गजबे है बिहार का बक्सर जिला ! इस जिले में बड़का साहब के नाक के नीचे जिले में चल रहे मात्र दो वैध और 121 से ज्यादा अवैध जांच घरों का मसीहा कौन? बड़का साहब की नीयत पर उठे सवाल! लोग बोले—अंधेर नगरी, चौपट राजा!
बक्सर - उत्तरायणी गंगा की तट पर बसा बक्सर सिर्फ एक जिला, शहर या गांव का नाम नहीं है। यह वह धरती है, जहां इतिहास के दो महायुद्ध लड़े गए थे ! जहां से भगवान राम और महर्षि विश्वामित्र की कथाएं जुड़ी हुई हैं। उस ऐतिहासिक धरती पर सरकारी सिस्टम की निगरानी और कार्रवाई को लेकर ऐसे सवाल खड़े हो रहे हैं, जिनका जवाब न तो विभाग के पास है और न ही सिस्ट्म में बैठे जिम्मेदार अधिकारियों के पास ! की आखिर इस जिले में कैसे 100 से ज्यादा अवैध जांच घर चल रहे है! और इस खेल के पीछे का असली खिलाड़ी कौन है! क्योंकि यह किसी छोटे एक दो कर्मचारियों के बस की बात तो है नही ! तो आखिर इस पूरे नेटवर्क का राजा कौन है!किसके संरक्षण में चल रहा है यह खेल !
जिले में संचालित हो रहे जांच घरों को लेकर स्वास्थ्य विभाग से मिली आंकड़ो के अनुसार जिले में महज दो जांच घर ही निबंधित हैं, जबकि करीब 123 छोटे-बड़े जांच केंद्रों के संचालन की बात सामने आ रही है। यानी सवाल सीधा है—अगर दो ही वैध हैं तो बाकी 120 से अधिक अवैध जांच केंद्र किस भरोसे और किसके संरक्षण में चल रहे हैं ? व्यवस्था की सबसे दिलचस्प तस्वीर तब सामने आती है, जब ऐसे मामले उजागर होते हैं। नोटिस जारी होता है, शो-कॉज पूछा जाता है और कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू होने की बात कही जाती है। लेकिन इसके बाद मामला कहां पहुंचता है, यह सवाल अक्सर फाइलों के साथ दब जाता है। लोगों का तंज कसते हुए कहते है—यहां कार्रवाई से पहले शो-कॉज और कार्रवाई के बाद शायद अगली फाइल का इंतजार!
लंबे समय से चल रहे इस खेल का खिलाड़ी कौन !
अब सवाल यह है कि यदि गैर-निबंधित जांच केंद्रों का संचालन नियमों के खिलाफ है, तो इतने बड़े पैमाने पर यह कारोबार लंबे समय से कैसे चल रहा है? और यदि विभाग को इसकी जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं? इसका जवाब बड़का साहब को देना चाहिए—वह भी पूरी पारदर्शिता के साथ।
11 प्रखंड, 123 जांच घर और सिर्फ दो निबंधित!
बक्सर जिले में कुल 11 प्रखंड हैं—बक्सर, इटाढ़ी, राजपुर, चौसा, नावानगर, ब्रह्मपुर, केसठ, चक्की, चौगाईं, सिमरी और डुमरांव। जिले में 142 ग्राम पंचायतें, 1,133 गांव, दो नगर परिषद और तीन नगर पंचायतें हैं। इन्हीं इलाकों में करीब 123 छोटे-बड़े जांच घर संचालित होने की बात सामने आ रही है। इनमें कई जांच केंद्र जिला मुख्यालय से लेकर अनुमंडल और प्रखंड मुख्यालय तक प्रमुख स्थानों पर है। स्थानीय स्तर पर कुछ केंद्रों के संबंध में गंभीर आरोप भी लगाए जाते हैं। आरोप है कि कहीं-कहीं 2,000 से 2,100 रुपये तक में लिंग परीक्षण जैसी गैरकानूनी गतिविधिया भी हो रही है! हैरानी की बात यह है कि कई जगह बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा रहता है—‘यहां लिंग परीक्षण नहीं होता है।’तो फिर सवाल है—कितना वैध और कितना अवैध? और जहां साहब बैठते हैं, वहीं सिस्टम को इतना धुंधला क्यों दिखाई देता ?सबसे बड़ा सवाल निगरानी तंत्र पर है।
जिस जिले में जिलाधिकारी का कार्यालय है, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी बैठते हैं, सिविल सर्जन का कार्यालय है, अनुमंडल और प्रखंड स्तर के अधिकारी हैं, नगर निकायों के अधिकारी हैं और पंचायत स्तर तक पूरा प्रशासनिक ढांचा मौजूद है, उसी जिले में अगर 120 से अधिक गैर-निबंधित जांच केंद्र संचालित होने की बात सामने आयी है तो यह सिर्फ स्वास्थ्य विभाग का नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र का सवाल बन जाता है। हैरानी तो तब होती है जब स्थानीय लोगों का दावा है कि इन केंद्रों की मौजूदगी की जानकारी आम दुकानदार और ई-रिक्शा चालक तक को रहती है। फिर सवाल उठता है—वीसी, पीसी, दिशा की बैठक और विभागीय मॉनिटरिंग में आखिर चर्चा किस बात की होती है? मॉनिटरिंग भी होती है या सिर्फ खानापूर्ति होती है ?
