लेकिन पेट की भूख जो न करने को मजबूर कर दे!
अधिकारी बोले: सरकार ने पैसा नहीं भेजा
सदर प्रखंड के प्रखंड विकास पदाधिकारी साधु शरण पांडे ने साफ शब्दों में कहा— “विभाग से जिले को पैसा ही नहीं मिला है। पैसा आते ही भुगतान कर दिया जाएगा। जिले या प्रखंड स्तर से राशि नहीं रोकी गई है।”
असली सवाल: जवाबदेही कब तय होगी?
₹100 की दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों का परिवार कैसे जिए—यह सवाल शायद किसी फाइल में दर्ज ही नहीं है। सांसद-विधायक अपने महंगाई भत्ते बढ़ाने में कभी संकोच नहीं करते, लेकिन जिनके कंधों पर स्वच्छता की पूरी जिम्मेदारी है, उनके हिस्से 8 महीने की भूख आती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं कि पैसा कब आएगा। सवाल यह है कि जिम्मेदार अफसरों और सरकार से जवाबदेही कब तय होगी? जब तक सफाई करने वाले हाथों को सम्मान और समय पर मेहनताना नहीं मिलेगा, तब तक ‘स्वच्छ बिहार’ सिर्फ एक खोखला नारा ही


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