कुर्सी किसी पार्टी या नेता की जागीर नही ! जनता के दरवाजे से गुजरता है यह रास्ता !

 "जनता जब खामोश होती है, तब नेता 'गढ़' बना लेते हैं... और जब बोलती है, तो गढ़ इतिहास बन जाते हैं!" बांकीपुर उपचुनाव ने बताया कुर्सी किसी पार्टी या नेता की जागीर नही! जनता के दरवाजे से होकर ही यह रास्ता गुजरता है!

बक्सर-  राजनीति में सबसे खतरनाक बीमारी हार नहीं, बल्कि वह भ्रम है जो लगातार जीत के बाद नेताओं के भीतर जन्म लेता है। यही भ्रम धीरे-धीरे अहंकार बनता है, अहंकार संगठन को खोखला करता है और फिर एक दिन मतपेटी उस पूरे महल को ध्वस्त कर देती है, जिसे नेता अभेद्य किला समझ बैठे थे। बांकीपुर के उप चुनाव ने यह साबित कर दिया कि कुर्सी किसी पार्टी के नेता का जागीर नही है! इसका रास्ता जनता के दरवाजे से ही गुजरता है!

लोकतंत्र में गढ़ नही जनादेश होता है!

बांकीपुर उपचुनाव का संदेश किसी एक दल तक सीमित नहीं है। यह उस पूरी राजनीतिक संस्कृति पर टिप्पणी है, जहां दो-तीन चुनाव जीतते ही विधानसभा को "गढ़" और जनता को "स्थायी वोट बैंक" मान लिया जाता है। लेकिन लोकतंत्र में गढ़ नहीं होते, केवल जनादेश होते हैं—और जनादेश की सबसे बड़ी विशेषता है कि वह कभी भी बदल सकता है।

सीनियर जनर्लिस्ट प्रशांत कहते है! नेता जनता से नही पहले अपने बनाये हुए भ्रम से हारता है!

सीनियर पत्रकार सह  राजनीति के जानकार प्रशांत राय कहते है- राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नेता जनता से नहीं हारता, वह पहले अपने ही बनाए भ्रम से हारता है। उसके आसपास धीरे-धीरे ऐसे लोगों की भीड़ जमा हो जाती है जिनका काम सच्चाई बताना नहीं, बल्कि हर बात पर ताली बजाना होता है। सड़क टूटी हो तो कहते हैं—"जनता खुश है।" बेरोजगारी बढ़ी हो तो कहते हैं—"लहर है।" मोहल्ले में गंदगी हो तो जवाब मिलता है—"विपक्ष अफवाह फैला रहा है।" और चुनाव आते-आते नेता को यकीन हो जाता है कि जीत तो औपचारिकता भर है। यहीं पर लोकतंत्र मुस्कुराता है। क्योंकि मतदाता मंच के सामने खड़े होकर नहीं, मतदान केंद्र के भीतर अकेले फैसला
करता है। वहां न स्टार प्रचारक होते हैं, न नारों का शोर, न चापलूसों की भीड़। वहां केवल मतदाता और उसका विवेक होता है।

क्या कहते है राजनीति के जानकार ?

राजनीति विज्ञान की शोधार्थी बिट्टू पाण्डेय कहती हैं कि भारतीय राजनीति ने "गढ़" शब्द का जितना इस्तेमाल किया है, जनता ने उतनी ही बार उसे गलत साबित किया है। कभी किसी सीट को कांग्रेस का गढ़ कहा गया, कभी भाजपा का, कभी राजद का, कभी वामदलों का। लेकिन इतिहास बताता है कि जनता ने हर दल को यह एहसास कराया कि विधानसभा की सीमा पर किसी पार्टी का नाम नहीं लिखा होता; वहां केवल मतदाता का अधिकार लिखा होता है। बक्सर की राजनीति भी यही कहानी कहती है। यहां चेहरे बदले, दल बदले, समीकरण बदले और नारे भी बदले। जो कल अपराजेय माने जाते थे, वे आज इतिहास के पन्नों में दर्ज हैं। राजनीति में जनता की याददाश्त कमजोर नहीं होती, केवल उसका धैर्य लंबा होता है। जब वह धैर्य टूटता है, तब सबसे मजबूत समझे जाने वाले राजनीतिक किले भी दरक जाते हैं।

चापलूसों के माया जाल में उलझ जाते है नेता जी !

छात्र नेता विट्टू विश्वकर्मा कहते हैं कि नेताओं की सबसे बड़ी दूरी किलोमीटरों से नहीं, बल्कि उनके और जनता के बीच खड़े उन चापलूस लोगों से बनती है जो हर शिकायत को दबा देते हैं। और हर आलोचना को विपक्ष की साजिश बता देते हैं। ऐसे लोग चुनाव तक नेता के सबसे करीबी होते हैं, लेकिन हार के बाद सबसे पहले वही दिखाई देना बंद हो जाते हैं।

कुर्सी किसी की जागीर नही होती !

युवा नेता संदीप ठाकुर कहते है! बांकीपुर का संदेश केवल सत्ता पक्ष के लिए नहीं, बल्कि हर उस दल के लिए है जो यह मान बैठता है कि जनता को हमेशा भावनाओं, नारों या पुराने समीकरणों के सहारे रोका जा सकता है। लोकतंत्र में जनता कभी स्थायी समर्थक नहीं होती; वह स्थायी परीक्षक होती है। हर चुनाव में रिपोर्ट कार्ड मांगती है और अंक भी खुद देती है। राजनीति की किताब में एक नियम कभी नहीं बदलता—जनता सिंहासन देती भी है और वापस ले भी लेती है। इसलिए किसी भी दल के लिए सबसे बड़ा संगठन वह नहीं जो मंच भर दे, बल्कि वह है जो गांव की गलियों में जनता की नाराज़गी सुनकर उसे नेतृत्व तक पहुंचा दे।

बांकीपुर का जनादेश शायद यही कह रहा है—लोकतंत्र में सबसे ऊंची कुर्सी भी जनता के दरवाजे से होकर जाती है। जो इस रास्ते को भूल जाते हैं, उनके लिए चुनाव परिणाम ही सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य बन जाता है।

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