बक्सर के ‘बड़का साहब’ से जनता के पांच सीधे सवाल!कागज पर विकास की रफ्तार तेज, जमीन पर रास्ता तक नहीं! योजनाएं बनीं, भुगतान हुआ, लेकिन जनता पूछ रही—नतीजा कहां है?

 बक्सर के ‘बड़का साहब’ से जनता के पांच सीधे सवाल!कागज पर विकास की रफ्तार तेज, जमीन पर रास्ता तक नहीं! योजनाएं बनीं, भुगतान हुआ, लेकिन जनता पूछ रही—नतीजा कहां है?

बक्सर-  यह बिहार का बक्सर है साहब! यहां विकास की कहानी अक्सर फाइलों से शुरू होती है और फाइलों में ही पूरी हो जाती है। बैठकों में योजनाएं बनती हैं, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में मॉनिटरिंग होती है, प्रेस रिलीज में उपलब्धियां गिनाई जाती हैं और कागज पर जिले की तस्वीर बदलती दिखाई देती है। लेकिन जरा एसी कमरों से बाहर निकलकर जमीन पर देखिए—कहीं सड़क का इंतजार है, कहीं खेत पानी को तरस रहा है और कहीं आम आदमी महीनों से सरकारी दफ्तरों की चौखट नाप रहा है। सवाल सिर्फ इतना है—अगर सिस्टम इतना ही दुरुस्त है तो जनता की परेशानी खत्म क्यों नहीं हो रही?

कुर्सी का खेल, जनता से क्यों मेल नहीं?

जिला मुख्यालय की सड़क है झील नही !

चुनाव के समय जनता के बीच पहुंचकर बड़े-बड़े वादे करने वाले जनप्रतिनिधि सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने के बाद आखिर उसी जनता की आवाज सुनने में इतने व्यस्त क्यों हो जाते हैं? सोशल मीडिया पर सम्मान की तस्वीरें हैं, गमछे और मालाओं के साथ मुस्कुराते चेहरे हैं। लेकिन सवाल यह है—क्या तस्वीर से सड़क बनेगी? सम्मान से खेत में पानी पहुंचेगा? पोस्ट डालने से आम आदमी का काम होगा?

बक्सर अब तस्वीर नहीं, जवाब मांग रहा है।

आम आदमी की जिंदगी में सिर्फ बदहाली ही बदहाली !

बैठकें बंद कमरे में, सवाल खुले मैदान में

जनहित से जुड़ी दिशा की बैठक हो या कृषि टास्क फोर्स की बैठक—अगर इन बैठकों का मकसद जनता की समस्याओं का समाधान है तो फिर इनके फैसलों और कार्रवाई की जानकारी जनता तक कितनी पहुंचती है?क्या बंद कमरे की बैठकों में जनता की आवाज ज्यादा साफ सुनाई देती है? या फिर बैठकों की तस्वीर ही उपलब्धि बनकर रह गई है?

अब बड़का साहब से पांच सीधे सवाल

आर्सेनिक युक्त पानी पीने को मजबूर 80 महादलित परिवार !

पहला सवाल—लाखों खर्च कर बीच सिवान में कचरा प्रबंधन इकाई आखिर किसके लिए?

लोहिया स्वच्छता मिशन के तहत पंचायतों में अपशिष्ट प्रबंधन इकाइयां बनाने पर सरकारी राशि खर्च हुई। लेकिन अगर किसी इकाई तक पहुंचने का रास्ता ही नहीं है तो सवाल उठना स्वाभाविक है—कचरा वहां पहुंचेगा कैसे? भवन बन गया, लेकिन रास्ता कौन बनाएगा? रास्ता नहीं तो कचरा पहुंचेगा कैसे? और कचरा नहीं पहुंचा तो योजना का लाभ किसे मिलेगा? सबसे बड़ा सवाल—क्या निर्माण से पहले जमीन और पहुंच मार्ग की वास्तविक स्थिति की जांच नहीं हुई? अगर योजना में गड़बड़ी है तो जिम्मेवारी तय कब होगी?

दूसरा सवाल—योजना अधूरी तो भुगतान पूरा कैसे?

सदर प्रखंड की जगदीशपुर पंचायत में गोवर्धन योजना के तहत गोबर गैस प्लांट के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने और योजना के वर्षों से अधूरे रहने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अगर योजना अधूरी थी तो भुगतान किस आधार पर हुआ? राशि की निकासी किसने मंजूर की?मापी और सत्यापन किसने किया? और अगर सरकारी राशि खर्च हो चुकी है तो वर्षों बाद भी रिकवरी क्यों नहीं?जनता के टैक्स के पैसे से ईंटें खरीदकर कहानी पूरी नहीं होती साहब, योजना पूरी करनी पड़ती है।

तीसरा सवाल—जल जीवन हरियाली में तालाब जमीन पर हैं या कागज पर?

