सूखे से तड़पता बक्सर, गिटार की धुन में गुम है जनप्रतिनिधि! एसी कमरे की शीतल ठंड में बैठे-बैठे कागजो पर किसानों को सुविधा पहुँचा रहे हैं अधिकारी !

 सूखे से तड़पता बक्सर, गिटार की धुन में गुम है जनप्रतिनिधि! एसी कमरे की शीतल ठंड में बैठे-बैठे कागजो पर किसानों को सुविधा पहुँचा रहे हैं अधिकारी ! 44 डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे कभी आसमान तो कभी सूखी नहरें, फटे खेतों की दरारों को देख रहे हैं मायूस किसान !

बक्सर- एक तरफ 44 डिग्री की झुलसा देने वाली धूप... दूसरी तरफ सूखी नहरें... तीसरी तरफ प्यास से फटे खेत... और चौथे तरफ गिटार की धुन में मस्त विधायक जी का वायरल हो रहे वीडियो!  इन सबके बीच खड़ा  बक्सर का अन्नदाता। कभी आसमान की ओर उम्मीद से देखता है, तो कभी नहर की सूखी तलहटी में पानी तलाशता है। उसकी आंखों में सिर्फ एक सवाल है—"क्या हमारी मेहनत की कीमत सिर्फ चुनाव तक थी?"

बक्सर में खेती किस्मत भरोसे !

जिले में धान की रोपनी का सबसे अहम समय गुजर रहा है। अदरा नक्षत्र बीत गया, पुख और पुनर्वसु भी विदा होने को हैं, लेकिन हजारों किसानों के खेत अब भी पानी की एक बूंद के इंतजार में हैं। जिनके पास पैसा है, वे निजी ट्यूबवेल से खेत बचा रहे हैं। जिनके पास पैसा नहीं, वे आसमान की ओर देखकर दुआ कर रहे हैं। ऐसा लगता है मानो बक्सर में खेती अब किसान नहीं, किस्मत कर रही हो।

गिटार की धुन में मस्त है विधायक जी!

इसी बीच राजधानी पटना में सदर विधायक आनन्द मिश्रा का गिटार बजाते वीडियो गांव-गांव में चर्चा का विषय बना हुआ है। किसान तंज कसते हैं—"हमारे खेतों में दरारें पड़ रही हैं और राजनीति में सुर सज रहे हैं।" उनका कहना है कि संकट के इस घड़ी में अपने किसानों को मुसीबत में छोड़कर, मस्त अंदाज में गिटार बजा रहे विधायक जी का यह वीडियो देखकर युवा किसान कुंदन कहता है! प्रवासी परिंदे जब जुमला के बल पर चुनाव जितेंगे तो खेतो को पानी नही ! अपना मनोरंजन करेंगे! विधायक जी का यह वीडियो मौन होते हुए भी  बहुत कुछ कह रहा है ! और राजनीति के एक नए पाठ पढ़ा रहा है ! की साहब तो साहब ही होता है चाहे वह विधायक रहे या एसपी ! अब तो पांचवे साल में ही मुलाकात होगी !

शीतल कमरे में बैठे है बड़का साहब !

उधर किसानों का आरोप है कि जिला कृषि विभाग की योजनाएं फाइलों में दौड़ रही हैं, लेकिन नहरों तक पानी नहीं पहुंच रहा। गांवों में लोग तंज कस रहे हैं—"साहब के कमरे में एसी की ठंडक है, लेकिन किसान की किस्मत आज भी तपती धूप में झुलस रही है।"

क्या कहते है किसान ?

युवा किसान विष्णुदेव पासवान कहते हैं निजी कम्पनी  कि नौकरी छोड़कर खेती करने लौटे थे। सोचा था सरकार साथ देगी, लेकिन अब लगता है किसान को सबसे ज्यादा लड़ाई मौसम से नहीं, व्यवस्था से लड़नी पड़ती है। सरकारी बीज समय पर नहीं मिला। बाजार से महंगा बीज खरीदा, हजारों रुपये खर्च कर बिचड़ा तैयार किया, लेकिन नहरों में पानी नहीं आया। जिस बिचड़े को 25 दिन में खेत में होना था, वह 65 दिन का होकर भी नर्सरी में पड़ा है।

किसानों को भटका रहे है अधिकारी !

महादलित महिला किसान सोनी कहती हैं, "खेती शुरू करो तो बीज के लिए भटको, खेती करो तो पानी के लिए भटको, फसल बेचो तो भुगतान के लिए भटको... किसान आखिर करे तो क्या करे?" 49 वर्षीय किसान विजय गोंड़ की आवाज़ में वर्षों की पीड़ा झलकती है। वे कहते हैं, "अंग्रेज चले गए, लेकिन बाबुओं के चक्कर से किसान आज भी आजाद नहीं हुआ। कोई अधिकारी कभी खेत पर नहीं आया, लेकिन कागजों में सब कुछ ठीक बताया जाता है।"

आश्वासन बाबा बना विभाग !

करीब 15 दिन पहले किसानों की समस्या सामने आने पर जल्द समाधान का भरोसा दिया गया था। किसानों का कहना है कि भरोसा मिला, लेकिन पानी नहीं। नहरें आज भी अपनी प्यास नहीं बुझा सकीं, तो खेतों की प्यास कैसे बुझती?

साहब नही उठाते है फोन !

जिला कृषि पदाधिकारी धर्मेंद्र कुमार से उनका पक्ष जानने के लिए संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन फोन रिसीव नहीं होने के कारण उनका पक्ष प्राप्त नहीं हो सका।

आखिर सवाल यही है—क्या बक्सर का किसान हर साल सिर्फ भाषणों में "अन्नदाता" रहेगा? क्या खेतों तक पानी पहुंचाने से ज्यादा आसान मंचों पर वादे करना है? और जब खेत सूख रहे हों, तब क्या सत्ता और सिस्टम को भी अन्नदाता की पीड़ा महसूस होती है, या वह सिर्फ चुनावी मौसम तक सीमित रहती है? बक्सर के खेतों में इस समय सिर्फ मिट्टी नहीं फट रही... भरोसा भी दरक रहा है।

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