विधायक लापता या नेटवर्क आउट?” फोन साइलेंट, कार्यकर्ता वायलेंट! कमल सेवा केंद्र या ‘टालमटोल हब’ का खेल?

विधायक लापता या नेटवर्क आउट?” फोन साइलेंट, कार्यकर्ता वायलेंट! कमल सेवा केंद्र या ‘टालमटोल हब’ का खेल? बीच में फंसी जनता, ऊपर से ‘बिचौलिया बनाम विधायक’ का मेल! बक्सर बीजेपी में अंदर ही अंदर सुलग रही सियासी  चिंगारी का खेल !

बक्सर- जिले की राजनीति इन दिनों किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं लग रही। फर्क बस इतना है कि यहां कहानी का हीरो गायब बताया जा रहा है—और वो भी अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं की नजर में। सदर विधानसभा से पूर्व आईपीएस और वर्तमान बीजेपी विधायक आनन्द मिश्रा इन दिनों विपक्ष के नहीं, बल्कि अपनी ही पार्टी के कार्यकर्ताओं के निशाने पर हैं। सोशल मीडिया पर चल रही पोस्टों ने ऐसा माहौल बना दिया है मानो विधायक जी किसी ‘मिसिंग पर्सन’ केस का हिस्सा बन गए हों। कार्यकर्ता खुलेआम लिख रहे हैं—“विधायक जी फोन उठाइए, हम अपने लिए नहीं, जनता के लिए कॉल कर रहे हैं!” अब सवाल यह है कि फोन की घंटी ज्यादा तेज है या कार्यकर्ताओं की नाराजगी?

फोन नहीं उठता, तो सियासत उठ जाती है


राजनीति में संवाद ही सबसे बड़ा हथियार होता है, लेकिन यहां तो आरोप है कि विधायक जी का फोन ही नहीं उठता। कार्यकर्ताओं का दर्द कुछ यूं छलक रहा है मानो उन्हें जनता के सामने सफाई देने के लिए छोड़ दिया गया हो। एक कार्यकर्ता ने तंज कसते हुए लिखा—“बिना काम के व्यस्त हैं विधायक जी!” तो दूसरे ने जिलाध्यक्ष पर निशाना साधते हुए कहा—“जब तक वर्तमान जिलाध्यक्ष रहेंगे, यही हाल रहेगा।” यानी मामला सिर्फ फोन का नहीं, संगठन के भीतर की खींचतान का भी है। ऊपर से सब ‘एकजुट’ दिखते हैं, लेकिन अंदरखाने ‘नेटवर्क एरर’ चल रहा है।

कमल सेवा केंद्र या ‘टालमटोल केंद्र’?

विधायक जी द्वारा खोला गया ‘कमल सेवा केंद्र’ अब खुद बहस का केंद्र बन गया है। जहां समर्थक इसे जनता सेवा का नया मॉडल बता रहे हैं, वहीं विरोधी इसे ‘टालमटोल केंद्र’ कहकर चुटकी ले रहे हैं। एक पोस्ट में लिखा गया—“जनता ने कमल को वोट दिया था, टालमटोल केंद्र को नहीं!” अब ये व्यंग्य है या सच्चाई, यह तो जनता ही तय करेगी, लेकिन इतना जरूर है कि कमल अब सिर्फ खिल नहीं रहा, चुभ भी रहा है।

बिचौलियों’ पर सियासी प्रहार



पूरे विवाद में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब विधायक के सहयोगी रवि मिश्रा ने मोर्चा संभाला। उन्होंने साफ कहा—“विधायक जी जनता से सीधे संवाद कर रहे हैं, इसलिए बिचौलियों की कमाई बंद हो गई है।” अब यह बयान ऐसा है जैसे आग में घी डालना। यानी जो नाराज हैं, वो कार्यकर्ता नहीं बल्कि ‘बिचौलिए’ हैं! रवि मिश्रा का दावा है कि कमल सेवा केंद्र में रोज 100-150 आवेदन आ रहे हैं और लोगों का काम भी हो रहा है। लेकिन सवाल वही—अगर सब कुछ इतना सुचारु है, तो फिर ये सियासी ‘शोर’ क्यों?

विपक्ष की बल्ले-बल्ले

बीजेपी के अंदर की यह खींचतान विपक्ष के लिए किसी बोनस से कम नहीं है। बिना कुछ किए ही मुद्दा मिल गया है। अब विपक्ष इसे “जनता से कटे विधायक” बनाम “नाराज कार्यकर्ता” का नैरेटिव देने में जुट गया है।

अंदर की आग, बाहर का धुआं

बक्सर बीजेपी में यह विवाद सिर्फ सोशल मीडिया की पोस्ट नहीं है, बल्कि संगठन के भीतर simmer कर रही असंतोष की आंच है। एक तरफ विधायक का ‘डायरेक्ट कनेक्शन’ मॉडल है, तो दूसरी तरफ कार्यकर्ताओं का ‘इग्नोर मोड’ का आरोप। बीच में पिस रही है वही जनता, जिसके नाम पर सारी राजनीति हो रही है।

आखिर सवाल ?

क्या सच में विधायक जी जनता से सीधे जुड़े हैं और बिचौलिए परेशान हैं? या फिर कार्यकर्ताओं की नाराजगी में कुछ सच्चाई छिपी है? बक्सर की सियासत में फिलहाल जवाब से ज्यादा सवाल हैं— और कमल के इस ‘कांटेदार’ दौर में, चुभन किसे ज्यादा हो रही है… ये आने वाला वक्त बताएगा।

Post a Comment

0 Comments