सरकारी कर्मचारियों पर भी लगे गंभीर आरोप
स्वास्थ्य विभाग से जुड़े एक अधिकारी ने नाम नहीं छापने की शर्त पर कुछ कर्मचारियों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि कुछ कर्मी लंबे समय से एक ही जगह पर जमे हैं और कुछ के कथित तौर पर गैर-निबंधित जांच केंद्रों से व्यावसायिक संबंध हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन अगर जांच के दौरान ऐसे आरोप सही पाए जाते हैं तो मामला और गंभीर हो सकता है। क्योंकि तब सवाल सिर्फ अवैध जांच केंद्रों का नहीं रहेगा, बल्कि निगरानी करने वाले तंत्र और कथित हितों के टकराव का भी होगा। आरोप यह भी हैं कि कार्रवाई के नाम पर पहले नोटिस और शो-कॉज जारी होता है, फिर मामला धीरे-धीरे फाइलों में उलझ जाता है। इस बीच कथित कारोबार चलता रहता है। अगर ऐसा है तो सवाल बेहद सीधा है—नोटिस से डर किसे लगता है, जब कार्रवाई जमीन पर दिखाई ही न दे?
जनता त्राहिमाम, सिस्टम बेफिक्र!
जिला मुख्यालय के रहने वाले 57 वर्षीय रमा सिंह चाय की दुकान चलाते हैं। उनका दावा है कि उनकी दुकान के करीब 100 मीटर के दायरे में मुख्य सड़क से लेकर गलियों तक करीब एक दर्जन जांच केंद्र हैं। रमा सिंह के मुताबिक जांच कराने या रिपोर्ट लेने आने वाले लोग अक्सर उनकी दुकान पर चाय पीते हैं। उनका कहना है कि कई बार अधिकारी भी आसपास आते-जाते दिखाई देते हैं। वह कहते हैं—“बात दुख-सुख की होती है या किसी और काम की, यह मैं कैसे बता सकता हूं?” चाय दुकानदार का यह बयान भले किसी जांच का प्रमाण न हो, लेकिन यह व्यवस्था के सामने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा करता है—जब सड़क किनारे बैठा आम आदमी इतने केंद्रों को देख रहा है, तो निगरानी करने वालों की नजर आखिर कहां है?बक्सर—चारागाह या ‘अंधेर नगरी’?
बक्सर की पहचान इतिहास और आस्था से जुड़ी रही है। लेकिन यदि इसी धरती पर नियमों को ताक पर रखकर गैर-निबंधित जांच केंद्रों के संचालन के इतने बड़े आरोप सामने आ रहे हैं, तो यह पूरे सिस्टम के लिए गंभीर सवाल है। जिले में पहले भी भ्रष्टाचार और अवैध कमाई के आरोपों को लेकर कार्रवाई की बातें सामने आती रही हैं। लेकिन कुछ मामलों में कार्रवाई के बावजूद अगर व्यवस्था नहीं बदलती तो सवाल उठना लाजिमी है!
गलती लोगों की है या सिस्टम की?
गरीब आदमी को जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र जैसे सामान्य सरकारी कामों के लिए भी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। दूसरी तरफ अगर गैर-निबंधित जांच केंद्रों का जाल इतना बड़ा है, तो फिर नियमों की किताब आखिर किसके लिए है? अब बड़का साहब से सीधा सवाल अगर जिले में वास्तव में सिर्फ दो जांच घर निबंधित हैं और 120 से अधिक केंद्र गैर-निबंधित हैं, तो—बाकी केंद्र इतने दिनों से चल कैसे रहे हैं? किसने इनकी जांच की? ,किसने इन्हें संचालन की अनुमति दी? कितनों पर कार्रवाई हुई? और सबसे बड़ा सवाल— अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक है तो फिर इतने केंद्र निबंधित क्यों नहीं हैं?
जनता को अब नोटिस और शो-कॉज की कहानी नहीं, जमीन पर कार्रवाई का जवाब चाहिए।
क्योंकि सवाल सिर्फ 123 जांच घरों का नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है, जहां आम आदमी को हर कदम पर नियम दिखाई देते हैं और रसूखदारों के लिए नियमों के बीच से रास्ता निकल आता है। और इसी पर लोग तंज कस रहे हैं—“अंधेर नगरी है साहब… चौपट राजा कौन है, यह बक्सर की जनता अब खुद समझने लगी है!”






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