मजदूरों के शोषण का प्रतीक बना चौसा थर्मल पावर प्लांट ! मजदूरों का आरोप अंग्रेजो से भी बदतर व्यवहार कर रहे है प्लांट के अधिकारी ! 4 घंटे अधिक काम लेने के बाद भी नही दी है चार महीने से मजदूरी ! प्रवास पर गए है प्रवासी नेता जी !

 हाले चौसा थर्मल पावर प्लांट : चिमनी से धुआँ, मजदूरों की थाली से निवाला गायब! चार महीने की मजदूरी हजम, 8 घंटे की जगह 12 घंटे बेगार, ‘विकास’ बना मजदूरों का अभिशाप !

बक्सर- बिहार के बक्सर जिले के चौसा में निर्माणाधीन 1320 मेगावाट के थर्मल पावर प्लांट में शनिवार से मजदूरों ने काम ठप कर दिया है। वजह सीधी और बेहद शर्मनाक है—चार महीने से मजदूरी का भुगतान नहीं हुआ है ! तय समय से ज्यादा काम कराने के बावजूद सुरक्षा के नाम पर मजदूरों के जीवन से खुला मज़ाक हो रहा है। जिस प्लांट को विकास का इंजन बताया गया था, वही आज हजारों मजदूरों के लिए भुखमरी, डर और अपमान का पर्याय बन चुका है। मजदूरों का आरोप है कि उनसे 8 घंटे के बदले 12 घंटे तक काम कराया जाता है, लेकिन भुगतान न बोर्ड रेट पर होता है और न ही समय पर। ठंड के इस मौसम में मजदूरों के घरों में चूल्हा जलना मुश्किल हो गया है, जबकि प्लांट की चिमनी से धुआँ निकलना शुरू हो चुका है।

सेफ्टी जीरो, रिस्क सौ फीसदी!

प्लांट में काम कर रहे मजदूरों के अनुसार, करीब 10 हजार से अधिक मजदूर बिना हेलमेट, सेफ्टी बेल्ट और अन्य जरूरी सुरक्षा उपकरणों के जान हथेली पर रखकर काम कर रहे हैं। सवाल उठाने पर ठेकेदारों के साथ-साथ कथित गुंडों से डराया जाता है। लापरवाही का नतीजा 8 जनवरी 2025 को सामने आया, जब करीब 10 टन वजनी पाइप की चपेट में आने से गया जिले के एक मजदूर की दर्दनाक मौत हो गई। मजदूरों का आरोप है कि हादसे के बाद कंपनी और प्रशासन घंटों तक मूकदर्शक बने रहे। आधी रात तक चले हंगामे के बाद कहीं जाकर मृतक के परिवार को मुआवजा मिला।

मजदूरी नहीं, तो बच्चों की पढ़ाई भी बंद!

मजदूरों की बदहाली अब अगली पीढ़ी का भविष्य भी निगल रही है। झारखंड निवासी मजदूर नरेंद्र बताते हैं कि मजदूरी नहीं मिलने से बच्चों की स्कूल फीस नहीं भर सके। नतीजा—बच्चों को स्कूल से निकाल दिया गया।नरेंद्र सवाल पूछते हैं—“क्या हमारे बच्चे सिर्फ इसलिए पढ़ नहीं पाएंगे क्योंकि हम मजदूर हैं?”

ग्रीन फील्ड या ग्रीन वॉशिंग?

मजदूरों के समर्थन में पहुंचे किसान नेता राम प्रवेश यादव ने थर्मल पावर प्लांट को “ग्रीन फील्ड” नहीं बल्कि “ग्रीन धोखा” करार दिया। उन्होंने याद दिलाया कि 9 मार्च 2019 को शिलान्यास के समय रोजगार, हरियाली, स्कूल और अस्पताल के बड़े-बड़े वादे किए गए थे। दावा था कि ढाई सौ एकड़ में हरियाली विकसित होगी और प्रदूषण से मुक्ति मिलेगी। हकीकत यह है कि न एक पेड़ दिखता है, न स्कूल, न अस्पताल। सवाल उठता है—सीएसआर का पैसा आखिर गया कहां? जब अधिकारियों और नेताओं के घरों और कार्यालयों में एसी और फर्नीचर लगाने में सीएसआर का फंड खर्च हो रहा है! तो किसानों की जमीन क्यो हड़पा गया ?विकास

हर महीने करोड़ों का ‘मजदूरी घोटाला’?

इंटक के जिलाध्यक्ष पप्पू पांडेय ने आरोप लगाया कि हर महीने मजदूरों की चार करोड़ रुपये से अधिक की मजदूरी का गबन किया जा रहा है। बोर्ड रेट से कम भुगतान कर मजदूरों की मेहनत की खुली लूट हो रही है।उन्होंने कम्पनी के अधिकारियों और सरकार के साथ जिला प्रशासन के अधिकारियों से सवाल पूछाते हुए कहा कि,“मजदूरों के हक की कटौती का फायदा किसकी जेब में जा रहा है?” इसका खुलासा हो ! और जो लोग मजदूर के मौत पर सियासत करने के लिए आये थे ! कि मुआवजे की राशि उनके बदौलत मिली है! वह कहा है! मजदूरों की परेशानी में !

प्रशासन और कंपनी—दोनों गायब

मजदूरों की शिकायतों पर प्लांट प्रशासन से संपर्क की कोशिश की गई, लेकिन सुरक्षा में तैनात जवानों के जरिए भी अधिकारियों से बात नहीं हो सकी। कंपनी का पक्ष सामने नहीं आ पाया है। उधर मजदूरों ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द भुगतान और सुरक्षा की गारंटी नहीं मिली, तो आंदोलन और उग्र होगा। न गुंडों से डरने वाले है! और न कम्पनी के अधिकारियों के जुल्म से  चौसा वीरो की धरती है!

गौरतलब है कि चौसा थर्मल पावर प्लांट का 660 मेगावाट का एक यूनिट चालू हो चुका है। चिमनी से धुआँ निकल रहा है, बिजली बनने लगी है—लेकिन जिन हाथों ने यह प्लांट खड़ा किया, उनकी मजदूरी अब भी फाइलों और दलालों में अटकी है। सवाल बड़ा है—क्या विकास सिर्फ मशीनों के लिए है, इंसानों के लिए नहीं?

Post a Comment

0 Comments