खेल क्रांति या खेल से खिलवाड़? करोड़ों की योजना जलजमाव में दफन, पानी से भरे मैदानों में कैसे खिलेगा बिहार का भविष्य ! मनरेगा से पंचायतों में बने खेल मैदान बदहाली के शिकार, बास्केटबॉल कोर्ट तालाब बने तो रनिंग ट्रैक पर उग आई घास। सवाल—क्या ऐसे पूरे होंगे 'खेलेगा इंडिया, तो खिलेगा इंडिया' और 'मेडल लाओ, नौकरी पाओ' के सपने?
बक्सर- बिहार सरकार की महत्वाकांक्षी 'खेल क्रांति' योजना का सपना बक्सर में धरातल पर दम तोड़ता नजर आ रहा है। पंचायतों में मनरेगा के तहत लाखों रुपये खर्च कर बनाए गए खेल मैदान आज खिलाड़ियों के लिए सुविधा नहीं, बल्कि बदहाली की मिसाल बन चुके हैं। कहीं बास्केटबॉल कोर्ट महीनों से जलजमाव की चपेट में है, कहीं रनिंग ट्रैक पर घास उग आई है तो कहीं बिना जाली के खड़े बास्केटबॉल पोल भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रहे हैं।सरकार युवाओं को "मेडल लाओ, नौकरी पाओ" का सपना दिखा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत यह सवाल खड़ा कर रही है कि जब खेल मैदान ही पानी में डूबे होंगे तो खिलाड़ी तैयार कहां से होंगे?
क्या पानी भरे मैदान में खेलेगा इंडिया, तो खिलेगा इंडिया?
बक्सर जिले की लगभग हर पंचायत में मनरेगा के तहत करीब 10 लाख रुपये की लागत से बास्केटबॉल, वॉलीबॉल, बैडमिंटन कोर्ट और रनिंग ट्रैक बनाए गए। उद्देश्य था कि गांवों से खेल प्रतिभाएं निकलें और बिहार खेल के क्षेत्र में नई पहचान बनाए। लेकिन अधिकांश मैदान निर्माण के कुछ ही समय बाद बदहाल हो गए। जल निकासी की व्यवस्था नहीं होने से मैदान तालाब में तब्दील हैं। ऐसे में खिलाड़ियों के अभ्यास की कल्पना भी मुश्किल है। स्थानीय लोग तंज कसते हैं कि "जिस बक्सर को कभी फुटबॉल का ब्राजील कहा जाता था, आज वहां बच्चों के पास खेलने के लिए एक ढंग का मैदान भी नहीं बचा।"
एक दौर था, जब बक्सर के खिलाड़ी देश-दुनिया में बजाते थे डंका
दम तोड़ रहा है खेल प्रतिभा!
राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी प्रत्यूष कुमार के पिता, वरिष्ठ चिकित्सक एवं समाजसेवी डॉ. एस.एन. सिंह कहते हैं कि बक्सर की धरती ने ऐसे खिलाड़ी दिए, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिले का नाम रोशन किया। लंबी दौड़ के धावक शिवनाथ सिंह, रामाश्रय यादव, फुटबॉल खिलाड़ी यशवंत सिन्हा, सुल्तान, प्रताप पांडेय सहित कई खिलाड़ियों ने अपनी प्रतिभा से पहचान बनाई। उनका कहना है कि आज भी प्रतिभा की कमी नहीं है, लेकिन सुविधाओं के अभाव में युवा जिले से पलायन करने को मजबूर हैं। राष्ट्रीय बैडमिंटन खिलाड़ी प्रत्यूष कुमार को बेहतर प्रशिक्षण के लिए दिल्ली जाना पड़ा। सवाल यह है कि जब गांवों के खेल मैदान ही बदहाल होंगे तो नई प्रतिभाएं कैसे तैयार होंगी?
चुरामनपुर का मैदान खुद बयां कर रहा भ्रष्ट व्यवस्था की कहानी
नगर परिषद क्षेत्र से सटे चुरामनपुर का खेल मैदान इस योजना की हकीकत का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है। कभी इसी मैदान पर राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉल मुकाबले होते थे। खिलाड़ियों की दौड़, दर्शकों की तालियां और रेफरी की सीटी से गूंजने वाला यह मैदान आज जलजमाव, सन्नाटे और उपेक्षा का शिकार है।क्या कहते है युवा खिलाड़ी!
स्थानीय खिलाड़ी प्रशांत बताते हैं कि 15 फरवरी 2026 को मुख्यमंत्री के प्रस्तावित दौरे को लेकर यहां युद्धस्तर पर पंचायत सरकार भवन, जीविका भवन, स्वास्थ्य केंद्र और खेल मैदान का निर्माण कराया गया था। मुख्यमंत्री का कार्यक्रम नहीं हुआ, लेकिन उसके बाद यह मैदान भी अधिकारियों की प्राथमिकता से बाहर हो गया।फोन तक नहीं उठाते जिम्मेदार अधिकारी!
इस बदहाल खेल मैदान की स्थिति को लेकर संबंधित अधिकारियों से पक्ष जानने के लिए लगातार दो दिनों तक संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन किसी अधिकारी ने फोन रिसीव नहीं किया। ऐसे में प्रशासन का पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।सिर्फ एक मैदान नहीं, पूरे जिले की यही कहानी!
चुरामनपुर अकेला उदाहरण नहीं है। बक्सर जिले में मनरेगा से बने अधिकांश खेल मैदान बदहाली, जलजमाव और रखरखाव के अभाव से जूझ रहे हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद मैदान खिलाड़ियों के बजाय पानी और घास की गिरफ्त में हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कागजों पर खेल क्रांति लाकर बिहार खेल महाशक्ति बनेगा, या फिर इन डूबे हुए मैदानों के साथ युवाओं के सपने भी यूं ही दम तोड़ते रहेंगे?






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