कौन खेल रहा है बक्सर में दबाओ बनाने का सियासी खेल ! क्या नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी ने दिया था ऑफर ! या ऑफर भिजवाने का नए फार्मूला का हुआ है ईजाद ! शहर के चौक चौराहों पर चर्चाओं का बाजार है गर्म!
बक्सर—इन दिनों बक्सर में विकास, सड़क, नाली और सफाई जैसे मुद्दे सियासी चर्चा से लगभग गायब हो चुके हैं। उनकी जगह जिस शब्द ने शहर की राजनीति पर कब्जा कर लिया है, वह है— “सेटिंग”। यह शब्द अब सिर्फ सरकारी फाइलों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि चाय की दुकानों, चौक-चौराहों और गांव की पगडंडियों तक बहस का विषय बन चुका है। वजह बना है सदर विधायक एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी आनंद मिश्रा का एक बयान, जिसने सियासी हलचल तो तेज़ कर दी, लेकिन प्रशासनिक खामोशी और बढ़ा दी।
विधायक के दावे में कितना दम !
सदर विधायक का दावा है कि नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी मनीष कुमार ने किसी तीसरे माध्यम से उन्हें “ऑफर” भिजवाया। बयान जैसे ही सामने आया, बक्सर में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया। सवाल हर तरफ तैरने लगे—क्या वाकई कोई ऑफर था?अगर था, तो किस बात का? अगर दूत था, तो वह कौन था? आखिर इतने बड़े आरोप का आधार क्या है? और अगर कुछ भी नहीं था, तो यह बयान आखिर किस दबाव की राजनीति का हिस्सा है?
बयान के मायने क्या ?
बक्सर की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है, लेकिन इस बार मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि आरोप किसी साधारण नेता ने नहीं, बल्कि एक पूर्व आईपीएस अधिकारी ने लगाया है। ऐसे में आम जनता के मन में यह सवाल स्वाभाविक है कि इतना बड़ा आरोप बिना किसी ठोस आधार के सार्वजनिक रूप से क्यों उछाला गया? क्या यह किसी सच्चाई की ओर इशारा है या फिर सियासी दबाव बनाने की एक सोची-समझी रणनीति? विधायक के बयान ने राजनीतिक भूचाल जरूर ला दिया, लेकिन भूचाल के बाद जब धूल बैठती है, तभी सच दिखाई देता है। फिलहाल हालात यह हैं कि धूल इतनी ज्यादा है कि सच नजर नहीं आ रहा—सिर्फ अंदाज़े, राजनीतिक व्याख्याएं और अपने-अपने हिसाब से निकाले जा रहे अर्थ।
अधिकारी का दावा नही हुई है कोई बात !
उधर, नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी मनीष कुमार की प्रतिक्रिया बेहद सीमित और संक्षिप्त रही। फोन पर पूछे जाने पर उन्होंने साफ कहा—“विधायक जी से मेरी कोई बातचीत नहीं हुई है। आरोप का आधार तो वही लोग बताएंगे।” न कोई आक्रोश, न सफाई का प्रयास, न ही विस्तार। यह प्रशासनिक चुप्पी भी अपने आप में कई सवाल छोड़ जाती है।
राजद नेताओ के तंज से बढ़ा सियासी तापमान !
राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन उसे साबित करना सबसे कठिन। इसी बिंदु पर राजद झुग्गी-झोपड़ी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष संतोष भारती ने विधायक के बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि आज तक भारत के राजनीतिक इतिहास में किसी सांसद या विधायक ने इस तरह “सेट होने या न होने” का सार्वजनिक दावा नहीं किया। अगर कोई तथ्य या साक्ष्य है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए, क्योंकि लोकतंत्र में बयान नहीं, प्रमाण बोलते हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि मकरसंक्रांति बक्सर की राजनीति में सिर्फ पर्व नहीं, बल्कि सियासी शुरुआत का संकेत होती है। हर साल इसी समय भोज होते हैं, समीकरण बनते हैं और नए विवाद जन्म लेते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार मुद्दा विकास नहीं, बल्कि दबाव बनाने की राजनीति है। आज की राजनीति में “संकेत” सबसे सुरक्षित हथियार बन चुका है। न पूरा नाम लिया जाता है, न पूरा सच कहा जाता है—बस कह दिया जाता है किसी तीसरे के माध्यम से। तीसरा कौन है, यह सवाल जनता पर छोड़ दिया जाता है। यही वह फार्मूला है, जिसमें बयान भी हो जाता है और जिम्मेदारी भी तय नहीं होती।
असली मुद्दे से भटकाने का प्रयास तो नही !
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यह है कि कहीं असली मुद्दे से भटकाने का यह प्रयास मात्र तो नही है! या क्या वाकई किसी “ऑफर” की कहानी है?या फिर दबाव बनाने का एक नया सियासी फार्मूला,जिसका अंत भी बाकी तमाम विवादों की तरह फाइलों, बयानों और खामोशी के बीच गुम हो जाएगा? बक्सर की जनता अब इशारे नहीं, सच और जवाबदेही चाहती है।

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