वेंटिलेटर पर सरकारी अस्पताल! पांच साल से गायब 30 से ज्यादा डॉक्टर, मरीज पूछ रहे—इलाज कौन करेगा साहब?
बक्सर- रोजी-रोटी छोड़कर, गोद में बीमार बच्चा, हाथ में जांच की पुरानी रिपोर्ट और जेब में इलाज के लिए गिने-चुने रुपये लेकर जब कोई गरीब गांव से चलकर बक्सर सदर अस्पताल पहुंचता है, तो उसके मन में सिर्फ एक उम्मीद होती है—सरकारी अस्पताल में डॉक्टर मिल जाएगा और बच्चे का इलाज हो जाएगा। लेकिन अस्पताल की चौखट पर पहुंचते ही यह उम्मीद लंबी कतार में बदल जाती है। सामने मरीजों की भीड़, सीमित डॉक्टर और अपनी बारी का घंटों इंतजार। जिस गरीब ने इलाज की आस में आधा दिन अस्पताल के नाम पर बिता या, उसकी बारी आती है तो बीमारी बताने, जांच दिखाने और पर्ची लेने के लिए कुछ ही पल मिलते हैं। जिसके कारण उसकी सारी उम्मीदे भी बालू की रेत की तरह बिखर जाता है! और निराश होकर आधे अधूरे इलाज करवाकर आधे मन से घर लौट आता है!इलाज खत्म या मरीज की बारी खत्म?
अस्पताल में मरीजों की भीड़ देखकर ऐसा लगता है जैसे बीमारी ज्यादा है और डॉक्टर कम। एक चिकित्सक के सामने सैकड़ों मरीजों का दबाव बताया जा रहा है। ऐसे में इलाज कितनी देर चलेगा, इसका अंदाजा इस आंकड़े से लगाया जा सकता है। जनरल मेडिसिन में एक डॉक्टर पर 300 से ज्यादा मरीजों का दबाव बताया गया है। हड्डी विभाग में करीब 150, स्त्री रोग विभाग में 100 से अधिक मरीज पहुंचते हैं। आंख और मानसिक रोग विभाग में भी मरीजों की संख्या कम नहीं है। यानी डॉक्टर के सामने मरीजों की कतार और मरीज के सामने घड़ी की सुई। लेकिन असली सवाल है...की पांच साल से अस्पताल नहीं पहुंचे 30 से ज्यादा डॉक्टर पर आखिर कार्रवाई कब होगी !कहा है जिले के 30 सरकारी धरती के भगवान !
बक्सर जिले में 30 से अधिक चिकित्सकों के लंबे समय से ड्यूटी से अनुपस्थित रहने की बात सामने आई है। सिविल सर्जन डॉ. शिव कुमार प्रसाद चक्रवर्ती के मुताबिक, कुछ चिकित्सक तीन साल से, कुछ चार साल से और कुछ करीब पांच वर्षों से अस्पताल नहीं पहुंचे हैं।अब जरा सोचिए...जिस डॉक्टर की ड्यूटी मरीजों की जिंदगी बचाने के लिए है, वह वर्षों से अस्पताल से गायब है। दूसरी तरफ उसी अस्पताल में मौजूद डॉक्टरों के सामने मरीजों का हुजूम है। तो सवाल सीधा है—जो डॉक्टर मौजूद नहीं हैं, उनकी कमी कौन पूरी कर रहा है?और उससे भी बड़ा सवाल—पांच साल तक गैरहाजिरी के बाद भी कार्रवाई सिर्फ पत्र और रिमाइंडर तक क्यों सीमित है?बच्चों के अस्पताल में बच्चों का विशेषज्ञ नहीं!
सबसे ज्यादा बेचैन करने वाली तस्वीर बच्चों के इलाज को लेकर सामने आई है। सदर अस्पताल के डीएस डॉ. अमलेश कुमार के मुताबिक अस्पताल में बच्चों के विशेषज्ञ चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं। एसएनसीयू की जिम्मेदारी उपलब्ध डॉक्टरों के भरोसे है, जबकि दूसरे बच्चों का इलाज इमरजेंसी में तैनात चिकित्सकों के माध्यम से कराया जाता है। कल्पना कीजिए उस मां की, जो रात-दिन की चिंता छोड़कर अपने बीमार बच्चे को गोद में लेकर अस्पताल पहुंचती है। उसे करोड़ों की इमारत नहीं चाहिए। उसे चमचमाती मशीन नहीं चाहिए। उसे सिर्फ इतना चाहिए कि उसके बच्चे को देखने वाला विशेषज्ञ डॉक्टर मिल जाए। जब बच्चे की सांस अटकती है, तब परिवार को सिस्टम की फाइल नहीं, डॉक्टर चाहिए।करोड़ों का भवन, लेकिन इलाज का इंतजार!
