“कागज़ों में स्मार्ट, जमीन पर कचरे का साम्राज्य—यही है बड़का साहब का विकास मॉडल!” “नाला बजबजा रहा, सपना चमक रहा—बक्सर का सच बनाम सिस्टम का झूठ !

“कागज़ों में स्मार्ट, जमीन पर कचरे का साम्राज्य—यही है बड़का साहब का विकास मॉडल!” “नाला बजबजा रहा, सपना चमक रहा—बक्सर का सच बनाम सिस्टम का झूठ!” ! “थ्री-डी में लंदन, हकीकत में लैंडफिल—किसे बेवकूफ बना रहा प्रशासन?” “किसान बेचैन, शहर बेहाल—और फाइलों में दौड़ रहा विकास का घोड़ा!”! “गौरवशाली इतिहास पर गंदगी की चादर—जिम्मेदारों की चुप्पी सबसे बड़ा अपराध!”

बक्सर— उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर बसा यह ऐतिहासिक शहर आज अपने ही विकास के दावों के बोझ तले कराहता नजर आ रहा है। इतिहास की किताबों में जहां बक्सर का नाम गौरव के साथ लिया जाता है, वहीं वर्तमान की गलियों में बहती गंदगी और सड़कों के किनारे लगे कूड़े के पहाड़ उस गौरव पर सवाल खड़े कर रहे हैं। 

कागजो और भाषणों में स्मार्ट !

यह शहर आज एक अजीब विरोधाभास में जी रहा है—जहां कागजों और भाषणों में “स्मार्ट बक्सर” दौड़ रहा है, वहीं जमीन पर “सड़ा हुआ बक्सर” बदबू मार रहा है। बड़का साहब और उनके सिस्टम ने विकास को शायद एक थ्री-डी प्रोजेक्ट समझ लिया है—दिखाओ, बजाओ, और भूल जाओ।

स्मार्ट बाजार: सपना या मजाक?

सालों पहले सिंडिकेट गोलम्बर के पास तीन एकड़ में स्मार्ट बाजार, ग्रीनफील्ड पार्क और सैकड़ों दुकानों की परिकल्पना ने शहरवासियों को सपनों में लंदन घुमा दिया था। 3D वीडियो, बड़े-बड़े दावे और प्रेस कॉन्फ्रेंस—सब कुछ हुआ। लेकिन आज वहां ना बाजार है, ना पार्क—बस उम्मीदों की कब्रगाह खड़ी है। स्थानीय लोग तंज कसते हैं—“बक्सर में अब विकास नहीं, ‘विकास का ट्रेलर’ दिखाया जाता है।”

कचड़े से नहीं जीत पाए, स्मार्ट सिटी क्या बनाएंगे?

शहर की सड़कों पर बिखरा कचरा और जाम नालियां प्रशासन के दावों की पोल खोल रहे हैं। पीएचडी की छात्रा अनामिका का व्यंग चुभता है—“15 साल में मैं पीएचडी कर ली, लेकिन बक्सर अभी भी कचड़े से पीएचडी कर रहा है।” हर चुनाव में मरीन ड्राइव, रामायण सर्किट, वाई-फाई सिटी, अंतरराष्ट्रीय बस अड्डा—जैसे सपने परोसे जाते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि शहर आज भी मूलभूत सफाई और व्यवस्था के लिए तरस रहा है।

किसान: विकास का पोस्टर, लेकिन सबसे बड़ा पीड़ित

सदर प्रखंड के किसान अयोध्या यादव उर्फ गुड्डू की बात सिस्टम के चेहरे पर तमाचा है। 44 डिग्री तापमान में मेहनत कर फसल तैयार करने वाला किसान जब बाजार के अभाव में औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर हो, तो “दोगुनी आय” का नारा मजाक बन जाता है। 2 लाख से ज्यादा पंजीकृत किसानों वाले जिले में एक सशक्त बाजार तक नहीं है। बाजार समिति पर अतिक्रमण और अव्यवस्था का कब्जा है, और प्रशासन स्मार्ट बक्सर का सपना दिखा रहा है।

विकास या भ्रम का व्यापार?

सवाल सीधा है—जो प्रशासन शहर को कचड़े से मुक्त नहीं करा सकता, वह स्मार्ट सिटी कैसे बनाएगा? जो किसान को बाजार नहीं दे सकता, वह विकास का मॉडल कैसे बनेगा? बक्सर आज उस फिल्मी सेट की तरह हो गया है जहां कैमरे के सामने सब कुछ चमकदार दिखता है, लेकिन कैमरा हटते ही सच्चाई बदबू मारने लगती है।

गौरतलब है कि बड़का साहब के लिए बक्सर शायद एक “प्रोजेक्ट” है, लेकिन यहां के लोगों के लिए यह जिंदगी है। फर्क बस इतना है कि साहब फाइलों में शहर सजाते हैं, और जनता गंदगी में जीती है। अब सवाल यह नहीं कि बक्सर कब स्मार्ट बनेगा—सवाल यह है कि क्या बक्सर कभी “साफ” भी हो पाएगा?

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