गालीबाज डीपीएम के कार्यालय में कर दिया गया “नियमों का पोस्टमार्टम,! अफसरशाही का महिमा मंडन!” ! “टेंडर रद्द, नियम बदले—और करोड़ों सीधे अंदर !” “गाली भी पावर ! घोटाला भी ‘निजी मामला’ वाह रे सिस्टम!” “छोटे कर्मचारी दोषी, बड़े साहब निर्दोष ! सुर्खियों में है व्यवस्था का बक्सर मॉडल!
ऑडिट रिपोर्ट ने खोल दी करोड़ो के घोटाले की पोल!
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह किसी व्यक्ति के द्वारा लगाया गया आरोप नहीं है, बल्कि प्रधान महालेखाकार (ऑडिट) की रिपोर्ट में दर्ज तथ्य हैं। रिपोर्ट में साफ तौर पर बताया गया है कि जनरेटर सेवा से जुड़े टेंडर में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं की गईं। 26 अक्टूबर 2023 को जारी निविदा में 11 कंपनियों ने भाग लिया और सभी तकनीकी रूप से योग्य पाए गए। लेकिन बिना किसी ठोस कारण के टेंडर को रद्द कर दिया गया—जो सामान्य वित्तीय नियम 2017 का खुला उल्लंघन है।80 लाख से बढ़ाकर 2 करोड़ कर दी गई टर्न ओवर!
अब खेल यहीं खत्म नहीं होता। फरवरी 2024 में जब दोबारा टेंडर निकाला गया, तो पात्रता की शर्तें इस तरह बदली गईं कि प्रतिस्पर्धा अपने आप खत्म हो जाए। जहां पहले वार्षिक टर्नओवर 80 लाख था, उसे बढ़ाकर सीधे 2 करोड़ कर दिया गया। यानी साफ संदेश—‘खेल अब अपने लोगों के लिए है।’ ऑडिट रिपोर्ट यह भी बताती है कि कुछ निविदादाताओं के अधूरे दस्तावेजों को नजरअंदाज कर उन्हें योग्य घोषित किया गया, जबकि अन्य को मामूली आधार पर बाहर कर दिया गया। यहां तक कि प्री-बिड मीटिंग में उठाए गए सुझावों को भी कूड़ेदान में डाल दिया गया। सबसे गंभीर आरोप यह है कि पूरी निविदा प्रक्रिया को जिला कार्यक्रम प्रबंधक स्तर से प्रभावित किया गया। यानी नियम, पारदर्शिता और प्रतिस्पर्धा—all sacrificed at the altar of ‘सेटिंग’।किसके हनक से हड़काते है बड़का साहब !
हैरानी की बात है कि प्रधान महालेखाकार के ऑडिट रिपोर्ट में इतने बड़े खुलासे होने के बाद भी न तो कोई ठोस कार्रवाई हुई और न ही जिम्मेदारों से जवाब मांगा गया। उल्टा, सिस्टम के अंदर ही अंदर ‘सेटिंग’ का जाल इतना मजबूत है कि विरोध करने वाले कर्मचारियों को ही प्रताड़ित किया जाता है! कार्यालय सूत्रों के मुताबिक, जो भी कर्मचारी इन गड़बड़ियों पर सवाल उठाता है, उसे मानसिक और शारीरिक दबाव झेलना पड़ता है। पहले भी महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोप और अब वायरल हो रहे गालीबाज डीपीएम के ऑडियो इस बात की पुष्टि करते हैं कि कार्यालय का माहौल कितना जहरीला हो चुका है!छोटे कर्मचारियो का प्रताड़ना निजी मामला !
हद तो तब हो गई जब इस पूरे मामले पर कई अधिकारियों से जब सवाल पूछा गया, तो उन्होंने इसे ‘निजी मामला’ बता दिया। अब सवाल यह उठता है कि अगर एक सरकारी अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को गाली देता है या प्रताड़ित करता है, तो क्या वह सच में निजी मामला है ! तो करोड़ों का घोटाला भी ‘प्रशासनिक चुप्पी’ में दब जाए, तो फिर सार्वजनिक जवाबदेही किसे कहते हैं? बक्सर में यह पूरा मामला अब एक उदाहरण बन चुका है—जहां बड़े अधिकारी के लिए नियम लचीले हैं और छोटे कर्मचारी के लिए सख्त। जहां ऑडिट रिपोर्ट सिर्फ फाइलों में दफन हो जाती है और सच्चाई बोलने वालों को ‘बलि का बकरा’ बना दिया जाता है।
गौरतलब है कि जिले से लेकर राज्य स्तर तक सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि क्या इस बार भी मामला ठंडे बस्ते में जाएगा, या फिर वाकई किसी बड़े स्तर पर कार्रवाई होगी। क्योंकि बक्सर की जनता अब यह सवाल पूछ रही है—क्या भ्रष्टाचार अब योग्यता का प्रमाण बन चुका है? और अगर जवाब ‘हां’ है, तो फिर यह सिर्फ एक घोटाला नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की नंगी सच्चाई है।




1 Comments
अद्भुत एवं अविश्वसनीय
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