सरकारी अस्पताल परिसर में गहन शिशु चिकित्सा इकाई के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए गए। भवन बना, मशीनें आईं और उम्मीद जगी कि गंभीर बच्चों को बेहतर इलाज मिलेगा। लेकिन अगर सुविधा मरीज तक पहुंचने से पहले ही व्यवस्था की दीवारों में कैद हो जाए, तो करोड़ों की लागत भी सवाल बन जाती है। करोडो की लागत से भवन बनी , करोडो की यंत्र एवं एसी लगाया गया ! लेकिन हैरानी की बात है कि न इस अस्पताल का उद्घाटन हुआ ! न ही लंबे समय से उसका गेट खुला! आलम यह है कि उद्घाटन से पहले ही वहां लगे एसी चोरी हो गई ! , फर्नीचर गायब गायब हो गए, और एलईडी जैसी सामग्री के इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। जिस भवन को बच्चों की जिंदगी बचाने का केंद्र बनना था, अगर वही लंबे समय तक बंद पड़ा रहे तो सवाल सिर्फ चोरी का नहीं, पूरी व्यवस्था की प्राथमिकता का है।मेहनती डॉक्टर पिस रहे, गायब डॉक्टरों पर फाइलें चल रहीं!
एक तरफ वे डॉक्टर हैं जो रोज अस्पताल पहुंचकर मरीजों की भीड़ का सामना कर रहे हैं। दूसरी तरफ ऐसे चिकित्सकों की लंबी सूची है, जिनकी गैरहाजिरी वर्षों में पहुंच चुकी है। नतीजा साफ है—मौजूद डॉक्टरों पर काम का बोझ बढ़ रहा है और मरीजों को इलाज के लिए ज्यादा इंतजार करना पड़ रहा है। डॉक्टर भी दबाव में हैं और मरीज भी। लेकिन जवाबदेही किसकी है?
अगर किसी डॉक्टर की अनुपस्थिति महीनों नहीं बल्कि वर्षों तक जारी रहती है, तो क्या सिर्फ रिमाइंडर भेजना पर्याप्त है? क्या किसी सरकारी व्यवस्था में पांच साल इतनी छोटी अवधि है कि कार्रवाई का इंतजार चलता रहे?
गरीब के पास निजी अस्पताल नहीं, फिर वह जाए कहां?
बक्सर का गरीब मरीज निजी अस्पताल की भारी फीस नहीं चुका सकता। बड़े शहरों में इलाज कराने के लिए उसके पास साधन नहीं हैं। इसलिए सरकारी अस्पताल उसके लिए विकल्प नहीं, मजबूरी है। वह यहां मुफ्त या सस्ता इलाज लेने नहीं, अपनी जिंदगी बचाने की उम्मीद लेकर आता है। लेकिन अगर अस्पताल में डॉक्टर कम पड़ जाएं, विशेषज्ञ उपलब्ध न हों और वर्षों से अनुपस्थित चिकित्सकों पर कार्रवाई फाइलों में घूमती रहे, तो उस गरीब की उम्मीद किसके भरोसे बचेगी? सरकारी अस्पताल की बड़ी इमारत मरीज को भरोसा नहीं देती। भरोसा देता है डॉक्टर का मौजूद होना। महंगी मशीनें इलाज नहीं करतीं। उसे चलाने वाला विशेषज्ञ इलाज करता है। और सरकारी कागजों में दर्ज सुविधाएं जिंदगी नहीं बचातीं। सुविधा तब मायने रखती है, जब वह जरूरत के वक्त मरीज के काम आए।अब सरकार से सवाल जरूरी है
बक्सर के सरकारी अस्पतालों की कहानी सिर्फ डॉक्टरों की कमी की कहानी नहीं है। यह जवाबदेही की परीक्षा है। 30 से ज्यादा चिकित्सक अगर वर्षों से अनुपस्थित हैं तो कार्रवाई कब होगी? एक डॉक्टर के सामने सैकड़ों मरीज हैं तो अतिरिक्त डॉक्टर कब मिलेंगे? जिले के सबसे बड़े अस्पताल में बच्चों का विशेषज्ञ नहीं है तो नियुक्ति कब होगी? करोड़ों की लागत से तैयार सुविधाएं अगर इस्तेमाल में नहीं हैं तो उनका लाभ मरीजों को कब मिलेगा? और सबसे बड़ा सवाल— जिस गरीब के पास निजी अस्पताल का खर्च उठाने की ताकत नहीं है, उसके इलाज की जिम्मेदारी आखिर किसकी है?बक्सर का सरकारी अस्पताल आज सिर्फ मरीजों का इलाज नहीं मांग रहा। वह खुद इलाज मांग रहा है—व्यवस्था के उस मर्ज का, जिसमें डॉक्टर गायब हैं, मरीज कतार में हैं, फाइलें चल रही हैं और जवाबदेही अब भी वेंटिलेटर पर है। मरीज अस्पताल की चौखट पर पहुंचकर आज भी यही पूछ रहा है— “साहब... डॉक्टर पांच साल से नहीं हैं, बच्चों का विशेषज्ञ नहीं है, मरीजों की भीड़ बढ़ती जा रही है... तो आखिर मेरा इलाज करेगा कौन?”एप्रन? आला? सरकारी फाइल? या फिर वही भगवान, जिसके भरोसे गरीब अस्पताल तक पहुंचता है?







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