महर्षि विश्वामित्र की नगरी है, विकास से अनजान! जहां राम बने पराक्रमी, वहां प्रशासन बना निष्क्रिय! पर्यटन की अपार संभावना, फाइलों में दफन सपने! विफल तंत्र का नगरी बना बक्सर !

 महर्षि विश्वामित्र की नगरी है, विकास से अनजान! जहां राम बने पराक्रमी, वहां प्रशासन बना निष्क्रिय!पर्यटन की अपार संभावना, फाइलों में दफन सपने! विफल तंत्र का नगरी बना हमारा बक्सर ! 

बक्सर—उत्तरायणी गंगा के पावन तट पर बसा बक्सर केवल एक शहर नहीं, बल्कि धर्म, इतिहास और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है। यह वही भूमि है जहां एक वर्ष पहले विश्वामित्र सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं उनके साथियों ने बक्सर के समग्र विकास का एक विस्तृत रोडमैप समाज के सामने रखा था। उस रोडमैप में पर्यटन, रोजगार, धार्मिक पुनरुत्थान और ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण की स्पष्ट रूपरेखा थी। लेकिन अफसोस, वह रोडमैप सरकार, सांसद, विधायक और जिला प्रशासन की फाइलों में ऐसा गुम हुआ मानो बक्सर के विकास से ही किसी को एलर्जी हो।

पर्यटन की दृष्टि से बक्सर किसी चमत्कार से कम नहीं है। 

उत्तरायणी गंगा के तट पर बसा यह शहर ऐसा दुर्लभ स्थल है जहां एक ही दिन में केवल मुंडन संस्कार के लिए करीब दस लाख श्रद्धालु पहुंचते हैं। यह आंकड़ा अपने आप में बताता है कि यदि बक्सर को योजनाबद्ध तरीके से पर्यटन नगर के रूप में विकसित किया जाता, तो यह बिहार ही नहीं बल्कि देश के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्रों में शुमार होता होटल, धर्मशाला, गाइड, नाविक, हस्तशिल्प और स्थानीय व्यवसाय—रोजगार की अनगिनत संभावनाएं यहां जन्म ले सकती थीं। लेकिन हकीकत यह है कि आज भी बक्सर का युवा रोजगार की तलाश में बाहर पलायन करने को मजबूर है और प्रशासन विकास के नाम पर सिर्फ “संभावना” शब्द का जाप करता नजर आता है।

धार्मिक और पौराणिक दृष्टि से बक्सर की पहचान विश्वविख्यात है। 

यह वही विश्वामित्र की नगरी है, जहां त्रेतायुग में भगवान राम ने ताड़का, सुबाहु और मारीच जैसे राक्षसों का वध कर शास्त्र और शस्त्र—दोनों का ज्ञान प्राप्त किया। यहीं बालक राम, पराक्रमी श्रीराम बने। लेकिन विडंबना देखिए कि विश्वामित्र की इस नगरी में आज तक महर्षि विश्वामित्र की एक भव्य प्रतिमा तक स्थापित नहीं हो सकी। यह प्रशासनिक और राजनीतिक उदासीनता नहीं तो और क्या है?

विश्राम सरोवर नाली में तब्दील !

शहर के बीचोंबीच स्थित विश्राम सरोवर, जिसके बारे में मान्यता है कि उसमें स्नान करने से कुष्ठ रोग दूर हो जाता था, आज प्रशासन की “उदासीन विरासत” बन चुका है। कभी श्रद्धालुओं और साधकों से भरा रहने वाला यह ऐतिहासिक सरोवर अब नाली में तब्दील हो गया है। दबंगों ने इस पर अतिक्रमण कर लिया और जिला प्रशासन अपनी आंखों पर विकास का काला चश्मा लगाए बैठा है।

इतिहास के पन्नों में बक्सर का नाम स्वर्णाक्षरों में दर्ज है।

1539 का चौसा युद्ध और 1764 का बक्सर का महायुद्ध—दो ऐसे युद्ध जिन्होंने भारतीय इतिहास की दिशा बदल दी। लेकिन जिस मैदान पर इतिहास लिखा गया, आज वहां भू-माफियाओं का कब्जा है। विशाल युद्धक्षेत्र अब कुछ एकड़ के “एस्क्वायर” में सिमट कर रह गया है। यदि इन स्थलों को संग्रहालय, हेरिटेज पार्क और ऐतिहासिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित किया जाता, तो विदेशी पर्यटक भी बक्सर की ओर आकर्षित होते।

दुर्भाग्य यह है कि यहां के जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की सोच बक्सर को “विकसित बक्सर” बनाने तक पहुंच ही नहीं पाई है। विश्व पटल पर पहचान बनाने की क्षमता रखने वाला यह शहर आज प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक उदासीनता का शिकार है। सवाल यह है कि क्या बक्सर की धरती केवल इतिहास सुनाने के लिए है, या भविष्य गढ़ने के लिए भी? यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियां पूछेंगी—विश्वामित्र की नगरी में विकास क्यों नहीं आया?

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