“कूड़े में आग, सिस्टम में राग—अब सवाल गंदगी का नहीं, लोगों की ज़िंदगी का है! “स्वच्छता मिशन के नाम पर धुआं-धुआं प्रशासन!” “टेंडर करोड़ों का, नतीजा—सड़क किनारे जलता कूडो का !” “नल में पानी नहीं, हवा में जहर—किसका विकास, किसका शहर?” “योजना जमीन पर फेल, जेब में खेल—यही है आपसी मेल !
बक्सर- जिले की हवा इन दिनों कुछ ज्यादा ही “महक” रही है। फर्क बस इतना है कि यह खुशबू किसी इत्र या फूल की नहीं, बल्कि जलते कूड़े से उठती जहरीली धुएं की है। नया बाजार पानी टंकी के पास खुलेआम कचरे में आग लगाकर शहर को प्रदूषण की प्रयोगशाला बना दिया गया है। और सिस्टम की संवेदनशीलता का हाल यह है कि जब तक मीडिया का कैमरा नहीं पहुंचा, तब तक “बड़का साहब” की नींद भी नही टूटा !लापरवाही नहीं, यह पैटर्न है!
स्थानीय लोगों की मानें तो यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि एक तयशुदा “सिस्टम” का हिस्सा है। स्वच्छ भारत अभियान और लोहिया स्वच्छता मिशन के नाम पर बक्सर में जो चल रहा है, वह किसी व्यंग्य से कम नहीं। पहले करोड़ों का टेंडर, फिर कचरे का ढेर, और आखिर में उसी ढेर को आग के हवाले—यानी सफाई के नाम पर प्रदूषण का खेल ! पर्यावरण विशेषज्ञ इसे “ओपन वेस्ट बर्निंग” कहते हैं, जो हवा में पीएम2.5, डाइऑक्सिन और जहरीली गैसों का स्तर खतरनाक बना देता है। लेकिन यहां इसे शायद “फास्ट ट्रैक डिस्पोजल” समझ लिया गया है।पुराना खेल, नए ठिकाने
बक्सर में यह खेल नया नहीं है। रात के अंधेरे में नहरों में कचरा गिराना, दिन में उसमें आग लगाना और फिर मिट्टी डालकर जमीन को “उपयोगी” बना देना—यह पुराना फार्मूला अब भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार ठिकाना नया बाजार की पानी टंकी है। यानी जिस जगह से लोगों के घरों तक पानी जाता है, उसी जगह जहर तैयार हो रहा है। सवाल सीधा है—यह लापरवाही है या जानबूझकर जोखिम?फाइलों में हरियाली, जमीन पर वीरानी
“जल-जीवन-हरियाली” योजना कागजों में हरी-भरी है, लेकिन जमीन पर सूखी कहानी लिख रही है। सिमरी पंचायत में जिन खेतों में पौधे लगाने के दावे हुए, वहां आज भी खालीपन पसरा है। फाइलों में पौधे उग रहे हैं, बजट भी “फल-फूल” रहा है—बस जमीन पर हरियाली आने से इंकार कर रही है।
खुद प्यासा है ‘हर घर नल का जल’
पानी की स्थिति भी किसी तंज से कम नहीं। चापाकल जवाब दे चुके हैं, सरकारी नल सूखे हैं। कुल्हड़िया गांव इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहां अप्रैल खत्म होने को है, लेकिन पानी अब तक नहीं पहुंचा। शिकायत करने पर जवाब मिलता है—“ऊपर से आदेश नहीं है।” यानी नीचे जनता प्यास से जूझे, ऊपर फाइलें आराम से चलती रहें।रोटी कमाई, लेकिन खा न पाए
मजदूर मंगरू की बात इस पूरे सिस्टम पर सबसे करारा तमाचा है— “भैया, इतना बदबू था कि रोटी भी नहीं खा पाए।” सोचिए, जिस रोटी को उगाने, कमाने और पकाने में इतना समय लगता है, उसे खाने का मन भी अगर इस बदबू से मर जाए, तो विकास के दावे कितने खोखले हैं।
धुआं सिर्फ कूड़े का नहीं है...
लगातार कचरा जलाने से हवा ही नहीं, पानी और मिट्टी भी जहरीली हो रही है। इसका असर सीधे लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ता है—खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों पर। लेकिन यहां प्राथमिकता स्वास्थ्य नहीं, “मैनेजमेंट” है—और वह भी ऐसा, जिसमें समस्या छुपे, खत्म न हो।बक्सर की यह कहानी सिर्फ एक शहर की नहीं, बल्कि उस सिस्टम का आईना है, जहां योजनाएं कागज पर चमकती हैं और जमीन पर सिसकती हैं। जहां गरीब आज भी मड़ई में रहता है और फाइलों में उसके नाम पर पक्के घर खड़े हो जाते हैं।
अब सवाल सीधा है—यह धुआं सिर्फ कूड़े से उठ रहा है, या फिर उस सिस्टम से भी, जो हर बार सच्चाई को राख में दबाने की कोशिश करता है? क्योकि इस पर बात केवल गन्दगी की नही है लोगो की जिंदगी का है! समय रहते लोग नही जगे तो जीवन भर की कमाई दवाई में ही लुटानी पड़ेगी !





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