18 किलोमीटर की सड़क पर 18 तरह की राजनीति!गड्ढों में गिर रही जनता, मंचों पर “विकास मॉडल” चमका रहे है नेता! 100 दिन में एक्सप्रेसवे का दावा, अब 10 महीने की मांग रहे है मोहलत! डबल इंजन सरकार में भी खजाना खाली? बक्सर की सड़क ने खोल दी सिस्टम की परतें !
बक्सर — 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव से पहले जिस सड़क को “विकास की लाइफ लाइन” बताकर जनता से वोट मांगा गया था, आज वही सड़क सत्ता, सिस्टम और सियासत — तीनों की पोल खोल रही है। बक्सर गोलम्बर से जासो, नदाव, जगदीशपुर कुल्हड़िया, बसौली होते हुए डुमराँव तक जाने वाली करीब 18 किलोमीटर लंबी मुख्य सड़क अब विकास से ज्यादा राजनीतिक भाषणों का मंच बन चुकी है।जीत के 100 दिन के अंदर बनेगी सड़क !
चुनाव के दौरान दावा किया गया था कि जीत के 100 दिनों के भीतर इस सड़क को “एक्सप्रेसवे जैसी सड़क” बना दिया जाएगा। लेकिन हकीकत यह है कि सड़क अब गड्ढों, धूल, जलजमाव और प्रशासनिक उदासीनता की प्रतीक बन चुकी है। हालत यह है कि बाइक सवार रोज गिर रहे हैं, स्कूल जाने वाले बच्चे जान जोखिम में डालकर सफर कर रहे हैं, किसानों की कमर टूट रही है और एम्बुलेंस तक की रफ्तार थमने लगी है। इधर मंचों पर विकास के भाषण जारी हैं, उधर सड़क पर जनता रोज “विकास मॉडल” का दर्द झेल रही है।
“100 दिन का सपना” अब 10 महीने की मोहलत में बदला !
चुनाव के दौरान “100 दिन में सड़क निर्माण” का वादा करने वाले नेता अब नई दलीलें दे रहे हैं। अब कहा जा रहा है कि “10 साल की गंदगी साफ करने में 10 महीने लगेंगे।” अपनी नाकामी का ठीकरा पुराने जनप्रतिनिधियों पर फोड़ा जा रहा है, लेकिन असली सवालों से बचने की कोशिश जारी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब सरकार भी अपनी, विभाग भी अपना और सत्ता भी अपनी है, तो फिर सड़क आखिर क्यों नहीं बन रही? सूत्रों की मानें तो विभाग आर्थिक संकट से जूझ रहा है। पिछले 7-8 महीनों से कई ठेकेदारों को भुगतान तक नहीं हुआ है। ऐसे में कोई एजेंसी इस सड़क को बनाने की जिम्मेदारी उठाने से बच रही है। यही वजह है कि जनता अब खुलकर कहने लगी है —“सड़क कम, राजनीति ज्यादा बन रही है।”
युवा नेताओ का व्यंग्य बड़े खिलाड़ियों को कर रहा बेचैन!
इस सड़क पर हो रहे सियासत को लेकर लोकप्रिय समाज सेवी सह प्रखर वक्त बिटटू विश्वकर्मा ने कहा कि राजनीति शब्द का परिभाषा ही बिल्कुल बदल गया है! राजा द्वारा जनता के हित मे बनाई गई नीति वाली अब राजनीति नही हो रही है! अब तो राजा द्वारा अपने परिवारों को अमीर बनाने वाली नीति वाली राजनीति हो रही है! पिछले पांच बर्षो से उस 18 किलोमीटर लंबी सड़क से जुड़ने वाले दर्जनों गांव के हजारो लोग जो दंश झेल रहे है! उसका अंदाजा तक किसी को नही है! राजनीति ही करनी थी तो वादे ही क्यो करते है! ऐसा लग रहा है कि, विधायक आज भी “साहब वाली छवि” से बाहर नहीं निकल पाए हैं। “हर बयान में पुरानी नौकरी और एनकाउंटर की चर्चा होती है, लेकिन किसानों, युवाओं और सड़क की बदहाली पर ठोस बात नहीं होती। रोहिणी नक्षत्र सिर पर है, किसानों को बीज, खाद और नहर में पानी की चिंता है, लेकिन नेताओं को राजनीतिक बयानबाजी से फुर्सत नहीं।” बरसात सर पर है वँहा के लोग कैसे शहर तक आएंगे ! जब भी उस रास्ते से जाता हूँ स्थानीय लोग कहते है कि बारिश शुरू होने से पहले ही सड़क की हालत भयावह है। कई जगह सड़क गड्ढों में तब्दील हो चुकी है। मानसून आने के बाद हालात और बिगड़ जाएगी !
जदयू नेता ने कहा लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता है सर्वोपरी !
जदयू प्रदेश महासचिव सह लोकप्रिय समाज सेवी संदीप ठाकुर ने कहा कि—“चुनाव में हमलोगों ने जो सपना दिखाया लोगों ने भरोसा करके वोट दे दिया। अब चुनाव जीतने के बाद हम कहे कि 10 साल की गंदगी साफ करने में 10 महीने लगेंगे तो यह वादा खिलाफी हो जाएगा ! पहले वाला काम नही किया तभी तो जनता हमे जीत की माला पहनाई ! फीर पीछे वाले कि चर्चा करना तो काम ना करने का बहाना जैसा है! सरकार भी आपकी, मुख्यमंत्री भी आपकी पार्टी के, फिर सड़क क्यों नहीं बन रही? जनता को अब भाषण नहीं, जवाब चाहिए।” की आखिर राजनीति में वादा खिलाफी कर आने वाले जेनरेशन को क्या संदेश देने का प्रयास किया जा रहा है!
विभागीय सूत्र क्या कहते हैं?
विभागीय जानकारों के अनुसार मुख्यमंत्री उन्नयन योजना के तहत इस सड़क के चौड़ीकरण और करीब 4 हजार फीट नाली निर्माण की स्वीकृति पहले ही मिल चुकी है। लेकिन सबसे बड़ा संकट फंड की कमी है। सूत्र बताते हैं कि इस सड़क का अनुरक्षण कार्यकाल मार्च महीने में ही समाप्त हो चुका है। विभाग के पास फिलहाल इतनी राशि तक नहीं है कि पुराने बकाये का भुगतान समय पर किया जा सके। ऐसे में निर्माण कार्य शुरू होने में और देरी की आशंका जताई जा रही है। सबसे दिलचस्प और विडंबनापूर्ण बात यह है कि जिन नेताओं के भाषणों में यह सड़क सबसे ज्यादा दिखाई देती है, उनमें से कई को यह तक ठीक से मालूम नहीं कि सड़क की वास्तविक शुरुआत कहां से होती है और इसका अंतिम छोर कहां खत्म होता है। अब सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, पूरे सिस्टम का है!
यह मामला अब सिर्फ 18 किलोमीटर सड़क का नहीं रह गया है। सवाल उस राजनीति का है जिसमें चुनाव से पहले सड़क “जनता की जीवन रेखा” बन जाती है और चुनाव खत्म होते ही वही सड़क सरकारी फाइलों में दम तोड़ने लगती है। बक्सर की यह सड़क अब विकास मॉडल, राजनीतिक दावों और सरकारी व्यवस्था — तीनों की असली परीक्षा बन चुकी है। जनता पूछ रही है — “अगर डबल इंजन सरकार में भी सड़क के लिए पैसा नहीं है, तो फिर विकास के दावों का इंजन आखिर चल किससे रहा है?”





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