बक्सर के लोगो को बेहाल छोड़कर बंगाल में मस्त है विधायक जी ! लोगो ने कहा सडी हुई व्यवस्था का शिकार हो रहे है स्थानीय लोग ! बड़का साहब की खामोशी से गदगद है पूरा महकमा !

“18 किलोमीटर की सड़क ने उधेड़ दी जिले में विकास की पूरी कहानी!” चुनाव में “एक्सप्रेसवे के वादे, गड्ढों में फंसी हकीकत!” “वोट लेकर गायब है विधायक जी, बक्सर के लोगो को छोड़कर बंगाल की कर रहे है चिंता ! अपने ही सड़क पर बेहाल जनता!” “कागज पर विकास दौड़ा रहे है बड़का साहब !, जमीन पर रेंगता मिला पूरा  सिस्टम !”“यह गड्ढे सड़क पर नहीं, सिस्ट्म और सियासत के चेहरे पर हैं!”

बक्सर—यह बिहार का बक्सर है साहब ! अगर विकास की असली तस्वीर देखनी हो, तो बड़े-बड़े भाषणों या सरकारी रिपोर्टों में नहीं, बल्कि  उस 18 किलोमीटर लंबी सड़क पर आइए, जो जिला मुख्यालय को डुमराँव अनुमंडल से सीधे जोड़ती है। यही वह सड़क है जो आज “विकास मॉडल” का सबसे सटीक पोस्टमार्टम कर रही है। जिससे सडी हुई राजनीति और बड़का -बड़का साहब लोगो के विकास के उस सोच को दर्शा रहा है! जो विकसित बक्सर के नारों के आड़ में अपना विकास कर रहे है!

विधायक जी भी निकले राजनीति के महारथी !

2025 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय इसी सड़क को “एक्सप्रेसवे” बनाने का सपना दिखाया गया था। दावा किया गया कि बिहार के किसी भी कोने से पटना सिर्फ 4 घंटे में पहुंचा जा सकेगा। सर्किट हाउस में पान खाकर थूकने से नही जनता के बीच जाने से इस जिले का उद्धार होगा ! लोगो ने भरोसा किया ! सियासत बदली लोगो ने दिल खोलकर मतदान किया ! और विधायक जी बंगाल और असम दौरे पर निकल गए ! अब स्थानीय लोग विधायक जी और व्यंग करते हुए कहते है! राजनीति के महारथी निकले हमारा साहब !  आज हालत यह है कि इस 18 किलोमीटर की दूरी को तय करने में ही लोगों का दम निकल जाता है। उसके बाद भी बड़का साहब की नजर नही पहुच रहा है!

वाह रे बड़का साहब !

 अपने बेहतर भविष्य को उड़ान देने के लिए साइकल से पढ़ने जा रही मधु व्यंग करते हुए कहती है! नेता तो नेता ही होता है! डीजीपी से लेकर मुख्य सचिव स्तर तक के कई बड़े अधिकारी आज नेता बनने के लिए बेचैन दिख रहे है! उनका  मकसद सेवा करना नही! बल्कि सेवा के दौरान खाई गई मेवा को हजम करने के लिए वह राजनीति में आ रहे है! ऐसे लोगो से क्या उम्मीदे की जाए ! सवाल तो उनसे है जिनको इस जिले को चलाने की जिम्मेवारी मिली है! की आखिर जिला मुख्यालय की यह सड़क क्यो नही बन रही है? 

सड़क नहीं, सियासत का रणक्षेत्र

2025 के विधानसभा चुनाव में यह सड़क मुद्दा नहीं, हथियार बन गई थी। इसी के सहारे चुनाव लड़ा गया, वादों की बरसात हुई और जनता ने भरोसा कर सत्ता बदल दी। नतीजा—दो विधायकों की कुर्सी चली गई।लेकिन चुनाव जीतने के कुछ ही महीनों बाद यह मुद्दा भी ठंडे बस्ते में चला गया। जिन वादों पर वोट मिला, वही वादे अब सवाल बनकर जनता के सामने खड़े हैं—क्या यह सब सिर्फ चुनावी जुमला था? मेंटेनेंस में थी सड़क, फिर एक्सप्रेसवे का सपना क्यों? 2021 में लगभग 3.60 करोड़ रुपये की लागत से बनी यह सड़क मेंटेनेंस अवधि में थी। इसके बावजूद इसे एक्सप्रेसवे बनाने का दावा किया गया। अब जब सड़क पूरी तरह टूट चुकी है, तो यह सवाल और गहरा हो गया है कि—क्या जनता को जानबूझकर गुमराह किया गया? स्थानीय अधिवक्ताओं और जागरूक लोगों का कहना है कि यह “विकास” नहीं, बल्कि “वोट मैनेजमेंट” था।

मिशन विकास या मिशन कमीशन?

ग्रामीणों की जुबान पर एक ही बात है—सड़क इतनी जल्दी कैसे टूट गई? क्या निर्माण में गुणवत्ता से समझौता हुआ? लोग खुलकर आरोप लगा रहे हैं कि यह “मिशन कमीशन” का खेल है। विभाग एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहा है और बड़का साहब साफ कह रहे हैं—“यह हमारा विषय नहीं।” यानी सड़क टूटे, जनता गिरे, किसान परेशान हो—सिस्टम के लिए यह बस एक फाइल है।

धर्म, रोजगार और शिक्षा सब पर चोट

यह सड़क सिर्फ आवागमन का जरिया नहीं, बल्कि इलाके की जीवनरेखा है। पंचकोशी परिक्रमा जैसे धार्मिक आयोजनों में हजारों श्रद्धालु इसी रास्ते से गुजरते हैं। लेकिन टूटी सड़क न सिर्फ श्रद्धालुओं को परेशान करती है, बल्कि पर्यटन की संभावनाओं को भी खत्म कर रही है। वहीं, हर दिन गांव से शहर पढ़ने आने वाले छात्र और काम की तलाश में निकलने वाले युवा इस सड़क पर अपने सपनों के साथ संघर्ष करते हैं। कभी हादसा, कभी देरी—हर दिन एक नई चुनौती। अधिकारियों का पुराना जवाब—‘प्रपोजल भेजा गया है’

जब जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल किया गया, तो वही घिसा-पिटा जवाब मिला—“प्रस्ताव भेजा गया है, समय लगेगा।” यानी जनता इंतजार करे…फाइल आगे बढ़े… और फिर शायद कभी सड़क बने। “जब सड़क बन जाएगी, तब नेता जी आएंगे, फोटो खिंचवाएंगे और कहेंगे देखिए, हमने विकास कर दिया।”

गौरतलब है कि 18 किलोमीटर की सड़क अब सिर्फ खराब इंफ्रास्ट्रक्चर की कहानी नहीं है। यह उस सड़ी हुई राजनीति औऱ सिस्ट्म की तस्वीर है, जहां वादे सिर्फ चुनाव तक सीमित रहते हैं और विकास सिर्फ कागजों में दौड़ता है। आज इस सड़क के गड्ढे चीख-चीखकर कह रहे हैं— दाग सड़क पर नहीं, जिम्मेदारों के चेहरे पर है!!

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