बक्सर में कानून की दो किताबें? गरीब के घर दो घंटे में एफआईआर... सरकारी आवास पर 10 साल से 'साहब' के आगे क्यों हार जाता है सिस्टम ?

 बक्सर में कानून की दो किताबें? गरीब के घर दो घंटे में एफआईआर... सरकारी आवास पर 10 साल से 'साहब' के आगे क्यों हार जाता है सिस्टम? स्वास्थ्य विभाग का सामने आया पत्र ने जिले में बढ़ाई नई बहस !

बक्सर-  मुफस्सिल थाना क्षेत्र के रहने वाला  मजदूर मंगरू आज भी अपने घर में अंधेरा ढो रहा है। उसकी गलती सिर्फ इतनी थी कि बिजली मीटर का रिचार्ज खत्म होने के बाद उसने कुछ देर के लिए तार जोड़ लिया। आरोप है कि महज दो घंटे के भीतर बिजली विभाग की टीम पहुंची, 1 लाख 46 हजार रुपये का जुर्माना ठोक दिया, एफआईआर दर्ज हुई और मीटर भी उखाड़ लिया गया। आठ महीने बाद भी उसका घर अंधेरे में है। लेकिन इसी बक्सर में एक ऐसा सरकारी आवास भी है, जिसके बारे में सरकारी पत्र वर्षों से लिखे जा रहे हैं। कभी आवास खाली कराने का आदेश, कभी निजी बिजली कनेक्शन लगाने का निर्देश, कभी बिजली उपयोग को लेकर शिकायत... लेकिन कार्रवाई आज तक पूरी नहीं हो सकी।

सिस्ट्म पर बक्सर के लोगो का सबसे बड़ा सवाल !

क्या कानून गरीब की झोपड़ी तक दौड़कर पहुंचता है और सरकारी आवास के गेट पर जाकर उसकी सांस फूल जाती है ?

जब बुलडोजर पहुंचा तो लगा आज बराबरी होगी...


25 जुलाई की देर शाम  सदर अस्पताल परिसर में अचानक हलचल बढ़ गई। पुलिस, नगर परिषद की टीम और बुलडोजर सरकारी आवास के बाहर पहुंच गए। लोगों ने कहा—"चलो, आज कानून सचमुच सबके लिए बराबर साबित होगा।" लेकिन कुछ ही मिनटों बाद पूरा मंजर बदल गया। जिस बुलडोजर को देखकर लोग कार्रवाई तय मान बैठे थे, वही बुलडोजर बिना कुछ किए लौट गया। पुलिस भी लौट गई। अधिकारी भी लौट गए। पीछे छोड़ गए तो सिर्फ एक सवाल...

आखिर किसका इतना असर था कि पूरा सिस्टम लौट गया?

सरकारी फाइलों में दौड़ता कानून, जमीन पर क्यों रुक जाता है?

दस्तावेज़ बताते हैं कि इस सरकारी आवास को लेकर वर्षों से विभागीय पत्राचार चलता रहा। आदेश भी निकले, शिकायतें भी हुईं। लेकिन यदि सब कुछ कागजों में दर्ज था, तो कार्रवाई आखिर पूरी क्यों नहीं हुई? यदि कोई नियम नहीं टूटा था, तो बार-बार आदेश क्यों जारी हुए?और यदि नियम टूटे थे, तो कार्रवाई किसके आदेश पर रुक गई?

मंगरुआ पूछ रहा है... मेरा अपराध बड़ा था या मेरा गरीब होना?

बक्सर की गलियों में अब लोग सरकारी फाइलों की भाषा नहीं बोल रहे। वे सिर्फ एक सवाल पूछ रहे हैं—"क्या कानून की रफ्तार आदमी की औकात देखकर तय होती है?" क्योंकि एक तरफ उस गरीब मंगरुआ के घर बिजली विभाग की गाड़ी दौड़ जाती है, दूसरी तरफ सरकारी आवास पर सालों से फाइलें ही दौड़ रही हैं।

यह सिर्फ आवास का मामला नहीं...

यह उस भरोसे की लड़ाई है, जिससे आम आदमी टैक्स देता है, बिल भरता है और कानून का पालन करता है। लेकिन जब उसे लगता है कि कानून की धार सिर्फ कमजोरों के लिए तेज है और ताकतवरों के सामने कुंद पड़ जाती है, तब सवाल सिर्फ एक सरकारी आवास का नहीं रह जाता, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता कटघरे में खड़ी हो जाती है।

अब बक्सर जवाब चाहता है।

आखिर 25 जुलाई को बुलडोजर क्यों लौटा?

वर्षों पुराने आदेशों का क्या हुआ?

और सबसे बड़ा सवाल...

क्या बक्सर में संविधान चलता है, या फिर साहब की हैसियत देखकर कानून अपना रास्ता बदल लेता है?

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