डीएम निकलीं तो खुल गया ‘सिस्टम’ का राज! छोटी मछलियों पर तो हो गई कार्रवाई मगरमच्छो की कब आएगी बारी !

 डीएम निकलीं तो खुल गया ‘सिस्टम’ का राज! गोद में मासूम लेकर मरीज करते रहे इंतजार, घर पर डॉक्टर साहब फरमाते रहे आराम! अस्पताल पहुंचीं डीएम तो खुली लापरवाही की परतें, छोटी मछलियों पर कार्रवाई—आखिर गायब रहने वाले प्रभारी की कब आएगी बारी? गुनाह एक, सजा अनेक… अजब सिस्टम की गजब कहानी!

बक्सर - सरकारी अस्पतालों में इलाज की उम्मीद लेकर पहुंचने वाले गरीब मरीजों के लिए डॉक्टर का इंतजार कोई नई बात नहीं है। लेकिन सवाल तब बड़ा हो जाता है, जब मरीज गोद में मासूम लेकर अस्पताल की चौखट पर बैठा रहे और जिनके कंधों पर इलाज की जिम्मेदारी है, वे ड्यूटी से ही गायब मिलें। चौसा और इटाढ़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में जिलाधिकारी साहिला के औचक निरीक्षण ने स्वास्थ्य विभाग की उस चमकदार तस्वीर का पर्दा हटा दिया, जो बैठकों और कागजी रिपोर्टों में बेहद दुरुस्त नजर आती है।

अदृश्य रहे धरती के भगवान! इलाज के इंतजार में चौखट पर बैठी रही नन्ही सी जान!
डीएम अचानक अस्पताल पहुंचीं तो ‘सिस्टम’ की हकीकत सामने आने में देर नहीं लगी। कहीं डॉक्टर नदारद मिले, कहीं कर्मचारी गायब मिले, कहीं उपस्थिति रजिस्टर में दर्ज थी लेकिन कुर्सियां खाली थीं और कहीं स्वास्थ्य सेवाओं के कमरों पर ताले लटक रहे थे। यानी कागज पर अस्पताल चालू, लेकिन जमीन पर व्यवस्था खुद मरीजों का इंतजार करती नजर आई।

गोद में मासूम, आंखों में इंतजार… और डॉक्टर साहब गायब!

चौसा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी, स्वास्थ्य प्रबंधक, लिपिक, एएनएम, पीएमडब्ल्यू और जीएनएम समेत कई कर्मी अनुपस्थित मिले। सबसे गंभीर मामला स्वास्थ्य प्रबंधक और लिपिक का सामने आया, जिन्होंने कार्यालय में उपस्थिति दर्ज कराई, लेकिन निरीक्षण के समय कार्यालय से गायब मिले। डीएम ने दोनों के निलंबन का निर्देश दिया। अनुपस्थित चिकित्सकों और अन्य कर्मियों पर वेतन रोकने तथा स्पष्टीकरण की कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए। लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता। जब अस्पताल में प्रभारी से लेकर कर्मियों तक की मौजूदगी सुनिश्चित नहीं हो पा रही थी, तो फिर निगरानी का जिम्मा संभाल रहे अधिकारी आखिर कर क्या रहे थे?

अस्पताल के कमरे भी बोले—‘आज हम बंद हैं’!

चौसा में राजकीय आयुर्वेदिक औषधालय बंद मिला। दंत चिकित्सक का कमरा भी बंद मिला। यानी मरीज इलाज के लिए अस्पताल आए तो उन्हें सिर्फ डॉक्टर की तलाश नहीं करनी थी, कई सेवाओं के दरवाजे भी खटखटाने पड़ सकते थे। यह सिर्फ अनुपस्थिति नहीं है। यह उस गरीब मरीज के भरोसे पर चोट है, जो निजी अस्पताल का खर्च उठाने में सक्षम नहीं होने के कारण सरकारी अस्पताल का रुख करता है।

इटाढ़ी में खुली ‘सिस्टम’ की दूसरी परत

इटाढ़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में भी हालात कमोबेश वही मिले। प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी के साथ दो चिकित्सा पदाधिकारी, स्वास्थ्य प्रबंधक, लिपिक, BCM, LT, PMAM, BM&EA, VBDS और पांच ममता कार्यकर्ता अनुपस्थित मिले। लगातार अनधिकृत अनुपस्थिति के मामले में स्वास्थ्य प्रबंधक, BCM और लिपिक को निलंबित करने का निर्देश दिया गया। चार ममता कार्यकर्ताओं को चयनमुक्त करने की कार्रवाई के निर्देश दिए गए। एक ममता कार्यकर्ता द्वारा अग्रिम उपस्थिति दर्ज कराने का मामला भी सामने आया। यानी बीमारी मरीजों में नहीं, व्यवस्था में भी दिखाई दे रही थी।

शिकायतें पहले से थीं, फिर कार्रवाई अब क्यों?

