अधिकारियों के नाक के नीचे 15 लाख की मिट्टी मैदान में डाली गई या दलदल में ! कहा खेलेगा इंडिया तो खिलेगा इंडिया!

 शिलापट्ट गायब, सवाल बरकरार- मिट्टी मैदान में डली या भ्रष्टाचार की दलदल में?"फिटनेस का डोज, आधा घंटा रोज" के बीच खिलाड़ी खोज रहे सूखी जमीन ! अधिकारियों के नाक के नीचे खेल के नाम पर खर्च, लेकिन मैदान आज भी बदहाल ! जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर महदह हाई स्कूल का खेल मैदान खोल रहा है सरकारी दावों की पोल ! 15 लाख खर्च के बाद भी जल जमाव !

बक्सर : यह बिहार का बक्सर है साहब... जहां सरकारी फाइलों में विकास दौड़ता है, लेकिन जमीनी हकीकत पानी में डूब जाती है। जिला मुख्यालय से महज तीन किलोमीटर दूर महदह पंचायत स्थित उच्च विद्यालय का खेल मैदान इन दिनों किसी खेल प्रतियोगिता या राष्ट्रीय खिलाड़ी की वजह से नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की नाकामी और भ्रष्टाचार पर उठ रहे सवालों के कारण चर्चा में है।
15 लाख की मिट्टी डालने के बाद भी जल जमाव

ऐसे खेलेगा इंडिया तो खिलेगा इंडिया !

देशभर में सरकारें युवाओं को खेल से जोड़ने के लिए "खेलेगा इंडिया, तो खिलेगा इंडिया", "फिटनेस का डोज, आधा घंटा रोज" और "मन फिट तो तन फिट" जैसे जोशीले नारे देती हैं। खिलाड़ियों को प्रोत्साहित करने के लिए "मेडल लाओ, नौकरी पाओ" जैसी घोषणाएं भी की जाती हैं। लेकिन महदह हाई स्कूल का यह मैदान इन नारों को जमीन पर खुली चुनौती देता नजर आता है। यहां दो वित्तीय वर्षों में 15वें वित्त आयोग की करीब 15 लाख रुपये की राशि से मिट्टी भराई कराई गई, फिर भी बारिश का पानी आज तक मैदान से नहीं निकल सका।

खेल के नाम पर फोटो सेशन  !

स्थानीय खिलाड़ियों का आरोप है कि बक्सर में खेल के नाम पर सिर्फ फोटो सेशन और भाषण होते हैं। यदि वास्तव में खेलों को बढ़ावा देने की मंशा होती तो जिला मुख्यालय के इतने करीब स्थित इस मैदान की ऐसी दुर्दशा नहीं होती। खिलाड़ियों का कहना है कि जब अभ्यास के लिए समतल और सूखा मैदान ही उपलब्ध नहीं होगा तो आखिर "खेलेगा इंडिया" कैसे और "खिलेगा इंडिया" कैसे? सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि जिस बड़ी योजना से लाखों रुपये खर्च हुए, उसका शिलापट्ट तक गायब है, जबकि कम राशि वाली योजना का शिलापट्ट आज भी मौजूद है। ऐसे में खर्च की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।

क्या कहते है मुखिया पति!?

महदह पंचायत की मुखिया मंजू देवी के पति एवं प्रतिनिधि सुशील यादव ने फोन पर बताया कि 15वें वित्त आयोग की दो योजनाओं से मैदान में मिट्टी भराई कराई गई। पहली योजना 6 लाख 32 हजार 300 रुपये तथा दूसरी करीब 9 लाख रुपये की थी। उन्होंने दावा किया कि एक और वित्तीय वर्ष की राशि से अतिरिक्त मिट्टी भराई कराने का प्रयास किया गया था, लेकिन तत्कालीन बीपीआरओ ने इसकी अनुमति नहीं दी। उनके अनुसार यदि मैदान में अभी भी तीन से चार फीट और मिट्टी डाली जाए, तभी जलजमाव की समस्या पूरी तरह खत्म होगी।

स्थानीय लोगो का व्यंग!

मुखिया प्रतिनिधि के इस बयान के बाद स्थानीय लोगों ने तीखा तंज कसते हुए कहा कि "15 लाख की मिट्टी खेल मैदान में डाली गई थी या बंगाल की खाड़ी में? अगर इतनी बड़ी राशि खर्च हुई तो मैदान आज भी तालाब क्यों बना हुआ है? आखिर उस समय निगरानी करने वाले सरकारी अधिकारी क्या कर रहे थे?"

क्या कहते है अधिकारी !

उधर, जब इस संबंध में प्रखंड विकास पदाधिकारी साधु शरण पांडेय  से जब फोन पर बात की गई तो पहले उन्होंने कहा कि यह कार्य उनके कार्यालय से नहीं हुआ होगा। हालांकि जब उन्हें व्हाट्सएप पर शिलापट्ट और जलजमाव वाले मैदान की तस्वीर भेजी गई तो उन्होंने मामले की जांच कराने तथा बीपीआरओ और संबंधित पंचायत सचिव से जानकारी लेने की बात कही।

सवालों के घेरे में सिस्ट्म!

जिला मुख्यालय में अधिकारियों के नाक के नीचे स्थित सरकारी विद्यालय के खेल मैदान की यह तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है। आखिर 15 लाख रुपये खर्च होने के बाद भी जल निकासी की व्यवस्था क्यों नहीं बन सकी? यदि मैदान में वास्तव में इतनी मिट्टी डाली गई तो उसका असर जमीन पर क्यों नहीं दिख रहा? और यदि नहीं दिख रहा, तो फिर सरकारी धन आखिर गया कहां?

महदह हाई स्कूल का यह खेल मैदान सिर्फ जलजमाव की कहानी नहीं, बल्कि उन सरकारी दावों की भी हकीकत है जो हर साल खेलों को बढ़ावा देने के नाम पर किए जाते हैं। जब खिलाड़ी मैदान के बजाय पानी में अपना भविष्य तलाशने को मजबूर हों, तब "खेलेगा इंडिया, तो खिलेगा इंडिया" जैसे नारे प्रेरणा नहीं, बल्कि व्यवस्था पर सबसे बड़ा व्यंग्य बन जाते हैं।

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