2026 में भी नहीं बनेगी गोलम्बर–जासो–नादाँव–कुल्हड़िया–बसौली–डुमराँव सड़क! 18 किलोमीटर की बदहाली पर फिर बढ़ी एक और तारीख, चुनावी वादों पर उठे बड़े सवाल ?

 2026 में भी नहीं बनेगी गोलम्बर–जासो–नादाँव–कुल्हड़िया–बसौली–डुमराँव सड़क! 18 किलोमीटर की बदहाली पर फिर बढ़ी एक और तारीख, चुनावी वादों पर उठे बड़े सवाल ? संयुक्त सर्वे की रिपोर्ट सरकार को भेजी गई, विभागीय सूत्रों के अनुसार अब 2027-28 में निर्माण की संभावना। वर्षों से जर्जर सड़क पर हर दिन हजारों लोग जान जोखिम में डालकर सफर करने को मजबूर।

बक्सर-  जिले की सबसे महत्वपूर्ण और खूबसूरत मानी जाने वाली गोलम्बर–जासो–नादाँव–कुल्हड़िया–बसौली–डुमराँव 18 किलोमीटर लंबी सड़क एक बार फिर इंतजार की नई तारीख पर पहुंच गई है। ग्रामीण कार्य विभाग के विभागीय सूत्रों के अनुसार सड़क का संयुक्त सर्वे पूरा कर रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है। हालांकि वर्ष 2026 में निर्माण शुरू होने की कोई संभावना नहीं दिख रही है। अब विभागीय स्तर पर 2027-28 में निर्माण कार्य शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। यह खबर सामने आते ही क्षेत्र के लोगों में जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के प्रति नाराजगी और बढ़ गई है।

दो अनुमण्डल के साथ दो विधानसभा को जोड़ता है यह सड़क!

जिला मुख्यालय को दो अनुमंडलों और दो विधानसभा क्षेत्रों से जोड़ने वाली यह सड़क वर्षों से गड्ढों, धूल और जलजमाव की पहचान बन चुकी है। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही सड़क निर्माण के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही सड़क और वही बदहाली लोगों की नियति बन जाती है।

रिपोर्ट तैयार... लेकिन सड़क अब भी इंतजार में

ग्रामीण कार्य विभाग के एक कर्मी ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि सड़क का संयुक्त सर्वे पूरा कर रिपोर्ट सरकार को भेज दी गई है। फिलहाल इसे पथ निर्माण विभाग (आरसीडी) को हस्तांतरित करने का कोई निर्णय नहीं हुआ है। सड़क लंबी होने के कारण भविष्य में उच्च स्तर पर फैसला लिया जा सकता है, लेकिन अभी निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं दिख रही है।इसी पर ग्रामीण तंज कसते हैं—"शायद इस सड़क की किस्मत तभी बदलेगी, जब किसी मुख्यमंत्री, राज्यपाल या प्रधानमंत्री का काफिला इसी रास्ते से गुजरने लगे।"

सिर्फ सड़क नहीं, लाखों लोगों की जीवनरेखा

यह मार्ग दर्जनों गांवों के लाखों लोगों को जिला मुख्यालय से जोड़ता है। मजदूर रोज़गार के लिए, किसान अपनी उपज बेचने, छात्र-छात्राएं पढ़ाई करने और गंभीर मरीज इलाज के लिए इसी रास्ते पर निर्भर हैं। बरसात में सड़क गड्ढों और कीचड़ में तब्दील हो जाती है। ग्रामीण कहते हैं कि कई बार बाइक से चलने से ज्यादा सुरक्षित पैदल चलना लगता है।

सड़क ही नहीं, सामाजिक रिश्ते भी टूट रहे

ग्रामीणों का कहना है कि खराब सड़क का असर अब सामाजिक जीवन पर भी दिखने लगा है। कई परिवारों के विवाह संबंध केवल इसलिए टूट जाते हैं क्योंकि लोग इस क्षेत्र तक आने से कतराते हैं। लोगों का कहना है—"जहां सम्मानपूर्वक पहुंचना मुश्किल हो, वहां कोई अपनी बेटी की शादी क्यों करेगा?"