सबसे बड़ा सवाल यहीं से उठता है। डीएम ने खुद माना कि इटाढ़ी अस्पताल में डॉक्टरों और कर्मियों की अनुपस्थिति की शिकायतें पहले भी मिलती रही हैं। बैठकों में समय पर अस्पताल पहुंचने और जिम्मेदारी निभाने के निर्देश भी दिए जाते रहे। तो फिर सवाल है—अगर शिकायतें थीं, निर्देश दिए जा रहे थे और फिर भी कर्मचारी गायब मिल रहे थे, तो निगरानी तंत्र इतने दिनों तक क्या कर रहा था? क्या सिर्फ निरीक्षण के दिन पकड़े जाने वाला कर्मचारी ही दोषी है? या उस व्यवस्था की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसके रहते गैरहाजिरी कथित तौर पर लंबे समय तक चलती रही?

छोटी मछली पर जाल, बड़े मगरमच्छ की बारी कब?

डीएम की कार्रवाई से यह संदेश जरूर गया कि लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। लेकिन जनता का सवाल इससे आगे है। अगर किसी अस्पताल में प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी की मौजूदगी ही सुनिश्चित नहीं हो पा रही, अगर डॉक्टर-कर्मी लगातार अनुपस्थित रहने की शिकायतें सामने आ रही हैं, तो सिर्फ नीचे के कर्मचारियों पर कार्रवाई से क्या पूरी तस्वीर बदल जाएगी? छोटी मछली जाल में फंस गई, लेकिन बड़े मगरमच्छ की बारी कब आएगी? यही सवाल अब स्वास्थ्य विभाग के बड़े अधिकारियों से पूछा जा रहा है। बड़का साहब के कमरों तक क्यों नहीं पहुंचती अस्पताल की हकीकत? जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी सिर्फ बैठकों, रिपोर्टों और निर्देशों से नहीं हो सकती। अस्पताल में कौन पहुंच रहा है, कौन नहीं पहुंच रहा, मरीजों को डॉक्टर मिल रहा है या नहीं, दवा उपलब्ध है या नहीं—इन सवालों का जवाब कागज नहीं, अस्पताल की जमीन देती है। डीएम के औचक निरीक्षण ने दिखा दिया कि जब अधिकारी अचानक दरवाजा खोलते हैं तो अंदर छिपी हकीकत बाहर आने में ज्यादा समय नहीं लगता। तो फिर सवाल यह भी है कि नियमित निगरानी करने वाले अधिकारी जब अस्पतालों का निरीक्षण करते हैं, तब ऐसी तस्वीर क्यों नहीं दिखती?

साफ-सफाई से लेकर पानी तक बदहाल


दोनों स्वास्थ्य केंद्रों में सिर्फ मानव संसाधन की कमी नहीं मिली। साफ-सफाई, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं भी संतोषजनक नहीं पाई गईं। दवा स्टॉक की जांच हुई और एक्सपायरी दवाओं को लेकर भी निर्देश जारी किए गए। सिविल सर्जन और डीपीएम से स्पष्टीकरण मांगा गया। अब सवाल सिर्फ डॉक्टर से नहीं, पूरे सिस्टम से है गरीब मरीज जब सरकारी अस्पताल पहुंचता है तो वह किसी एहसान की उम्मीद नहीं करता। वह अपने अधिकार का इलाज मांगता है। उसके हाथ में जांच की रिपोर्ट होती है, गोद में बच्चा और बुजुर्ग  होता है और जेब में सीमित पैसे। ऐसे में अगर अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टर नहीं मिले, कर्मचारी गायब मिले और इलाज की सेवाओं के दरवाजे पर ताले मिलें तो उसकी परेशानी सिर्फ स्वास्थ्य की नहीं रहती—वह व्यवस्था से लड़ने की मजबूरी बन जाती है। डीएम के औचक निरीक्षण ने कम से कम इतना तो साफ कर दिया कि सिस्टम को आईना दिखाने के लिए कभी-कभी औचक निरीक्षण जरूरी है।अब असली परीक्षा कार्रवाई की है। क्या कार्रवाई सिर्फ गैरहाजिर कर्मचारियों तक सीमित रहेगी? या उस निगरानी तंत्र की भी जवाबदेही तय होगी, जिसके रहते यह स्थिति बनी?

क्या प्रभारी और बड़े अधिकारियों की जिम्मेदारी भी तय होगी?

क्योंकि गुनाह अगर एक है तो सजा भी एक जैसी होनी चाहिए। सिर्फ छोटी मछलियों पर जाल डालकर बड़े खिलाड़ियों को बचाने की तस्वीर बनी रही तो सवाल कार्रवाई पर नहीं, पूरे ‘सिस्टम’ पर उठेगा। फिलहाल बक्सर के सरकारी अस्पतालों की यही अजब कहानी है—मरीज अस्पताल में इंतजार करता रहा, डॉक्टर ड्यूटी से गायब रहे, डीएम पहुंचीं तो सिस्टम जाग गया… लेकिन सवाल अब भी वही है—गायब रहने वाले प्रभारी की बारी आखिर कब आएगी?

Post a Comment

0 Comments