अंग्रेजी हुकूमत से भी ज्यादा जुल्म! रेल विभाग के आगे बेबस बक्सर की जनता, फाटक बंद तो जिंदगी भी हुई बंद ! जुल्मी सरकार के शहंशाह अधिकारियों के साथ भिंडने को तैयार है बक्सर ! रेल फाटक टूटेगा ! या सरकार जगेगी !
बक्सर- अंग्रेजी हुकूमत के दौर की कहानियां सुनी थीं कि जनता की आवाज सत्ता के सामने दब जाती थी, लेकिन बक्सर में इटाढ़ी रेलवे फाटक का मामला देखकर लोगों का गुस्सा है कि आजाद भारत में रेल विभाग का रवैया उससे भी ज्यादा बेरहम नजर आ रहा है। 26 करोड़ 40 लाख रुपये का आरओबी उद्घाटन के महज 96 घंटे में क्षतिग्रस्त हो गया, आरओबी चालू हुआ तो उसके साथ रेलवे फाटक भी बंद कर दिया गया और अब लाखों लोग अपने ही जिला मुख्यालय तक पहुंचने के लिए रास्ता तलाश रहे हैं।करोडो का आरओबी चार दिन का मेहमान !
विडंबना देखिए—जिस आरओबी से लोगों को राहत मिलनी थी, वह चार दिन भी ठीक से नहीं चल पाया। पुल बंद हुआ तो रेलवे ने इटाढ़ी फाटक भी खोलने से हाथ खड़े कर दिए। सवाल यह है कि जब पुल नहीं है, फाटक बंद है और वैकल्पिक व्यवस्था नाकाफी है, तो आखिर जनता जाए तो जाए कहां?फाटक नहीं, जैसे जनता की जिंदगी पर लगा ताला!
इटाढ़ी और आसपास के इलाकों से रोजाना हजारों लोग बक्सर जिला मुख्यालय आते-जाते हैं। मरीजों को अस्पताल पहुंचना है, बच्चों को स्कूल जाना है, कर्मचारियों को कार्यालय पहुंचना है और किसानों को बाजार। लेकिन रेलवे की व्यवस्था ने मानो इन सभी जरूरतों पर ब्रेक लगा दिया है। सबसे ज्यादा परेशानी उन बच्चों को हो रही है, जिनके शिक्षण संस्थान रेलवे लाइन के दक्षिणी हिस्से में हैं। अभिभावकों की चिंता है कि रास्ता बंद होने का असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ रहा है। बीमार मरीजों और बुजुर्गों की परेशानी तो अलग है।जनता का सवाल सीधा है—क्या रेलवे के लिए इंसान की जिंदगी और उसकी रोजमर्रा की जरूरतों से बड़ा कोई नियम है?आंदोलन किया तो एफआईआर, समस्या बताई तो इंतजार!
फाटक खोलने की मांग को लेकर स्थानीय लोगों ने धरना दिया। विरोध प्रदर्शन हुआ। रेल चक्का जाम तक किया गया। लेकिन रेलवे अधिकारियों की नींद नहीं टूटी। इसके उलट आंदोलनकारियों पर एफआईआर दर्ज कर दी गई।यही बात अब लोगों के गुस्से को और भड़का रही है।लोग पूछ रहे हैं—जब जनता परेशान होकर सड़क पर उतरी तो उसके दर्द का समाधान करने के बजाय मुकदमा क्यों मिला? क्या लोकतंत्र में जनता को अपनी परेशानी बताने का अधिकार भी सिर्फ कागजों तक सीमित है?सत्ता और विपक्ष दोनों रेलवे के सामने लाचार!
सबसे दिलचस्प तस्वीर यह है कि फाटक खुलवाने के लिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेता रेलवे अधिकारियों के दरवाजे पर दस्तक दे रहे हैं। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री सह जदयू विधायक संतोष निराला से लेकर सदर भाजपा विधायक आनंद मिश्रा और अन्य राजनीतिक दलों के नेता लगातार प्रयास कर रहे हैं। लेकिन सवाल फिर वही—जब सत्ता पक्ष का विधायक भी रेलवे के सामने अपनी सरकार के बावजूद बेबस नजर आए, तो आम आदमी की हैसियत क्या रह जाती है? सदर विधायक आनंद मिश्रा के मुताबिक रेलवे के जीएम और डीआरएम स्तर से हाथ खड़े किए जा चुके हैं और अब फैसला रेलवे बोर्ड या रेल मंत्री के स्तर से ही संभव है। यानी बक्सर की जनता की परेशानी का फैसला अब स्थानीय स्तर पर नहीं, दिल्ली की फाइलों में होगा!
26 करोड़ का पुल टूटा, जिम्मेदारी किसकी?
सबसे बड़ा सवाल आरओबी की गुणवत्ता पर है। 26 करोड़ 40 लाख रुपये की लागत। उद्घाटन के 96 घंटे बाद स्लैब क्षतिग्रस्त। आखिर ऐसी कौन-सी निर्माण व्यवस्था थी कि करोड़ों रुपये का पुल चार दिन भी अपनी मजबूती साबित नहीं कर पाया? क्या निर्माण की गुणवत्ता की जांच होगी? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसी पर कार्रवाई होगी? क्या जनता को बताया जाएगा कि करोड़ों रुपये आखिर किस गुणवत्ता के काम पर खर्च हुए? या फिर जांच की फाइल खुलेगी, कुछ दिन चर्चा होगी और उसके बाद मामला सरकारी अलमारी में सो जाएगा?
अब जनता का गुस्सा फूटने को तैयार
इटाढ़ी का मामला अब सिर्फ रेलवे फाटक का मामला नहीं रह गया है। यह जवाबदेही बनाम सरकारी बेपरवाही की लड़ाई बन चुका है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अंग्रेजों के जमाने में भी जनता को रास्ते और आवाजाही की जरूरत थी, लेकिन आजादी के 80 साल बाद करोड़ों रुपये खर्च करके पुल बनाया गया और वह भी बंद, नीचे का फाटक भी बंद—तो यह कैसा विकास है? लोगों का गुस्सा अब इस सवाल में बदल रहा है—अंग्रेजों ने सिर्फ राज किया था, क्या आज की व्यवस्था जनता को सुविधा देने के बजाय उसे परेशान करने पर आमादा है? बक्सर अब आश्वासन नहीं चाहता। बक्सर जवाब चाहता है।और सवाल सिर्फ रेलवे से नहीं—उस पूरी व्यवस्था से है, जो करोड़ों का पुल टूटने के बाद भी जनता की जिंदगी को खोलने के लिए एक रेलवे फाटक तक नहीं खोल पा रही।






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