बुद्धिजीवियों की पीड़ा—'विकास भाषणों में है, जमीन पर नहीं'

कुल्हड़िया निवासी अधिवक्ता गुड्डू यादव उर्फ अयोध्या यादव, सामाजिक कार्यकर्ता गोविंद यादव, पशुपालक संतोष केशरी और किसान रीता देवी का कहना है कि यह सड़क दो अनुमंडलों और दो विधानसभा क्षेत्रों को जोड़ती है, फिर भी वर्षों से केवल घोषणाएं सुनने को मिल रही हैं। उनका कहना है कि जनता अब भाषण नहीं, सड़क पर काम देखना चाहती है।

'90 दिन का वादा... 9 महीने बाद भी वही गड्ढे'

नादाँव निवासी मनोज का कहना है कि विधानसभा चुनाव के दौरान उन्हें सड़क 90 दिनों में बनवाने का आश्वासन दिया गया था। लेकिन नौ महीने बीत जाने के बाद भी सड़क की हालत जस की तस है। वहीं गोलम्बर निवासी धनजी बताते हैं कि हाल ही में कुल्हड़िया जाते समय उनकी बाइक गड्ढे में फिसल गई, जिससे उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

डॉक्टर बोले—हर दूसरे दिन आते हैं सड़क हादसे के मरीज

गोलम्बर स्थित विश्वामित्र हॉस्पिटल के चिकित्सक डॉ. राजीव झा बताते हैं कि इस सड़क की खराब स्थिति का सबसे अधिक असर गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों पर पड़ता है। कई मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले ही अत्यधिक पीड़ा झेलते हैं। सड़क दुर्घटनाओं में घायल लोगों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

प्रशासन पर भी उठ रहे सवाल

गोलम्बर की मेडिकल छात्रा रेखा कहती हैं कि जब भी किसी बड़े नेता या मुख्यमंत्री का दौरा होता है, तो रातों-रात सड़कें चमक उठती हैं। लेकिन जिन सड़कों पर रोज़ लाखों लोग चलते हैं, उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं। उनका सवाल है—"क्या इस लोकतंत्र में आम जनता की जान की कीमत किसी वीआईपी दौरे से भी कम है?" उन्होंने कहा कि यदि प्रशासन कुछ घंटों में वीआईपी मार्ग दुरुस्त कर सकता है तो वर्षों से बदहाल इस सड़क का निर्माण क्यों नहीं हो पा रहा है? उन्होंने बताया कि 23 सितंबर को प्रस्तावित मुख्यमंत्री के बक्सर दौरे के दौरान ग्रामीण इस सड़क की मांग को लेकर आंदोलन करेंगे।

जनता के सवाल

क्या चुनावी वादों की भी कोई जवाबदेही तय होगी?

18 किलोमीटर की सड़क बनने में आखिर वर्षों क्यों लग रहे हैं?

क्या लाखों लोगों की परेशानी किसी वीआईपी दौरे से कम महत्वपूर्ण है?

क्या विकास केवल चुनावी मंचों तक सीमित रह गया है?

क्या जनता का भरोसा जीतकर उसे वर्षों तक इंतजार कराना लोकतंत्र की मजबूरी है या व्यवस्था की विफलता?

गौरतलब है कि यह सड़क 2025 के विधानसभा चुनाव का प्रमुख मुद्दा रही थी। अब जबकि विभागीय सूत्र 2027-28 की नई समय-सीमा की बात कर रहे हैं, लोगों के मन में एक ही सवाल है—क्या इस बार सचमुच सड़क बनेगी, या फिर यह तारीख भी चुनावी वादों की तरह सिर्फ एक नया इंतजार बनकर रह जाएगी?

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