यह तो खेत है भाई फीर तलाब कहा है?

जल जीवन हरियाली के नाम पर तालाब निर्माण को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप हैं कि कुछ जगहों पर भूमिहीन परिवारों की निजी जमीन से जुड़े मामलों में तालाब निर्माण और कागजी भुगतान की स्थिति पर सवाल खड़े हुए हैं।तो सीधा सवाल है—जहां जमीन ही नहीं, वहां तालाब कैसे? जहां तालाब नहीं, वहां भुगतान कैसे? आरोप गलत हैं तो जमीन पर जांच कराकर तस्वीर जनता के सामने रखने में परेशानी क्या है? और अगर सरकारी राशि का दुरुपयोग हुआ है तो जिम्मेवारों पर कार्रवाई कब होगी?

चौथा सवाल—हरियाली के नाम पर पेड़ कहां हैं?

पौधारोपण के नाम पर भुगतान हो गया, लेकिन जमीन पर पेड़ दिखाई नहीं देते—तो सवाल तो उठेगा ही। फाइल में हरियाली और जमीन पर खालीपन क्यों? जिस जगह पौधारोपण का दावा किया गया, वहां जाकर पौधों की गिनती क्यों नहीं होती? अगर पौधे मिले ही नहीं तो भुगतान किस आधार पर हुआ और सरकारी धन की जवाबदेही किसकी है? कागज पर लगाया गया पेड़ छांव नहीं देता साहब।

पांचवां सवाल—आम आदमी महीनों से दौड़ रहा है, फैसला क्यों नहीं?

एक आम आदमी दाखिल-खारिज जैसे साधारण काम के लिए डीसीएलआर से लेकर सीओ कार्यालय तक महीनों चक्कर काटता है। अगर आवेदन सही है तो फैसला क्यों नहीं? अगर गलत है तो उसे खारिज क्यों नहीं किया जाता? आखिर आम आदमी को महीनों तक दफ्तरों की परिक्रमा कराने का मतलब क्या है? सरकारी व्यवस्था नागरिक की सुविधा के लिए है या नागरिक को व्यवस्था के सामने खड़ा रखने के लिए?

ये सिर्फ पांच सवाल हैं…

सवाल यहीं खत्म नहीं होते। खेल के मैदान से लेकर पर्यटन तक, कृषि से पंचायती राज तक, पीएचईडी से पथ निर्माण तक, खनन से भू-अर्जन तक—हर विभाग के पास जनता के सवाल हैं। जनता अब यह नहीं पूछ रही कि बैठक कितनी हुई। जनता पूछ रही है—बैठक के बाद जमीन पर बदला क्या? जनता यह नहीं पूछ रही कि कितनी फाइलें चलीं। जनता पूछ रही है—फाइल से निकलकर काम सड़क तक पहुंचा या नहीं? जवाब कागज पर नहीं, जमीन पर चाहिए।क्योंकि अब सवाल यह नहीं कि सिस्टम काम कर रहा है या नहीं। सवाल यह है कि अगर सिस्टम काम कर रहा है तो जनता त्राहिमाम क्यों कर रही है? अगर विकास हो रहा है तो सड़कें बदहाल क्यों हैं? अगर कृषि की मॉनिटरिंग हो रही है तो किसान पानी के लिए क्यों परेशान है? अगर योजनाओं की जांच हो रही है तो अधूरे काम वर्षों तक क्यों पड़े हैं?अगर दफ्तर जनता के लिए हैं तो आम आदमी महीनों तक चक्कर क्यों काट रहा है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या बक्सर में सरकारी योजनाओं का हिसाब सिर्फ फाइलों से होगा या जमीन पर भी लिया जाएगा?

अब आखिरी सवाल अधिकारियों से नहीं, बक्सर की जनता से है।

जब वोट देने का अधिकार आपका है तो सवाल पूछने का अधिकार भी आपका है। टूटी सड़क पर सवाल क्यों नहीं? बिजली की आंख-मिचौनी पर आवाज क्यों नहीं?सूखते खेतों पर आंदोलन क्यों नहीं? अधूरी योजनाओं पर हिसाब क्यों नहीं? बच्चों के भविष्य और बुनियादी सुविधाओं के लिए सवाल कब? क्योंकि लोकतंत्र में जनता सिर्फ वोट देने वाली भीड़ नहीं होती—जनता मालिक होती है। और जब मालिक हिसाब मांगता है तो कागज की नाव से विकास का समुद्र पार करने का दावा नहीं चलता। जवाब देना होगा। कागज पर नहीं—जमीन पर।

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