बक्सर में एक भी निजी अस्पताल निबंधित नहीं, फिर भी धड़ल्ले से हो रहा इलाज! गलत इलाज से हो रही मौतों के बीच उठे सवाल—आखिर जिम्मेदार कौन? ‘बड़का साहब’ की चुप्पी पर फिर गंभीर सवाल
बक्सर— बक्सर की स्वास्थ्य व्यवस्था से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग से लेकर जिला प्रशासन तक की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करीब 28 लाख की आबादी वाले बक्सर जिले में स्वास्थ्य विभाग के सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार फिलहाल एक भी निजी अस्पताल निबंधित नहीं है। इसके बावजूद जिला मुख्यालय से लेकर प्रखंड, कस्बे और गांवों तक सैकड़ों छोटे-बड़े निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और क्लीनिक संचालित होने की बात सामने आ रही है, जहां लगातार मरीजों का इलाज किया जा रहा है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि सरकारी रिकॉर्ड में एक भी निजी अस्पताल का वैध निबंधन नहीं है, तो आखिर इन अस्पतालों को मरीजों के इलाज की अनुमति किस आधार पर मिल रही है?
बिना निबंधन अस्पतालों में इलाज की अनुमति किसने दी?
सिमबॉलिक तस्वीरबक्सर जिले में 11 प्रखंड, दो नगर परिषद, तीन नगर पंचायत और 142 पंचायतें हैं। इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में निजी अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग के कार्यालय से मिली जानकारी के मुताबिक निजी अस्पतालों के निबंधन की मौजूदा स्थिति बेहद चौंकाने वाली है। अस्पताल सिर्फ चारदीवारी और कुछ बेड लगा देने से नहीं चलता। मरीजों की जिंदगी से जुड़ी इस व्यवस्था में चिकित्सकीय योग्यता, प्रशिक्षित कर्मचारी, जरूरी उपकरण, आपातकालीन सुविधाएं, संक्रमण नियंत्रण और निर्धारित स्वास्थ्य मानकों का पालन जरूरी है। ऐसे में जब विभागीय रिकॉर्ड में एक भी निजी अस्पताल का वैध निबंधन नहीं है, तो इन मानकों की निगरानी कौन कर रहा है?
इलाज के दौरान मौत हो तो जांच कौन करेगा?
निजी अस्पतालों में इलाज के दौरान मरीजों की मौत के मामले समय-समय पर सामने आते रहे हैं। कई मामलों में परिजनों ने गलत इलाज, चिकित्सकीय लापरवाही और अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। चरित्रवन स्थित एक निजी अस्पताल में 24 वर्षीय महिला की मौत के बाद भी परिजनों ने इलाज को लेकर गंभीर सवाल उठाए थे। ऐसे मामलों में सबसे पहले यह जांच जरूरी है कि संबंधित अस्पताल का निबंधन वैध था या नहीं, वहां इलाज करने वाले चिकित्सक की योग्यता और वैधता क्या थी, अस्पताल में आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध थीं या नहीं और इलाज के दौरान निर्धारित चिकित्सकीय प्रक्रिया का पालन किया गया या नहीं ! लेकिन जब विभागीय रिकॉर्ड में ही निजी अस्पतालों का निबंधन समाप्त बताया जा रहा है, तो इन सवालों की जवाबदेही तय कौन करेगा?
अगर जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
अस्पताल कर्मियों ने लगाए गंभीर आरोप
वहीं, कुछ निजी अस्पतालों में काम करने वाले कर्मियों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर दावा किया कि तत्कालीन जिलाधिकारी अंशुल अग्रवाल के कार्यकाल में झोपड़ी से लेकर बड़े भवनों में संचालित निजी अस्पतालों तक को निबंधित कराने का निर्देश दिया गया था। कर्मियों का कहना है कि करीब डेढ़ वर्ष बीत जाने के बाद भी आवेदन करने वाले कई अस्पतालों का निबंधन नहीं हो सका। कुछ कर्मियों ने यह भी आरोप लगाया कि साहब को अस्पताल के प्रति बेड के हिसाब से कथित तौर पर 10 हजार रुपये तक की राशि देने की पेशकश की जा रही और राशि नहीं देने के कारण निबंधन नहीं किया जा रहा है । हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। ऐसे गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच होना जरूरी है, ताकि सच्चाई सामने आ सके और यदि आरोप निराधार हैं तो संबंधित विभाग स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।आवेदन किया था तो नवीनीकरण क्यों नहीं हुआ?
सिविल सर्जन कार्यालय से मिली जानकारी के अनुसार कार्यालय के रिकॉर्ड में उपलब्ध निजी अस्पतालों के निबंधन की अवधि फिलहाल समाप्त हो चुकी है। ऐसे में एक और महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है—यदि अस्पताल संचालकों ने निबंधन की अवधि समाप्त होने से पहले ही नवीनीकरण के लिए आवेदन किया था, तो उन आवेदनों पर समय रहते जांच कर निबंधन का नवीनीकरण क्यों नहीं किया गया? क्या आवेदन लंबित है ? क्या जांच नहीं हुई? क्या दस्तावेजों में कमी थी? या फिर किसी अन्य कारण से नवीनीकरण की प्रक्रिया अटकी रही? इन सवालों का स्पष्ट जवाब स्वास्थ्य विभाग को देना चाहिए।मामला सिर्फ अस्पताल का नही मरीजो के जीवन का है!
अगर जानकारी है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
निजी अस्पतालों की जांच और निबंधन का सवाल किसी अस्पताल संचालक को परेशान करने का मुद्दा नहीं है। यह सीधे मरीजों की जिंदगी और उनके परिवारों की सुरक्षा से जुड़ा मामला है। यदि किसी अस्पताल के पास वैध निबंधन नहीं है, तो वहां मरीजों को भर्ती करने, ऑपरेशन करने और गंभीर उपचार करने की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है? स्थानीय स्तर पर कुछ निजी अस्पतालों में गर्भपात सहित अन्य कथित अनियमितताओं के आरोप भी लगाए जाते रहे हैं। इन आरोपों की भी निष्पक्ष जांच जरूरी है। आरोप सही पाए जाते हैं तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए और गलत पाए जाते हैं तो विभाग को सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए।
अब जवाबदेही तय करने का समय
बक्सर में सवाल अब किसी एक निजी अस्पताल का नहीं, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र की निगरानी व्यवस्था का है।यदि सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार जिले में एक भी निजी अस्पताल का वैध निबंधन नहीं है, तो सैकड़ों अस्पतालों में चल रहे इलाज की निगरानी कौन कर रहा है? यदि किसी मरीज की मौत इलाज में लापरवाही या गलत उपचार के कारण होती है, तो जवाबदेही किसकी होगी?और यदि निजी अस्पताल नियमों के अनुसार संचालित हो रहे हैं, तो स्वास्थ्य विभाग यह सार्वजनिक क्यों नहीं करता कि जिले में कितने अस्पताल वैध रूप से निबंधित हैं?
बक्सर के लोगों को अब जवाब चाहिए—जब सरकारी रिकॉर्ड में एक भी निजी अस्पताल निबंधित नहीं है, तो हजारों मरीजों का इलाज आखिर किस भरोसे पर चल रहा है? और अगर इस व्यवस्था में किसी मरीज की जान जाती है, तो जिम्मेदार कौन होगा—अस्पताल संचालक, इलाज करने वाला चिकित्सक या वह सिस्टम, जो सबकुछ जानते हुए भी आंखें बंद किए बैठा है?





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